
हरिवंश नारायण सिंह-तेजस्वी यादव। फोटो -AI
Rajya Sabha Election 2026: बिहार से राज्यसभा की पांच सीटों के लिए चुनाव की घोषणा ने दावेदारों की धड़कन बढ़ा दी है। इस चुनाव की घोषणा के साथ सबसे ज्यादा चर्चा आरजेडी को लेकर हो रही है। क्या आरजेडी राज्य की 5वीं सीट के लिए अपना प्रत्याशी उतारेगी या फिर एनडीए को कओवर देगी। इसके साथ ही एक चर्चा और हो रही है कि क्या मौजूदा उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह को जदयू फिर अपना प्रत्याशी बनायेगी? जदयू के टिकट पर हरिवंश दो कार्यकाल पूरा कर चुके हैं। जीतन राम मांझी और चिराग पासवान में किसकी पार्टी से कौन प्रत्याशी बनेगा? इसको लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।
राज्यसभा सांसद हरिवंश, उपेंद्र कुशवाहा, रामनाथ ठाकुर, प्रेमचंद गुप्ता और एडी सिंह का कार्यकाल अप्रैल में खत्म हो रहा है। इनमें आरजेडी के दो राज्यसभा सांसद प्रेमचंद गुप्ता और अमरेंद्र धारी सिंह का कार्यकाल अप्रैल में खत्म हो रहा है। ये दोनों आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद के बेहद करीब हैं। इसके साथ ही ये दोनों पार्टी के खजाने के मजबूत खंभे भी माने जाते हैं। राज्यसभा के प्रत्येक सीट के लिए 41 विधायकों का वोट की जरूरत है। लेकिन, 2025 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी 243 में मात्र 25 सीटों पर जीत दर्ज कर पाई। कांग्रेस को 6, सीपीआई-एमएल के 2, सीपीएम और आईआईपी के 1-1 इस प्रकार कुल 35 विधायक होते हैं। जबकि राज्य सभा सदस्य को जीतने के लिए 41 विधायकों की जरूरत है। आरजेडी को एक सीट जीतने के लिए कम से कम 6 और विधायकों की जरूरत है। विपक्ष में एआईएमआईएम के 5 और बसपा के 1 विधायक हैं, लेकिन वो आरजेडी को समर्थन देंगे, इसपर संश्य है। आरजेडी को इनका अगर इनका समर्थन मिलता है तो दो में से एक राज्यसभा सीट पर आरजेडी के प्रत्याशी जीत सकते हैं।
एनडीए के पास 202 विधायक हैं। इसके हिसाब से उनके चार सीट तो पक्की मानी जा रही है। सारा मसला 5वीं सीट को लेकर फंस रहा है। जिसे जीतने के लिए एनडीए को जरूरत से मात्र 3 वोट कम हैं। 41-41 वोट के हिसाब से एनडीए के 164 विधायक एनडीए के 4 सांसद को जीता सकते हैं। इसके बाद भी एनडीए के पास 38 वोट बचते हैं, जो कि 5वीं सीट के लिए महागठबंधन से ज्यादा करीब है। ऐसे में यह मुकाबला रोचक बन गया है।
हरिवंश नारायण सिंह अप्रैल 2014 से राज्यसभा सदस्य हैं। अगस्त 2018 से उपसभापति पद संभाल रहे हैं। संसदीय कार्यवाही के संचालन में उनकी संयमित शैली और विभिन्न दलों के बीच उनकी स्वीकार्यता व्यापक रूप से सराही जाती रही है। लेकिन, वर्ष 2022 में उनकी भूमिका को लेकर पार्टी के भीतर असहजता की स्थिति उत्पन्न हुई। दरअसल, 2022 में जब जदयू ने बिहार में भाजपा से अलग होकर महागठबंधन के साथ सरकार बनाई, तब भी हरिवंश ने उपसभापति पद से इस्तीफा नहीं दिया था। पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं की अपेक्षा थी कि वे पार्टी लाइन पर चलते हुए पद छोड़ दें, लेकिन उन्होंने इसे संवैधानिक मर्यादा और संसदीय परंपरा का विषय बताकर पद पर बने रहना उचित समझा। उनके इस निर्णय के कारण पार्टी के भीतर उनके नाम पर सर्वसम्मति बनती नहीं दिख रही है।
इधर, केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री राम नाथ ठाकुर के नाम पर अपेक्षाकृत अधिक सहमति बनती नजर आ रही है। उनके समर्थकों का तर्क है कि वे अति पिछड़ा वर्ग से आते हैं और पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के पुत्र हैं, जो जदयू के सामाजिक आधार के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में पार्टी के भीतर रामनाथ ठाकुर की दावेदारी मजबूत मानी जा रही है।
Updated on:
19 Feb 2026 06:30 pm
Published on:
19 Feb 2026 06:29 pm
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