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ननिहाल: संस्कार, प्यार, दुलार और मस्ती की पाठशाला

इन दिनों बच्चों की परीक्षाओं का समय चल रहा है। इसके बाद उनकी छुट्टियां होंगी। लेकिन पहले जहां परीक्षा समाप्ति के तुरंत बाद ननिहाल जाने की एक परंपरा थी, वह अब धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। ननिहाल में बच्चे को संस्कार, प्यार और मस्ती की पाठशाला का अनुभव होता था।

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ननिहाल: संस्कार, प्यार, दुलार और मस्ती की पाठशाला

ननिहाल: संस्कार, प्यार, दुलार और मस्ती की पाठशाला

ऋतुओं का संधि पर्व
गर्मी की छुट्टियां ऐसे मौसम में होती हैं जब लगभग सभी विद्यालयों में अवकाश होते हैं। अंत में ऋतुओं का संधि पर्व होता है। गर्मी पड़ती है। फसलें और फल परिपक्व होकर उपयोग लायक होते हैं। ऐसे में उत्साह और उल्लास अपने आप में बढ़ जाता है।

रिश्तों में जीवंतता
दिलों में रिश्तों को जीवंत करने का स्थान ननिहाल होता है, क्योंकि प्यार तो हर जगह मिलता है। समाजशास्त्र की भाषा में दुलार ननिहाल में मिलता है। दुलार का तात्पर्य गलतियों पर दंड नहीं बल्कि पुचकार कर उनको सुधारना होता है।

मिलती है सालभर के लिए ऊर्जा
ननिहाल में नाना-नानी की कहानियां, नए पकवान, आते समय मिलने वाले नए कपड़े, नए सामान, सालभर के लिए उत्सुकता की पूंजी प्रदान करते थे और उन्हीं यादों को लेकर बच्चा अपनी पढ़ाई में फिर व्यस्त हो जाता था तो उसे भारी भरकम बैग बोझ नहीं लगता था। बल्कि उत्साह लगता था।

बनते संवेदनशील
नानी के घर जाने का मतलब बच्चों के उत्सुकता के साथ-साथ उनमें स्वतंत्रता का एक नया भाव जिसमें बच्चे बे-रोकटोक स्वच्छंद रूप से खेल सकें। मनमानी कर सकें। अपने ममेरे भाई-बहनों के साथ उछल कूद कर सकें। यही तो बचपन होता है। इसका परिणाम यह होता था कि स्वतंत्रता और सहजीवन से उनके अंदर संवेदनशीलता जाग्रत होती थी और यही संवेदना आगे चलकर के रिश्तों को निभाने के लिए समाज के प्रति दया, करुणा और प्रेम का स्रोत बनती है।

पारिवारिक व सामाजिक प्रशिक्षण
संबंधों की जीवंतता का मतलब व्यक्ति के स्वभाव की जीवंतता, जिसमें निर्मलता, सदस्यता और समाज के प्रति जिम्मेदारी सीखने का सामाजिक कारण होता है। ननिहाल में जाकर बच्चा जब एक समाज से अर्थात अपने घर से अपने मामा के घर जाता है तो यह दो प्रकार के समाजों से जुड़ता है। यह व्यक्ति सह जीवन जीने के लिए, सामंजस्य रखने के लिए, सहअस्तित्व के लिए ,सामाजिक सरोकारों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए गर्मियों में ननिहाल जाकर एक तरह का प्रशिक्षण हासिल करता है।

अपने वक्त को संभाल कर रखिए
आज की परिस्थितियों में शिक्षा के सत्र इतने असामान्य हो गए हैं कि गर्मी की छुट्टियां इसी में विलुप्त हो गई हैं। किसी के पास वक्त नहीं है। किसी ने ठीक ही कहा है कि अपने वक्त को संभाल कर रखिए क्योंकि वक्त से बढ़कर जेबकतरा कोई नहीं।

अब भी है समय
समय भले ही कितना भी बदल गया हो, लेकिन अब भी समय है कि बच्चे नाना-नानी के घर जाएं। अब जरूरत है कि दादा-दादी के भी पास जाएं, मस्ती करें। उनके अनुभव सुनें। उनसे कहानियां सुनें। यह जीवन के अनमोल समय का पूरा सदुपयोग है। यह समय वापस नहीं आएगा। बच्चों को उनका बचपन पूरा दें। मां के साथ ही बच्चे जाते हैं। मां समय निकालकर बच्चों के साथ उनके ननिहाल जाए और जीवन के अनमोल समय का आनंद लें।


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