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BIG EXPOSE: MP के इस जिले में खून की प्यासी हैं सड़कें

हर तीसरे दिन हो रही एक की मौत  

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panna bus accident

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पन्ना. जिले की सड़कें खून की प्यासी हो गई हैं। यहां औसतन हर तीन दिन में एक व्यक्ति सड़क हादसे में दम तोड़ रहा है। जिले में बीते चार साल में साढ़े नौ सौ से भी अधिक हादसे हुए हैं, जिनमें साढ़े चार सौ से अधिक लोगों की मौत हो गई और एक हजार से अधिक घायल हैं। 4 मई 2015 को भैरोटेक घाटी में हुए हादसे की घटना को याद करके ही लोग सहम जाते हैं। हालात यह थे कि हादसे के बाद लोगों ने कुछ दिनों तक उक्त मार्ग से आवागमन तक बंद कर दिया था। जिले में करीब आधा दर्जन ऐसे स्थान हैं जहां 10 या उससे अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। अंधे मोड़, खुदी सड़कें और खस्ताहाल घाटियां हादसों की मुख्य वजह बनी।

सबसे अधिक हादसे इस सड़क पर
जिले में सबसे अधिक हादसे तीन साल से अधिक समय से निर्माणाधीन सतना-बमीठा मार्ग पर हुए हैं। विभागीय आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2014 से 17 तक जिले में कुल 955 हादसे हुए हैं, जिनमें मरने वालों की संख्या 453 है और करीब 1200 लोग घायल हुए। इनमें से कई जीवनभर के लिए अपाहिज भी हो गए हैं।

जिले में एक सैकड़ा ब्लैक प्वाइंट, 5 डेंजर जोन
यातयात विभाग द्वारा लगातार हो रहे हादसों को लेकर जिले में 91 ब्लैक प्वाइंट चिह्नित किया गया है। कोतवाली थाना क्षेत्र में 6 ब्लैक और तीन डेंजर जोन चिह्नत हैं। डेंजर जोन में मोहनगढ़ी, सकरिया और स्मृति वन का क्षेत्र शामिल है। इसी तरह देवेंद्रनगर थाना क्षेत्र में 10 ब्लैक प्वाइंट, गुनौर थाना क्षेत्र में 7, सलेहा में 5, अमानगंज में 8, अजयगढ़ में 10, धरमपुर में 6, बृजपुर में 3, मड़ला में 5, रैपुरा में 6, शाहनगर में 11, सेमरिया में 6, पवई में 8 ब्लैक प्वाइंट चिह्नित हैं। मड़ला में पांडव फॉल के पास की पुलिया और शाहनगर थाना क्षेत्र में आमा नर्सरी के पास का क्षेत्र डेंजर जोन में शामिल किया गया है।

बस हादसे के बाद भी सिर्फ गाल बजाते रहे नेता-अधिकारी
सतना-छतरपुर नेशनल हाइवे पर 4 मई 2015 को प्राची बस सर्विस की बस क्रमांक एमपी 35 पी 0239 भैरोटेक घाटी के मोड़ के पास बिना रेलिंग की पुलिया से अनयंत्रित होकर नीचे गिर गई थी। हादसे के बाद बस में आग लग जाने से कई लोग जिंदा जल गए थे और करीब 40 लोग घायल हुए थे। इस हादसे के बाद बसों में दूसरा दरवाजा लगाने और आपातकालीन खिड़की अनिवार्य रूप से रखने के निर्देश जारी हुए थे। साथ ही बसों में ज्वलनशील सामग्री के परिवहन पर प्रतिबंध लगाया गया था, लेकिन हादसे के बाद अधिकारी और नेता सिर्फ गाल बजाने में ही व्यस्त रहे। आज तक परिस्थितियों में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है।