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खाखरे बनाने के हुनर ने विमला को दिलाई पहचान

- स्वयं सहायता समूह गठित कर शुरू किया खाखरे का व्यापार - 20 से अधिक महिलाओं को जोड़ा स्वरोजगार से

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पाली. रसोई कार्य में निपुण शहर के रामबास निवासी विमला तलेसरा स्वादिष्ट भोजन के साथ अन्य कई तरह के पकवान घर पर ही बना लेती थी, जिसमें से एक था खाखरा। जिसका स्वाद चखने के बाद उनकी एक रिश्तेदार महिला ने उन्हें घर पर ही खाखरा बनाने का कार्य शुरू करने का आइडिया दिया, जो कि विमला देवी को पसंद आ गया। इस पर विमला ने स्वयं सहायता समूह गठित कर कुछ महिलाओं के साथ काम शुरू किया। शुरुआत मोहल्ले में खाखरे बेचने से की। उनके बनाए खाखरों का स्वाद लोगों को अच्छा लगने लगा तो धीरे-धीरे डिमांड बढऩे लगी। आज वे सालाना 10 से 15 लाख रुपए का टर्नओवर का काम घर पर बैठे-बैठे कर रही है और 20 महिलाओं को रोजगार भी उपलब्ध करवा रही है। इनके बनाने खाखरों की डिमांड पाली सहित महाराष्ट्र व दक्षिण भारत के राज्यों तक है।

रामबास (बादशाह का झंडा) निवासी केलवचंद तलेसरा की पत्नी विमला तलेसरा ने बताया कि करीब पांच वर्ष पूर्व यह काम शुरू किया। रिद्धि-सिद्धि स्वयं सहायता समूह गठित कर महिलाओं को जोड़ा। वर्तमान में पांच-छह तरह के खाखरे सहित खिचिया, राबोड़ी, बडिय़ा आदि बनाकर बेचते हैं। विमलादेवी ने बताया कि बहू तान्या व अन्य महिलाओं के साथ खाखरे बनाने का कार्य करती है। इसके लिए महिलाओं को एक निश्चित रुपए भी देती है। खाखरों की डिमांड ऐसी है कि घर आकर लोग खरीद कर ले जाते है।

यह-यह आइटम बनाते है

रिद्धि-सिद्धि स्वयं सहायता समूह खोल कर विमला देवी ने अपने काम को विस्तार दिया। वर्तमान में मैथी, बेसन, मोगर, कोरमे सहित मसाले के खाखरे, मटरी, मसाला पापड़ी, खिचिया, बडिय़ा, राबोड़ी आदि बनाते है। इसके साथ ही त्यौहार के अनुसार खाद्यान सामग्री बनाने व यात्रा के दौरान डिमांड पर भोजन पैकेट भी तैयार करते हैं।

महिलाओं की खुशी में मेरी खुशी

विमला तलेसरा ने बताया कि घर का काम करने के बाद फ्री रहने लगी तो एक रिश्तेदार की सलाह पर यह कार्य शुरू किया। मेरे बनाए खाखरे की लोग तारीफ करते हंै तो काफी अच्छा लगता है। मुझे इस बात की खुशी है कि इस काम के जरिए बीस से अधिक महिलाओं को भी रोजगार मिल रहा है।