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Video: मां की मौत पर न रिश्तेदार आए, न पड़ोसी… बेटियों ने अर्थी उठाकर श्मशान तक पहुंचाया, खुद दी मुखाग्नि

बिहार के छपरा में एक मां की मौत हो गई और अंतिम संस्कार के लिए उसकी लाश को कंधा देने वाला कोई नहीं था। समाज के नियमों को तोड़ते हुए, उसकी दो बेटियों ने आगे बढ़कर अर्थी को कंधा दिया और अंतिम संस्कार किया।

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पटना

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Anand Shekhar

Jan 30, 2026

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मां का शव ले जाती बेटियां (फोटो- वायरल वीडियो स्क्रीन ग्रैब)

बिहार के छपरा जिले से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जहां एक मां की मौत के बाद न तो रिश्तेदार, न पड़ोसी और न ही समाज का कोई व्यक्ति मदद के लिए आगे आया। ऐसी स्थिति में, दो बेटियों ने हिम्मत दिखाते हुए अपनी मां की अर्थी को कंधा दिया, उसे श्मशान घाट तक ले गईं और खुद ही मुखाग्नि देकर अंतिम संस्कार भी किया। इसका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है।

न रिश्तेदार आए, न पड़ोसी

यह भावुक कर देने वाली घटना छपरा से करीब 22 किलोमीटर दूर मढ़ौरा ब्लॉक के जवैनिया गांव की बताई जा रही है। वहां रहने वाली बबीता देवी का कुछ दिन पहले निधन हो गया था। मां की मौत के बाद उम्मीद थी कि गांव वाले, रिश्तेदार या समाज के लोग अंतिम संस्कार में शामिल होंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। गांव में सन्नाटा पसरा रहा और अर्थी को श्मशान घाट तक ले जाने में मदद के लिए कोई आगे नहीं आया।

मां की मौत के बाद दोनों बेटियां गांव की गलियों में घर-घर भटकीं। उन्होंने हाथ जोड़कर लोगों से अपनी मां की अर्थी को कंधा देने में मदद करने की गुहार लगाई, लेकिन ऐसा लगा जैसे लोगों के दिल पत्थर के हो गए हों। काफी देर बाद आखिरकार दो-तीन लोग आए, और तभी दो बेटियों और दो अन्य लोगों के कंधों पर अर्थी उठाकर श्मशान घाट ले जाया जा सका। वहां बेटियों ने अंतिम संस्कार की रस्में पूरी कीं। इस दौरान बेटियों ने खुद ही चिता को आग दी और अपनी मां के प्रति अपना फर्ज निभाया।

खराब आर्थिक स्थिति

बताया जाता है कि परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। बबीता देवी के पति रविंद्र सिंह का भी डेढ़ साल पहले निधन हो गया था। पति की मौत के बाद से परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। घर में कमाने वाला कोई नहीं बचा था। जिसके बाद मां और बेटियां किसी तरह गुजारा कर रही थीं। अब मां की मौत के बाद घर में सिर्फ दो बेटियां ही बची हैं।

गांव वालों का कहना है कि परिवार बहुत गरीब था और धीरे-धीरे समाज से अलग-थलग पड़ गया था। यही वजह है कि मां की मौत के बाद भी कोई आगे नहीं आया।

अंतिम संस्कार के बाद की रस्मों के लिए पैसे नहीं

बेटियों ने जैसे-तैसे अपनी मां का अंतिम संस्कार तो कर दिया, लेकिन अब उनके पास तेरहवीं और अंतिम संस्कार के बाद की दूसरी रस्मों के लिए न तो पैसे हैं और न ही कोई सहारा। दोनों बेटियां समाज और प्रशासन से मदद की गुहार लगा रही हैं। वे कहती हैं कि अगर उन्हें कोई मदद मिलती है, तो वे अपनी मां की अंतिम संस्कार की रस्में ठीक से कर पाएंगी ताकि उनकी आत्मा को शांति मिल सके।

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