
पाली/नाडोल. जिले का गोडवाड़ क्षेत्र जिसकी सुंदरता आज भी हर किसी को आकर्षित करती है। वहां आज से करीब 1100-1200 साल पहले भी एक वैभवशाली सभ्यता थी। वैभव भी ऐसा कि वहां कई आक्रांताओं ने आक्रमण किया। कालान्तर में वह वैभवशाली सभ्यता जमींदोज हो गई, लेकिन उसकी गौरव की गाथा वहां के पत्थर आज भी गा रहे हैं। नाडोल स्थित जूनाखेड़ा में आज से कुछ साल पहले खुदाई करने पर एक वैभवशाली नगर के अवशेष सामने आए। अब वहां चल रही खुदाई में औद्योगिक क्षेत्र विकसित होने के अवशेष मिले है। वहां एक-दो नहीं, करीब आठ-नौ भट्टियां मिली है। जो करीब आठ-नौ फीट की गहराई तक है। इन भट्टियों में लोहे को पिघलाकर हथियार व बर्तन बनाने का कार्य होता था। इसके साथ ही पुरातत्ववेता यहां आयरन के अलावा अन्य सामग्री का कार्य होना भी बता रहे हैं। जो उस समय के विज्ञान व ज्ञान के विकास को दर्शाता है।
मिले हैं दो छोटे कक्ष
भट्टियों के पास ही सामग्री रखने के दो कक्ष भी मिले है। इनमें मिट्टी के बर्तन भी मिले। जिनमें फैक्ट्रियों में आयरन के औजार आदि बनाने के उपयोग में आने वाली सामग्री रखी जाती थी। एक तेल निकालने की घाणी भी मिली है। जो इस बात को दर्शाती है कि यहां तेल का भी उपयोग होता था। इसके साथ ही जलाने के लिए कोयला उपयोग में लिए जाने के संकेत भी मिले है। लकड़ी व कोयले की राख तो काफी जगह मिली है। उसी के आधार पर यहां भट्टियां होने का अनुमान लगाया गया है।
उठेगा पर्दा, सामने आएगी हकीकत
जिस जगह पर आयरन की भट्टियां मिली है। उस जगह के इतिहास को कुरेदने के लिए इसके पास ही हाल में खुदाई शुरू की गई है। हालांकि वहां अभी तक कुछ नहीं मिला है, लेकिन पुरातत्ववेताओं की माने तो यहां पांच-सात फीट की खुदाई के बाद सामने वाले अवशेषों से इतिहास के बारे में अधिक जानकारी मिल सकेगी। इसके साथ ही यह भी खुलासा हो सकेगा कि वास्तव में आयरन से क्या-क्या बनाया जाता था।
संघर्ष के है निशान
पुरातत्ववेताओं के अनुसार यह उस जमाने का सबसे प्रसिद्ध क्षेत्र था। मालवा व गुजरात जाने का रास्ता था। इसके साथ ही उस क्षेत्र से आने का मार्ग भी यहीं होने के कारण जो भी इस क्षेत्र में आया उसके साथ यहां के निवासियों का संघर्ष हुआ। यहां मिलने वाले मानव कंकाल भी किसी प्राकृतिक आपदा के संकेत नहीं दे रहे हैं। वह संघर्ष की दास्ता कह रहे है। हाल ही में यहां दो कंकाल खुदाई में मिली भट्टियां के पास भी मिले हैं।
चौहान वंश की था राजधानी
जूनाखेड़ा चौहानवंशीय राजाओं की राजधानी था। यह साम्राज्य बाड़मेर व जालोर तक फैला था। यहां की गई खुदाई में मृदभाण्ड व प्राचीन पाषाण प्रतिमाओं के साथ ताम्रपत्र, सिक्के व मंदिर के अवशेष प्राप्त हुए है। इनमें मृदभाण्ड से बनी सुर-सुन्दरी व पाषाण की बनी सरस्वती की प्रतिमा बहुत आकर्षक है।
सिक्का चौहान काल का नहीं
यहां एक सिक्का भी मिला है। जिसे चौहान काल का नहीं माना गया है। उसके बाद के समय का है। इसके अलावा माटी की सिलिंग, आयरन के उपकरण और चूडिय़ां आदि भी इस स्थान पर मिल चुके है। यहां बनी दीवारे भी उस समय के इतिहास और वैभव की कहानी बता रही है।
बस्ती व औद्योगिक क्षेत्र अलग-अलग
इस सभ्यता में बस्ती और औद्योगिक क्षेत्र अलग-अलग थे। बस्ती के अवशेष कुछ साल पहले यहां हुई खुदाई में मिले थे। जो यहां से कुछ दूरी पर है। उस क्षेत्र में खिलौने बर्तन आदि मिले थे। इस क्षेत्र में भट्टियां अधिक मिल रही है। यह सभ्यता भी भूकम्प आदि से नहीं मिटी। यह संघर्ष की कहानी कहती है।
रजीनकांत वर्मा, वरिष्ठ प्रारूपकार, पुरातत्व विभाग
Updated on:
06 Feb 2018 11:48 am
Published on:
05 Feb 2018 02:33 pm
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