16 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

सिरोही की तलवार: युद्ध नहीं लड़ती अब दुल्हन ले आती है

-पहले 300 परिवार बनाते थे तलवारें, अब एक ही परिवार

2 min read
Google source verification

पाली

image

Ratan Dave

Jul 25, 2022

सिरोही की तलवार: युद्ध नहीं लड़ती अब दुल्हन ले आती है

सिरोही की एक दुकान पर बिकने के रखी तलवारें।

-रतन दवे
पाली। तलवार यानि युद्ध लडऩे का हथियार। रण में जब तलवारें टकराती तो सिर धड़ से अलग और युद्ध जीतते ही हजारों तलवारें एक साथ ऊंची हो जाती। योद्धा का मतलब ही उसके कमर पर तलवार... लेकिन अब तलवार का जमाना नहीं रहा। युद्ध अब परमाणु तक आ गए है, लिहाजा इन तलवारों का क्या मोल? पर तलवार एकदम हारी भी नहीं है। सिरोह की तलवार...अब भी जिंदा है। हां, अब यह तलवार दुल्हन लाती है। अचरज हुआ न...दरअसल दूल्हे के लिए कई समाजों में तलवार हाथ में होना जरूरी है और इसी वजह से सिरोही की तलवारें अपना वजूद लिए हुए है।

सिरोही के 65 वर्षीय लौहार प्यारेलाल ने तलवार के लिए लोहा गालते हुए उम्र गुजार दी है और वो कहते है सात पुश्तें यही तलवार बनाती रही है। कभी 300 परिवार ही तलवारें बनाते थे और अब एक परिवार है। वे कहते है कि 500 रुपए से 20 हजार तक की तलवार बनाते है और चांदी-सोने की परत चढ़ा दो तो फिर कीमत सोना-चांदी तय करता है।

अब दुल्हन लाती है ये तलवारें
इन तलवारों का अब उपयोग क्या? युद्ध तो नहीं लड़े जाते। प्यारेलाल मुस्कराते हुए कहते है दुल्हन लाती है..., वो कहते है आधुनिक जमाने में न युद्ध रहा न तलवार कौशल। जरूरत ही नहीं,लेकिन एक परंपरा आज भी हमें जिंदा रखे हुए है। शादी में दूल्हे को तलवार की जरूरत रहती है, अधिकांश परिवार इसी वजह से तलवार खरीदते है।

शौकिया बहुत रखते है
तलवार का दूसरा उपयोग वे कहते है कि यह शौक आज भी है कि घर में दीवार पर तलवार रहे। ऐसे लोग आते है। उनको अब ढाल-तलवार और उस पर डिजाइन किया हुआ सेट चाहिए, जिसे वे अपनी होटल और घरों में सजाते है, इसलिए अधिकांश ऑर्डर आते है।

50-60 तलवारें बिकती है अब
अभी सिरोही में प्रतिदिन पचास से साठ तलवार की बिक्री हो रही है। मेलों में ले जाने के लिए और बिकने वाली तलवारें इसमें शामिल है। तलवारों की घटती बिक्री पर प्यारेलाल कहते है, नई पीढ़ी अब कहां लोहा गालने की माथापच्ची करे।

लोहा गुजरात का और पारंपरिक तरीका
सिरोही की तलवार के लिए लोहा अहमदाबाद गुजरात से आता है। करीब 900 ग्राम की वजह की तलवार बनती है। लोहा गालकर हथौड़े से पीटकर तलवार बनती है। करीब 12 दुकानें सिरोही में तलवार की है। बताते है कि पहले इन तलवारों में जहरीला बनाया जाता था ताकि वार होते ही दुश्मन मौत के घाट उतर जाए,अब सजावट पर ध्यान दिया जाता है। धार अब इतनी तेज नहीं चढ़ाते,जितनी पहले होती थी।