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बिहार में चुनावी चेहरे पर सियासत लेकिन नीतीश कुछ भी कहने से बचे!

पटना। आगामी लोकसभा चुनाव से पहले बिहार में चुनावी चेहरे पर सियासत तेजहो गई है।
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पटना

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Shailesh pandey

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Updated: 5 Jun 2018, 2:33 PM IST

nitish kumar

nitish kumar

(प्रियरंजन भारती) पटना। आगामी लोकसभा चुनाव से पहले बिहार में चुनावी चेहरे पर सियासत तेजहो गई है। सत्तारूढ़ जदयू ने गठबंधन में बड़े भाई की भूमिका बताकर पच्चीस सीटों और नीतीश कुमार की अगुआई में चुनाव लडऩे के लिए ताल ठोक दी है। इस पर दोनों दलों भाजपा एवं जदयू के बीच गरमाहट है। जानकार बताते हैं कि नीतीश कुमार का यह नया दांव है। उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने खुलकर कह दिया कि गठबंधन के नेता नीतीश कुमार ह़ैं। अगले चुनाव में नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रदर्शन पर वोट मांगा जाएगा। जबकि भाजपा के दूसरे नेता नरेंद्र मोदी के चेहरे पर ही वोट मांगने की बात कर रहे हैं। असल में भाजपा नेता जानते हैं कि सीटों का तालमेल दिल्ली में तय हो। लिहाजा केंद्र के कहने पर ही बोलना या अधिक कुछ बोलने से बचना है।

नीतीश का टिप्पणी से इनकार

इस बीच मुख्यमंत्री और जदयू अध्यक्ष नीतीश कुमार ने सोमवार देर शाम अपने घर इफ्तार दावत में इस बाबत कुछ कहने से इंकार कर दिया कि चुनाव में चेहरा कौन होगा। नीतीश कुमार को चुनाव में गठबंधन के चेहरे के बतौर पेश करने की जदयू की मांग पर उन्होंने कोई टिप्पणी करने से इंकार कर दिया और कहा कि समय आने पर आप को सब कुछ बता दिया जाएगा। इफ्तार के दौरान उन्होंने कहा कि इस खास मौके पर हम सभी चेहरे पर खुशी देखना चाहते हैं। नीतीश ने चुटकी भी ली कि किसी और चेहरे पर कृपया अभी कोई बात नहीं करें।

आखिरकार है क्या माजरा

नीतीश कुमार को समझने वाले जानते हैं कि उनकी चुप्पी और चाल में गहरे अंतर होते हैं कोई आसान तरीके से यह तय नहीं कर पाएगा कि नीतीश आगे करेंगे क्या। यह तय है कि वह दबाव की रणनीति पर काम कर रहे हैं। उन्हें विशेष राज्य की मांग और पटना विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा नहीं मिलने के मामलों में भाजपा से हिसाब भी लेना है। दोनों ही मामलों में भाजपा ने आगे बढ़कर बातें कीं पर मौका आया तो किनारा कर लिया। पटना विवि के कार्यक्रम में आए प्रधानमंत्री के समक्ष नीतीश केंद्रीय दर्जा देने का बखान करते रहे लेकिन प्रधानमंत्री ने इसे वल्र्ड क्लास बनाने का टास्क देकर सभी को ठगा सा छोड़ दिया था। अब चुनाव के पहले नीतीश की पार्टी इन सब का हिसाब बराबर करने में जुट गई है।

2009 के फार्मूले से मांगी 25 सीट


नीतीश कुमार एक मंजे राजनेता की तरह सीटों पर तालमेल का दबाव बना रहे हैं। इसी के तहत 2009 के फार्मूले को सामने रखकर अपने दल के लिए 25 सीटों की मांग कर डाली है। 2009 में भाजपा 15 और जदयू 25 सीटों पर चुनाव में उतरे थे। लेकिन 2019 में यह संभव इसलिए नहीं लगता कि भाजपा ने 2014 के चुनाव में नीतीश से अलग रहते हुए और रामविलास पासवान तथा उपेंद्र कुशवाहा के साथ मिलकर 31 सीटें जीत लीं। भाजपा अकेले ही 22 सीटें जीतने में कामयाब हो गई। कुशवाहा तीन सीटों पर लड़े और शत प्रतिशत जीत दर्ज की। जबकि पासवान की पार्टी को 6 सीटें मिल गईं। सभी को पता है कि ऐसा केवल नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के मुद्दे पर ही संभव हो सका।

ज्यादा सीटों पर निगाह

जदयू के अधिक सीटों की मांग इस बात का दबाव भी है कि भाजपा अपनी जीती हुई कुछ सीटें उसके लिए छोड़ दे। यह तभी संभव है जब भाजपा अपने कुछ सांसदों के टिकट काट ले। नीतीश जानते हैं कि दरभंगा, झंझारपुर, बेगूसराय सहित कुछ सीटों पर भाजपा के उम्मीदवारों में खींचतान है। इसका फायदा उठाकर वह अपने लोगों के लिए अधिक सीटें झटक लेने की योजना बनाकर चल रहे हैं। रालोसपा नेता उपेंद्र कुशवाहा और अरूण कुमार के झगड़ों पर भी उनकी नजर है। योजनाबद्ध तरीके से उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी यदि गठबंधन से किनारा भी कर गई तो नीतीश उन सीटों को झटक लेने की लालसा लिए दबाव बढ़ाए रखना चाह रहे हैं।