7 फ़रवरी 2026,

शनिवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

गौरी भाखरी आशापुरा माता है आस्था का केन्द्र

-पाली से 20 किलोमीटर दूर बाला गांव से 5 किलोमीटर गौरी भाखरी स्थित माता आशापुरा का मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का है बड़ा केन्द्र

2 min read
Google source verification

पाली

image

Suresh Hemnani

Oct 24, 2020

गौरी भाखरी आशापुरा माता है आस्था का केन्द्र

गौरी भाखरी आशापुरा माता है आस्था का केन्द्र

-दिनेश शर्मा
पाली/गिरादड़ा। पाली से 20 किलोमीटर दूर बाला गांव से 5 किलोमीटर गौरी भाखरी स्थित माता आशापुरा का मंदिर पर श्रद्धालुओं की आस्था का बड़ा केन्द्र है। बाला गांव के डूंगरसिंह सोनीगरा ने बताया कि करीब 400 पहले साल विक्रम संवत 1697 को ठाकुर हरिसिंह ने गौरी भाखरी की तलहटी में बाला गांव को बसाया था। पहाड़ी पर चबुतरा बनाकर माता आशापुरा की स्थापना की थी।

ग्रामीणों के अनुसार गांव व माता की स्थापना के बाद पहाड़ी क्षेत्र में रात में चोर आते रहते थे। चोरों के आने पर माता आवाज निकालकर ग्रामीणों को विभिन्न आवाजों के जरिए सतर्क करती थीं। कहते हैं करीब 300 साल पहले जब चोर चोरी करने आए तो माता ने आवाजें निकालनी शुरू कर दी। इस पर चोरों ने पत्थर फैंके जिससे माता की प्रतिमा खंडित हो गई थी। माता की प्रतिमा खंडित हो जाने के बाद गांव ठाकुर ने बाला गांव को वहां से हटाकर 5 किलोमीटर दूर डेंडा व कूरना के बीच बाला गांव बसाया। 150 साल बाद ठाकुर हबतसिंह ने शेषमल जैन व ग्रामीणों के सहयोग से खंडित प्रतिमा की जगह पर नई प्रतिमा की स्थापना की। खंडित प्रतिमा को भी नई प्रतिमा के पास ही रखा गया।

करीब 30 साल पहले बाला गांव निवासी उम्मेदसिंह पुत्र गजेसिंह ने भगवा धारण कर पुजा अर्चना शुरू की। बाद में उम्मेदसिंह का नामकरण पूनमपुरी महाराज हुआ। उन्हें महंत की उपाधी दी गई। मंदिर पुजारी नारायण भारती ने बताया कि मां की आस्था के चलते वहां पर रोजाना सैकड़ों श्रद्धालु आते हैं। श्रद्धालुओं के चढ़ावे से ही महंत पूनमपुरी महाराज ने मंदिर का निर्माण कार्य शुरू करवाया। 2012 में मंदिर बनाकर माता की प्रतिमा के ऊपर ही नई प्रतिमा स्थापित कर प्राण प्रतिष्ठा करवाई। माता के दरबार में जो मन्नत मांगी जाती है वह पूरी होती है। नवरात्री में नौ दिन तक यहां मां के दरबार में मेला लगा रहता है।