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नाबालिग को जेल भेजने पर हाई कोर्ट की पुलिस को फटकार, 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश

जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और रितेश कुमार की बेंच ने कहा, जांच अधिकारी ने बिना किसी ठोस सबूत के याचिकाकर्ता, जो कि 16 साल से कम उम्र का छात्र है, को गिरफ्तार कर लिया।

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bihar excise act | पटना हाई कोर्ट

पटना हाई कोर्ट

पटना हाई कोर्ट ने नाबालिग छात्र की गिरफ्तारी और उसे जेल भेजने पर पुलिस की कार्रवाई पर तल्क टिप्पणी करते हुए कहा कि कोर्ट पुलिस की इस "गैर-कानूनी" पर मूक दर्शक नहीं बना रह सकता है और उन्होंने सरकार को पीड़ित को 5 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का आदेश दिया। पटना हाई कोर्ट के जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और रितेश कुमार की बेंच लड़के के परिवार वालों द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (शरीर पेश करो) याचिका पर सुनवाई करते हुए ये बातें कही। पुलिस ने नाबालिग छात्र को 23 अक्टूबर, 2025 को गिरफ्तार किया गया था।

कोर्ट ने पुलिस की जांच पर खड़े किए सवाल

जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और रितेश कुमार की बेंच ने कहा, जांच अधिकारी ने बिना किसी ठोस सबूत के याचिकाकर्ता, जो कि 16 साल से कम उम्र का छात्र है, को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस इस मामले में ऐसा नहीं कर सकती थी।" कोर्ट ने पुलिस की इस कार्रवाई पर सुनवाई करते हिए कहा कि "हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यह याचिकाकर्ता की गैर-कानूनी गिरफ्तारी का मामला है और ऐसी स्थिति में, यह कोर्ट, एक संवैधानिक कोर्ट होने के नाते, मूक दर्शक नहीं रह सकता।" बेंच ने मजिस्ट्रेट को लड़के को उसकी अवैध गिरफ्तारी से "बचाने में नाकाम रहने" के लिए भी फटकार लगाई।

5 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का दिया आदेश

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि , "जांच एजेंसी द्वारा शक्ति के दुरुपयोग और याचिकाकर्ता के अधिकार और स्वतंत्रता की रक्षा करने में कोर्ट की विफलता के कारण, उसे अब तक ढाई महीने से ज़्यादा समय तक जेल में रहना पड़ा है।" बेंच ने लड़के की "गैर-कानूनी गिरफ्तारी और हिरासत" को देखते हुए उसे 5 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का आदेश दिया। बेंच ने कहा कि यह लागत राज्य पर इसलिए डाली जा रही है "क्योंकि एक अधिकारी द्वारा शक्ति का दुरुपयोग किया गया है, इसलिए यह लागत और मुआवज़े की राशि दोषी अधिकारियों से वसूल की जानी चाहिए"।

जांच अधिकारी से वसूले पैसा

कोर्ट ने बिहार के पुलिस महानिदेशक को मामले में प्रशासनिक स्तर पर जांच करने और "जांच प्रक्रिया के दौरान सामने आने वाले सबूतों के आधार पर उचित कार्रवाई करने और दोषी अधिकारियों से लागत और मुआवज़े की राशि वसूल करने" का भी निर्देश दिया है।

कोर्ट ने पुलिस को क्यों लगाई फटकार

कोर्ट ने कहा कि मधेपुरा के पुलिस अधीक्षक के कार्यालय से मिले पत्र से पता चलता है कि घटना की तारीख को याचिकाकर्ता लगभग 15 साल, 6 महीने और 8 दिन था। अर्थात याचिकाकर्ता को नाबालिग घोषित किया गया था। पुलिस ने याचिकाकर्ता को गिरफ्तार कर उसकी आज़ादी छीन ली है और पुलिस अधिकारियों के काम से उसके जीवन और आज़ादी के अधिकार का उल्लंघन हुआ है।

कोसी रेंज के DIG का आरोपों को सच मानकर मामले की जांच करने का निर्देश, निर्दोषता की धारणा के सिद्धांतों के खिलाफ है, जो आपराधिक कानून न्यायशास्त्र का मुख्य सिद्धांत है।

जांच अधिकारी ने बिना किसी ठोस सबूत के याचिकाकर्ता, जो 16 साल से कम उम्र का छात्र था, को गिरफ्तार कर लिया। वह इस मामले में ऐसा नहीं कर सकता था।

यहां तक ​​कि मजिस्ट्रेट ने भी मामले के इन पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया और सीधे याचिकाकर्ता को जेल भेज दिया।
पृष्ठभूमि

बिहार के मधेपुरा जिले के एक गांव में दो समूहों के बीच हुई मारपीट के बाद लड़के को, जिसका प्रतिनिधित्व वकील शाश्वत कुमार और अमन आलम कर रहे थे, गिरफ्तार किया गया था। BNS की विभिन्न धाराओं, जिसमें हमला, दंगा और गैरकानूनी सभा शामिल हैं, के तहत एक FIR दर्ज की गई और मामले में कई आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।

लड़के का नाम आरोपी के तौर पर होने के बावजूद, मामले में उसके खिलाफ चार्जशीट दायर नहीं की गई थी। रिकॉर्ड में आया कि जांच अधिकारी के पास याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई सबूत नहीं था, लेकिन उसने पिछले साल 23 अक्टूबर को नाबालिग को गिरफ्तार कर लिया, उसकी उम्र 19 साल बताई और उसे कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया।