
pali
पाली।होली में गाए जाने वाले फाग में जीवन का राग छिपा है। ये इतिहास के जीवन्त दस्तावेज हैं। लोगों के दिलों में स्वातन्त्र्य की भावना जाग्रत करने की दृष्टि से इन फागों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। बुलावो आयो देस रो लड़वा नै किणनें भेजूं रे..., रगत-रंग में रंगियोड़ा एे वीर-सूरमा देस रा...आजादी रै सारू एे मरणै सूं परणै रे एे वीर-सूरमा...। इन गीतों में आजादी के प्रति लोगों की अटूट भावना साफ झलकती है।
लोक देवता को चढ़ाते रंग
धुलण्डी के दिन रंग खेलने के बाद ईलोजी (भैरूजी) को रंग लगाया जाता है। इसके साथ फाग गीत गाकर उन्हें रिझाने की परम्परा है। लोग चालो रे सहेलियां आपां भैरूं ने मनावां रे आदि गीतों के माध्यम से भैरू को रंग लगाते हैं। लोक संस्कृति के जानकार व इतिहासकार डॉ. अर्जुनसिंह शेखावत, बताते है कि फाग गीतों ने आजादी के लिए लोगों में जागरूकता जगाने का अनूठा कार्य किया। मारवाड़-गोडवाड़ में अलग-अलग क्षेत्रों में ये फाग गीत आज भी हमारे इतिहास की झलक दिखाते हैं। आउवा के इतिहास के गीत इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। यह धारणा गलत है कि इन गीतों में अभद्र भाषा का प्रयोग हुआ है। इन गीतों में अभद्रता बहुत बाद में आई। पहले तो देवताओं को रंग लगाने के लिए इन गीतों को गाया जाता था।
आउवा आसोप धणियां...
पाली जिले के आऊवा में आजादी के इतिहास को फागों के माध्यम से आज भी गाया-सुनाया जाता है। आउवा आसोप धणियां मोतिया री माळा ओ...तथा ढोल बाजै, चंग बाजै भेळौ बाजै वांकियौ, सारजेंट नै मार नै दरवाजे टांकियौ रै झल्लो आऊवो...। ये फाग आजादी की लड़ाई के लिए आमजन को जगाने का काम करते थे। गीत जोरजी चांपावत घोड़ा बाजारां में घडि़या रे, राम धरम री सोगन दे दरवाजा जडि़या रे...मोड़ो बतळायौ... भी लोकप्रिय है।
उल्लास की अभिव्यक्ति का पर्व
होली पर किसान व आमजन में खासा उल्लास देखा जाता है। होली दहन से शीतला अष्टमी तक रंग और गैर खेलने की परम्परा की है। यह नृत्य किसान व श्रमिक नए कपड़े पहनकर करते हैं। एक-दूसरे पर रंग डालते है फिर इन कपड़ों को बारह महीने तक पहनते हैं। जो मंगल का प्रतीक माने जाते है।
प्रमोद श्रीमाली
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