
गरासिया जनजाति की जीवन शैली... संग्रहालय में प्रदर्शित एक मॉडल में गरासिया जनजाति के आवास एवं जीवन शैली को दिखाया गया है। एक मॉडल में गरासिया जनजाति के आवास की रसोई का प्रदर्शन किया गया है, जिसमें स्त्री रसोई के कच्चे आंगन में मिट्टी के चूल्हे पर खाना बना रही है। रसोई में पानी के घडे एवं घरेलू उपयोगी बर्तन रखे हुए हैं।

संग्राहलय में सरस्वती की प्रतिमा बांगड़ संग्राहलय में आकर्षण का केन्द्र सरस्वती की प्रतिमा। यह प्रतिमा संग्राहलय में आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र है।

संग्राहलय में पार्वती की प्रतिमा बांगड़ संग्राहलय में आकर्षण का केन्द्र पार्वती की प्रतिमा।

जैन मूर्ति कला दीर्घा... संग्रहालय पाली में जैन प्रतिमाओं का संग्रह है, जिसे संग्रहालय के मध्य हॉल में प्रदर्शित कर जैन प्रतिमाओं की दीर्घा स्थापित की गई है। इस दीर्घा में पाली एवं जालोर जिले से प्राप्त जैन प्रतिमाओं का प्रदर्शन किया गया है जिनमें जूना खेडा,नाडोल से प्राप्त जैन यक्ष (11-12 वीं शताब्दी), सावीदर भीनमाल से प्राप्त भगवान महावीर स्वामी (13 वीं शताब्दी), सायला, जालोर से मिली चंवरधारी (12-13 वीं शताब्दी) की प्रतिमाएं आकर्षक हैं।

संग्राहलय में गणेश प्रतिमा बांगड़ संग्राहलय में रखी गई भगवान गणेश की खण्डित प्रतिमा।

संग्राहलय में प्रतिमा बांगड़ संग्राहलय में रखी गई एेतिहासिक प्रतिमा।

सुगाली माता प्रतिमा: सन 1857 ई. के पहले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आऊवा की स्थानीय जनता के लिए प्रेरणा स्त्रोत रही सुगाली माता की यह काले रंग की प्रतिमा आकर्षण का केंद्र है। आऊवा ठाकुर कुशाल सिंह द्वारा पूज्य यह उनकी कुलदेवी है। आऊवा किले से प्राप्त हुई इस मूर्ति को अंग्रेज आबू पहाड पर अपने गोदाम में ले गए थे। अंग्रेजों को भय था कि इस मूर्ति (सुगाली माता) में विश्वास करके ही जनता में विद्रोह की भावना पैदा होती है। 12 दिसम्बर,1909 को यह मूर्ति तत्कालीन राजपूताना म्यूजियम अजमेर को दी गई। पाली में राजकीय संग्रहालय की स्थापना के बाद यह मूर्ति अजमेर से पाली लाई गई। इस प्रतिमा में देवी के 10 सिर एवं 54 हाथ है। देवी ने हाथों में अस्त्र-शस्त्र धारण किये हुए हैं। प्रमुख मुख से आधी जीभ बाहर निकली हुई है।