
Skateboarding park in panna janwaar village
पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिला स्थित जनवार गांव को स्केट बोर्ड गांव के नाम से जाना जाता है। जर्मन महिला उलरिके रेनहर्ट के प्रयास से आज आदिवासी बाहुल्य गांव के बच्चे आसमान में करतब दिखाते है। इनकी भेस-भूसा भी विदेशियों की तरह ही है। यहां की फैशन स्टाइल के आगे मुंबई भी फीका हो जाएगा। बताया गया कि सामाजिक बदलाव के साथ-साथ खेलों के उपयोग के लिए आदिवासी बहुल गांव जनवार में जिस तरह से सफल प्रयोग हुआ है वह पूरे देश के लिए उदाहरण बन गया है।
चंद वर्षों में स्थानीय लोगों के सहयोग से देश का पहला और सबसे बड़ा रूरल स्केट बोर्ड पार्क तैयार कर एक प्रयोग किया। यहां से बदलाव के असली नायक के रूप में अरुण और दुर्गा जैसे बच्चे निकल रहे हैं। आदिवासी किशोर अरुण के स्केट बोर्ड पर दिखाए जा रहे हैरत अंगेज करतब पर अच्छे-अच्छे लोग आवाक रह जाते हैं।
खेल मंत्रालय के दल ने देखा आदिवासी किशोर का करतब
खेलों से सामाजिक बदलाव की कहानी देखने खेल मंत्रालय के प्रतिनिधि पन्ना आए। यहां ३ दिन तक रुके और अरुण सहित गांव के अन्य बच्चों के स्केट बोर्ड पर करतब देखे। दल ने अरुण और अन्य बच्चों के खेल के स्तर की सराहना की। हालांकि अभी चयन की जानकारी नहीं मिली है, लेकिन पार्क से जुड़े लोगों का मानना है कि अरुण और अन्य बच्चे देश के किसी भी बड़े खेल मैदान में धूम मचा सकते हैं। उरलिके बताती हैं, हमारा प्रयास नंबर वन स्पोट्र्समैन तैयार करना नहीं है। हम खेल से सामाजिक बदलाव लाना चाहते हैं, जिसमें अरुण और दुर्गा जैसे बच्चे इस बदलाव में भूमिका निभा रहे हैं। यही बच्चे हमारे बदलाव के असली नायक हैं।
बच्चों के लिए बना आदर्श
तब जनवार में स्केट बोर्ड पार्क की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली जर्मन महिला उलरिके रेनहर्ट बताती हैं कि हमने खेलों से सामाजिक बदलाव लाने का प्रयास किया, जिसमें अरुण की प्रतिभा सामने आई। यूरोप से लौटने के बाद वह खेल के साथ ही समाज के लोगों को आगे बढ़ाने के महत्व को समझने लगा है। वह खेल और बाहर की दुनिया के बीच अच्छी तरह से तालमेल बैठा लेता है। पूरी जिम्मेदारी के साथ खतरे उठाने वाला खिलाड़ी है और बच्चों के लिए बेहतरीन प्रशिक्षक बन गया है। सामाजिक बदलाव और रीति रिवाजों पर वह अपनी बात खुलकर रखता है। आज वह देश के हर बच्चे के लिए आदर्श बन गया है। वह जनवार में आ रहे सामाजिक बदलाव का सच्चा नायक बनकर उभरा है।
बीते साल गया था यूरोप
बीते साल पांच सप्ताह के लिए अरुण यूरोपियन कल्चर को समझने और स्केट बोर्डिंग के लिए यूरोप गया था। लौटने के बाद उसमें आए बदलाव को लोग बहुत ही पास से देख रहे हैं। आज उसकी तैयारी इस स्तर की है कि वह स्केट बोर्ड में देश और प्रदेश के किसी भी मैदान में धूम मचा सकता है। खेल के दौरान वह बड़े से बड़ा रिस्क तो उठाता ही है, साथ ही उसके लिए जमकर तैयारी भी करता है। अरुण बच्चों को स्केटिंग का पाठ पढ़ाता है।
Published on:
05 Jun 2018 01:39 pm
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