
Gavri Devi - File PIC
राजस्थान की माटी की खुशबू और यहां के पारम्परिक गीतों को वैश्विक पटल पर एक अनूठी और अमिट पहचान दिलाने वाली सुप्रसिद्ध मांड गायिका गवरी देवी अब हमारे बीच नहीं रहीं। सुरों की इस मल्लिका और मरुधरा की अनमोल सांस्कृतिक धरोहर का गुरुवार रात 8 बजे 98 वर्ष की आयु में देसूरी के गवरी नगर स्थित उनके पैतृक निवास पर निधन हो गया। उनके देहावसान की खबर मिलते ही समूचे राजस्थान के लोक कलाकारों, संगीत प्रेमियों और सांस्कृतिक संगठनों में शोक की लहर दौड़ गई है। गवरी देवी केवल एक गायिका नहीं थीं, बल्कि वे मरुधरा की लुप्त होती पारंपरिक मांड गायकी कला का एक जीवंत पर्याय और साक्षात इतिहास थीं।
पारिवारिक सूत्रों और स्थानीय प्रशासन से प्राप्त आधिकारिक जानकारी के अनुसार, गवरी देवी पिछले कुछ समय से उम्र से संबंधित शारीरिक परेशानियों का सामना कर रही थीं। गुरुवार रात को उन्होंने अपने निवास स्थान पर शांतिपूर्वक अंतिम सांस ली। आज शुक्रवार की सुबह 11 बजे पाली के सर्वोदय नगर में पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जा रहा है, जहां प्रदेश के कोने-कोने से लोक कलाकार और संस्कृति प्रेमी उन्हें अपनी अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित करने पहुंच रहे हैं।
गवरी देवी ने अपने जीवन के लगभग 8 दशक पूरी तरह से मांड गायन की साधना और इस प्राचीन लोककला को जीवित रखने में समर्पित कर दिए थे।
राजस्थान की पारंपरिक मांड गायकी को देश और दुनिया के कोने-कोने में लोकप्रिय बनाने में गवरी देवी का योगदान अतुलनीय और बेजोड़ माना जाता है। उनके गाए गीत आज भी राजस्थान के पर्यटन और सांस्कृतिक गौरव की पहचान हैं:
'केसरिया बालम पधारो म्हारे देश': इस राजस्थानी लोकगीत को गवरी देवी ने जिस सोज, गहराई और शुद्ध मांड शैली में गाया, उसने देश-विदेश के करोड़ों श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। आज भी यह गीत राजस्थान आने वाले हर विदेशी मेहमान के स्वागत का मुख्य आधार है।
'मोर बोले मलजी': मारवाड़ और गोडवाड़ अंचल के लोक जीवन को दर्शाने वाले इस सुप्रसिद्ध मांड गीत को गवरी देवी ने अपनी विशेष गायकी शैली से एक नई ऊंचाई प्रदान की थी।
'मैं तो लियो सांवरिया' और 'मस्तान में मस्ती में जैसे': गवरी देवी केवल लोकगीतों तक ही सीमित नहीं थीं, बल्कि उन्होंने भगवान कृष्ण की भक्ति में डूबे इन प्रसिद्ध भजनों और सूफियाना कलामों को भी अपनी आवाज दी, जिसे सुनकर श्रोता पूरी तरह भाव-विभोर हो जाते थे।
गवरी देवी की कलात्मक प्रतिभा और गायकी के प्रति उनके समर्पण का लोहा केवल राजस्थान ने ही नहीं, बल्कि देश की सर्वोच्च सांस्कृतिक संस्थाओं ने भी माना था। अपने लंबे और बेदाग कलात्मक करियर के दौरान उन्होंने कई प्रतिष्ठित मंचों की शोभा बढ़ाई:
दूरदर्शन और आकाशवाणी की मुख्य कलाकार: गवरी देवी ने दूरदर्शन के शुरुआती दौर में राजस्थानी लोक संगीत के प्रसार में मुख्य भूमिका निभाई। उनके कार्यक्रमों को देशव्यापी स्तर पर बहुत चाव से देखा और सुना जाता था।
जवाहर कला केंद्र (JKK) जयपुर: जयपुर के प्रसिद्ध जवाहर कला केंद्र सहित देश के विभिन्न राज्यों में आयोजित राष्ट्रीय कला उत्सवों में उन्होंने मांड गायकी का प्रतिनिधित्व किया और नई पीढ़ी के कलाकारों को इस विधा से जोड़ा।
वीर दुर्गादास राठौड़ लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड: मारवाड़ के वीर शिरोमणि दुर्गादास राठौड़ की स्मृति में दिए जाने वाले बेहद प्रतिष्ठित 'लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड' से भी गवरी देवी को सम्मानित किया गया था, जो उनकी कलात्मक साख का सबसे बड़ा प्रमाण है।
राजनैतिक और सांस्कृतिक विश्लेषकों का मानना है कि गवरी देवी का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि मांड गायकी के उस स्वर्ण युग का अंत है जिसने राजस्थान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सांस्कृतिक महाशक्ति के रूप में स्थापित किया था।
उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए स्थानीय कलाकारों ने कहा, "मांड गायन शैली की बारीकियों और उसकी शुद्धता को बनाए रखने वाली गवरी देवी अंतिम कड़ियों में से एक थीं। उन्होंने व्यावसायिकता के इस दौर में भी अपनी लोककला की मौलिकता के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया। उनका निधन राजस्थान के कला जगत के लिए एक ऐसी अपूरणीय क्षति है, जिसकी भरपाई आने वाले कई दशकों तक संभव नहीं हो पाएगी।"
Updated on:
12 Jun 2026 11:18 am
Published on:
12 Jun 2026 10:47 am
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