
मेरे गांव की कहानी : मैं बगड़ी नगर हूं! वक्त के थपेड़ों ने मुझे भुला दिया, पढि़ए पूरी खबर...
लेख लिलाड़ा लिख दियो, राता लोहिया राज।
बगड़ी! थू ही बणावसी, मरूधर रो महाराज।
रिपोर्ट- महेन्द्र सिंह राठौड़
पाली। राजस्थान के पाली जिले की मैं बगड़ी नगर हूं। वक्त के थपेड़ों ने मुझे भुला दिया। लेकिन, मैं आज भी अपने आगोश में विरासत के कुछ स्वर्णिम तो कुछ खट्टे मीठे पल संजोए हुए हूं। मैं वही गढ़ हूं, जिसने रक्तरंजित इतिहास देखा है तो खुशियों के मेले भी। संवत 1300 के आसपास राव वैरीसालसिंह सिंघल राठौड़ ने अपने नाम पर वैरागढ़ नगर बसाया।
राजधानी बनाकर पौने तीन सौ वर्षों तक राज किया। इस समृद्धि के बाद मंडोर के शासक राव रिडमल के ज्येष्ठ पुत्र राव अखेराज ने अपने पिता के वचन को पालते हुए मंडोर का शासन अनुज राव जोधा को सौंप दिया और स्वयं अजमेर फतेह के लिए निकल पड़े। रास्ते में सोजत के शासक राजसिंह हुल को मारकर वहां शासन किया। अखेराज के पुत्र राव पंचायण ने 1573 में मुझ (वैरागढ़) पर आक्रमण कर सिंघलों को परास्त किया। युद्धकालीन मारकाट व लूटपाट ने मुझे वीरान सा कर दिया। इस बिगड़ी दशा के कारण मेरा स्वरूप व नाम बदल गया और मेरा नाम बगड़ी गढ़ कर दिया गया। इस रक्तपात वाले इतिहास के बाद शून्यता को भी महसूस किया, जब यहां के साहूकार लोग दिसावर व्यापार करने गए और वहीं बस गए।
मैं आपको आगे बताता हूं कि जैन समाज के आचार्य रघुनाथमल ने अपनी तीन मास की तपस्या को यहीं चरम पर पहुंचाकर जिनधर्म का बीजारोपण किया था। मैं गवाह हूं इस अहिंसा यात्रा का, जहां मरुधरा शिरोमणी संत मिश्रीमल व लोकमान्य संत रूप मुनि रजत ने चातुर्मास किए। 1991 में आचार्य तुलसी ने मर्यादा महोत्सव भी किया। जहां मेरी छाती पर पहले तलवारों से इतिहास लिखा जाता था। वहां उजियारा फैलाने जिला शिक्षा व प्रशिक्षण संस्थान खोला गया। यहां से तैयार होकर निकले सैकड़ों शिक्षकों ने पूरे हिन्दुस्तान में ज्ञान ज्योति बिखेर मुझे गौरवान्वित किया। मेरी आंखों के सामने पीर पंजाल भी हुए और बाबा रामदेव को रामसापीर का दर्जा भी मिला। सोलह जीवित समाधियां इस बात की गवाह है। मैंने अंग्रेजों का राज भी देखा है, तब यहां के रेलवे स्टेशन का नाम मेरे वारिसान ठाकुर सज्जनसिंह के नाम पर बगड़ी सज्जनपुर रखा गया। देश आजाद होने के बाद एक नया रेल्वे स्टेशन बगड़ी नगर बना। मुझें याद है कि मारवाड़ के प्रथम स्वाधीनता आन्दोलन की शुरुआत बगड़ी नगर से ही हुई थी। राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास ने मेरी ही मौजूदगी में इस नगर में एक शिक्षक के रूप में सेवाएं दी थी।
मैं आपको अतीत में ले चलता हूं, जब यह नगर किराणा, बारूद, लोहे के ताले, जालियां, चिटखनियां व खरादी व्यापार का बड़ा केन्द्र था। चकले, बैलन, चलगोठा व जैन संतों के पातरे बनाने का काम तो आज भी जारी है। विविधताओं से भरे मेरे इतिहास में एक परंपरा आज तक अटूट है। वह यह कि जोधपुर नरेशों के राज्याभिषेक पर मेरे वारिसान ठाकुर ही अपना अंगूठा चीरकर रक्त से राजतिलक करते हैं। जब संवत 1578 में राव जैतसिंह ने जोधपुर नरेश मालदेव के रक्ततिलक किया, तब यात कवि दुरसा आढ़ा ने दोहा रच कर सुनाया...
Published on:
10 Mar 2019 08:03 pm
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