
सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर (फोटो- AI)
India influencer marketing industry : भारतीय डिजिटल बाजार और सोशल मीडिया की दुनिया में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। दिल्ली और मुंबई के महंगे सेलिब्रिटीज और करोड़ों फॉलोअर्स वाले स्टार्स की चमक अब छोटे शहरों के देसी क्रिएटर्स के सामने फीकी पड़ने लगी है। इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग प्लेटफॉर्म कोफ्लुएंस की एक रिपोर्ट के अनुसार, ब्रांड्स अब महंगे विज्ञापनों के बजाय क्षेत्रीय और छोटे शहरों के कम लेकिन वफादार फॉलोअर्स वाले क्रिएटर्स पर ज्यादा भरोसा जता रहे हैं।
14 मई को जारी की गई कोफ्लुएंस की इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग इंडस्ट्री अभूतपूर्व रफ्तार से आगे बढ़ रही है। इस साल (2026) के अंत तक देश का इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग बाजार 4,500 से 5,000 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार करने की उम्मीद है। यह पिछले साल यानी 2025 के 3,000 से 3,500 करोड़ रुपये के बाजार के मुकाबले एक बहुत बड़ी छलांग है। बाजार में आए इस उछाल की सबसे बड़ी वजह छोटे शहरों (टियर-2, टियर-3 और टियर-4) के क्रिएटर्स की बढ़ती लोकप्रियता है।
रिपोर्ट में कहा गया है, 'क्षेत्रीय भारत अब केवल एक फुटनोट नहीं है, बल्कि यह पूरी इंडस्ट्री का सेंटर ऑफ ग्रैविटी (मुख्य केंद्र) बन चुका है।' आंकड़ों के लिहाज से समझें तो देश में होने वाले कुल इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग कैंपेन्स का लगभग 43 से 48 प्रतिशत हिस्सा अब टियर-3 और टियर-4 शहरों के क्रिएटर्स के खाते में जा रहा है।
इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण एंगेजमेंट रेट है। छोटे शहरों के क्रिएटर्स को 4.5 से 5.5 प्रतिशत तक का एंगेजमेंट रेट मिल रहा है, जबकि दिल्ली-मुंबई जैसे मेट्रो शहरों के बड़े क्रिएटर्स का एंगेजमेंट रेट महज 3 से 4 प्रतिशत पर सिमट गया है।
आर्थिक तौर पर भी छोटे शहरों के क्रिएटर्स ब्रांड्स के लिए फायदे का सौदा साबित हो रहे हैं। मेट्रो शहरों में एक बड़े क्रिएटर के साथ कैंपेन करने का खर्च 3.8 लाख से 4.5 लाख रुपये तक आता है। वहीं, टियर-3 और टियर-4 शहरों में यही कैंपेन महज 35,000 से 90,000 रुपये के बजट में आसानी से पूरा हो जाता है। लोग अपनी भाषा और अपने जैसे दिखने वाले चेहरों पर ज्यादा भरोसा करते हैं, यही वजह है कि कंपनियां अब मेट्रो स्टार्स को छोड़कर क्षेत्रीय क्रिएटर्स के साथ लंबी पार्टनरशिप को तरजीह दे रही हैं।
ब्रांड्स अब अंग्रेजी बोलने वाली आबादी से आगे बढ़कर स्थानीय स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं। 62% से अधिक क्रिएटर्स ने बताया कि ब्रांड्स अब उन्हें क्षेत्रीय भाषाओं में कंटेंट बनाने का ही ब्रीफ दे रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार आज की तारीख में देश के 68.2% क्रिएटर्स मुख्य रूप से हिंदी भाषा में कंटेंट तैयार कर रहे हैं, जबकि 23.9% क्रिएटर्स अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में स्थानीय और हाइपरलोकल कंटेन्ट बना रहे हैं।
इंडस्ट्री के इस सुनहरे दौर के बीच रिपोर्ट ने एक कड़वी सच्चाई भी उजागर की है। बाजार के अरबों रुपये का होने के बावजूद, सोशल मीडिया से होने वाली कमाई का बंटवारा बेहद असमान है। आज भी 10 में से 9 क्रिएटर्स (90%) सोशल मीडिया को अपनी फुल-टाइम कमाई का जरिया नहीं बना पा रहे हैं। करीब 88% क्रिएटर्स ऐसे हैं जो अपनी कुल मासिक आय का 75% हिस्सा भी इन प्लेटफॉर्म्स से नहीं कमा पाते।
इसके साथ ही, बाजार में क्रिएटर्स की भारी बाढ़ और 'बार्टर कल्चर' (पैसों के बजाय केवल सामान देना) के कारण इंस्टाग्राम पर नैनो क्रिएटर्स का बेस रेट 500 रुपये से घटकर महज 300 रुपये पर आ गया है।
वेबसाइट Moneycontrol से बात करते हुए बिहार के एक डिजिटल क्रिएटर अमित परिमल ने बताया कि सारी चकाचौंध और ग्लैमर के बीच छोटे शहरों के क्रिएटर्स को जमीनी स्तर पर किन समस्याओं और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। अमित के अनुसार, पिछले दो सालों में इंफ्रास्ट्रक्चर में काफी सुधार हुआ है, फिर भी यह अभी भी मेट्रो शहरों के स्तर का नहीं है।इंटरनेट की स्पीड रील्स और शॉर्ट्स अपलोड करने के लिए तो ठीक है, लेकिन जब बात लाइव स्ट्रीमिंग करने या 4K क्वालिटी में कंटेंट शूट करने की आती है, तो नेटवर्क की सीमाएं सामने आ जाती हैं।
पेमेंट के मुद्दे पर अमित कहते हैं कि कंपनियां अब बैंक ट्रांसफर या जीएसटी इनवॉइस मांगती हैं, जो काम को प्रोफेशनल बनाने के लिए बहुत अच्छा है। लेकिन समस्या यह है कि पेमेंट साइकल 60 से 90 दिनों तक खिंच जाता है। जब आप नए उपकरणों में निवेश कर रहे हों या अपनी छोटी सी टीम को वेतन दे रहे हों, तो इतने लंबे समय तक पैसे अटकना भारी पड़ता है। अमित का यह भी मानना है कि कई ब्रांड्स आज भी क्षेत्रीय क्रिएटर्स को कमतर आंकते हैं, जबकि डेटा और एंगेजमेंट के मामले में वे बड़े शहरों के क्रिएटर्स को आसानी से मात दे रहे हैं।
छोटे शहरों में मनोरंजन की परिभाषा भी बदल गई है। अमित परिमल के अनुसार, 'बिहार और देश के टियर-2, टियर-3 शहरों में शॉर्ट वीडियो ने टीवी की जगह ले ली है। युवा अब रात 8 बजे के किसी शो का इंतजार नहीं करते, बल्कि वे चाय की चुस्की लेते हुए, सफर के दौरान या सोने से पहले रील्स स्क्रोल करते हैं। यह फॉर्मेट उनकी जिंदगी में बिना पूरा ध्यान मांगे फिट हो जाता है।'
इस दौड़ में इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे ग्लोबल प्लेटफॉर्म दर्शकों का ध्यान खींचने के मामले में अपना दबदबा बनाए हुए हैं।। कोफ्लुएंस के 20 लाख से अधिक क्रिएटर्स के सर्वे के अनुसार, देश के 77.6 प्रतिशत क्रिएटर्स भारतीय शॉर्ट-वीडियो ऐप्स पर एक्टिव ही नहीं हैं। वहीं, 84.5 प्रतिशत क्रिएटर्स ने माना कि शॉर्ट-फॉर्म वीडियो ही उनकी कमाई का सबसे बड़ा जरिया है।
बाजार में विज्ञापनों पर खर्च करने के मामले में ई-कॉमर्स सेक्टर सबसे आगे है। इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग के कुल बजट में ई-कॉमर्स की हिस्सेदारी 23 प्रतिशत है, जिसने 2025-2026 में करीब 1,000 से 1,200 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। इसके अलावा, बैंकिंग और फाइनेंस (BFSI) सेक्टर में भी 20-30 प्रतिशत की सालाना ग्रोथ देखी जा रही है, क्योंकि सेबी (SEBI) की सख्ती के बाद अब कंपनियां केवल रजिस्टर्ड और प्रामाणिक फिनफ्लुएंसर्स को ही काम दे रही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इस बाजार का अगला बड़ा भविष्य 'लाइव कॉमर्स' (लाइव वीडियो के जरिए सामान बेचना) है। अनुमान है कि 2025-26 के दौरान विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर 22.7 लाख से 34.3 लाख लाइव कॉमर्स कैंपेन चलेंगे, जिससे करीब 6,600 करोड़ से 13,200 करोड़ रुपये का बिजनेस (GMV) जेनरेट होगा। इस लाइव व्यूअरशिप में भी इंस्टाग्राम सबसे आगे है, जिसके लाइव सेशन्स में एक बार में 1.2 लाख तक व्यूज आ रहे हैं, वहीं अमेजन, फ्लिपकार्ट और मीशो जैसे प्लेटफॉर्म्स इन व्यूज को सीधे खरीदारों में बदल रहे हैं।
Published on:
18 May 2026 07:36 pm
