
महापर्व : ‘पर्युषण एक सार्वभौम पर्व, जो पूरे विश्व के लिए उत्तम व उत्कृष्ट’
पाली। पर्युषण महापर्व मात्र जैन समाज का पर्व नहीं है। यह एक सार्वभौम पर्व है, जो पूरे विश्व के लिए उत्तम व उत्कृष्ट है। इसमें आत्मा की उपासना की जाती है। संसार में यही एक ऐसा पर्व है, जिसमें साधक आत्मार्थी बनता है। आलौकिक, आध्यात्मिक आनंद के शिखर पर आरोहण करता हुआ मोक्षगामी होने का सद्प्रयास करता है। इसलिए यह पर्व ही नहीं, महापर्व है। पर्युषण पर्व जप, तप, साधना, आराधना, उपासना, अनुप्रेक्षा आदि अनेक प्रकार के अनुष्ठानों का अवसर है।
अज्ञान रूपी अंधकार को मिटता पर्युषण
पर्युषण पर्व निद्रा से उठाकर जागृत अवस्था में ले जाता है। अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाता है। पर्युषण का शाब्दिक अर्थ है, आत्मा में अवस्थित होना। परि उपसर्ग व वस् धातु में अन् प्रत्यय लगने से पर्युषण शब्द बनता है। पर्युषण यानी परिसमन्तात, समग्रतया उषणं वसनं निवासं करणं। इसमें कर्म रूपी शत्रुओं का नाश होता है।
मानव हृदय को करता संशोधित
पर्युषण महापर्व का केंद्रीय तत्व आत्मा है। आत्मा के निरामय, ज्योतिर्मय स्वरूप को प्रकट करने में पर्युषण महापर्व अहम भूमिका निभाता है। यह पर्व मानव को मानव को जोडऩे व मानव हृदय को संशोधित करने का पर्व है। यह मन की खिड़कियों, रोशनदानों व दरवाजों को खोलने का पर्व है।
पर्युषण पर्व की आठ दिनों की रुपरेखा
-पर्युषण पर्व के आठ दिनों को दो विभागों में बांटा गया है। प्रथम के तीन दिन अष्टाह्निका प्रवचन ग्रन्थ के आधार पर प्रवचन होते है। जिसमें पहले दिन श्रावक के पर्वाधिराज में करणीय पांच कर्तव्यों अमारी उद्घोषणा, साधर्मिक वात्सल्य, अट््रठम तप, चैत्य परिपाटी व परस्पर क्षमापना पर प्रवचन होते है। दूसरे दिन वर्ष में करने योग्य 11 कर्तव्यों संघ पूजा, साधर्मिक भक्ति, यात्रा त्रिक, अष्टाह्नीका यात्रा, रथ यात्रा, तीर्थ यात्रा, स्नात्र महोत्सव, देवद्रव्य वृद्धि, महापूजा, रात्रि जागरण, श्रुत पूजा, उद्यापन, तीर्थ प्रभावना व आत्म शुद्धि है। तीसरे दिन साधु जीवन के अंशत: आस्वाद रूप पौषध व्रत की महिमा को प्रवचन के माध्यम से समझाया जाता है।
-उसके बाद के चार दिन कल्प सूत्र को समझाया जाता है। चतुर्थ दिवस सुबह साधु जीवन के दस आचारों का वर्णन, दोपहर में भगवान महावीर स्वामी के 27 भवों का वर्णन, पांचवें दिन भगवान महावीर की जन्म कथा का वर्णन तीसरे और चौथे प्रवचन में बताया जाता है। दोपहर में 14 स्वप्न की बोलियां एवं पालना झुलाने का कार्यक्रम होता है। छठे दिन भगवान महावीर प्रभु के उपसर्गों व गणधरवाद का विवेचन किया जाता है। सातवें दिन शेष 23 तीर्थंकर भगवन्तों का जीवन चरित्रों व भगवान महावीर स्वामी के बाद उनकी पाट पर स्थापित गुरु भगवन्तों अर्थात स्थिरावली का वर्णन होता है। अंतिम आठवें दिन सद्गुरु के मुखारविंद से सूत्र शिरोमणि कल्प सूत्र, बारसा सूत्र, का प्राकृत भाषा में गुंथित मंत्रों का श्रवण करते है।
चातुर्मास के 50 दिन करते थे कल्पसूत्र वाचन
भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण के 980, 993 वर्ष तक चातुर्मास के 50वें दिन पर कल्पसूत्र का वाचन साधु रात्रि के समय और साध्वियों को दिन में सुना दिया करते थे। उसके बाद एक बार आनन्दपुर नगर वर्तमान का वडनगर गुजरात में धु्रवसेन राजा के पुत्र की असमय मृत्यु हो गई। उस समय युगप्रधान आचार्य कालिक सूरि का वर्षावास वहां था। उन्होंने सर्वप्रथम सभा के समक्ष कल्पसूत्र का वाचन प्रारंभ राजा की उपस्थिति में कर उनका शोक दूर किया था।
Published on:
03 Sept 2021 04:41 pm
बड़ी खबरें
View Allपाली
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
