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Vikramshila Bridge Collapse: 7 चेतावनियां, करोड़ों की मरम्मत और फिर हादसा; कैसे टूटा बिहार का लाइफलाइन पुल?

Vikramshila Bridge Collapse: विक्रमशिला सेतु के आंशिक रूप से ढहने से पहले पिछले दो वर्षों में कई बार पुल में दरारों, कमजोर बेयरिंग और ओवरलोड ट्रकों से बढ़ते खतरे को लेकर अधिकारियों को चेतावनी दी गई थी, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

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Vikramshila Bridge Collapse

बिहार का लाइफलाइन पुल विक्रमशिला सेतु। फोटो-AI

Vikramshila Bridge Collapse: बिहार में विक्रमशिला सेतु के पिछले सप्ताह आंशिक रूप से ढहने से पहले बीते दो वर्षों के दौरान कई निरीक्षण टीमों और अधिकारियों ने खतरे के संकेत दिए थे, लेकिन उन चेतावनियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। समय रहते कदम उठाए गए होते तो इस हादसे को टाला जा सकता था। अधिकारियों के मुताबिक, पुल के ढहने की घटना दो चरणों में हुई। 3 मई की रात करीब 11:55 बजे पिलर संख्या 133 में स्ट्रक्चरल खराबी आई, जिसके बाद 4 मई की सुबह 1:07 बजे पुल का एक हिस्सा पूरी तरह ढह गया। गंगा नदी पर बना 4.7 किलोमीटर लंबा यह पुल दो हिस्सों में बंट गया। हालांकि, इस हादसे में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है।

पुल हादसे के बाद इंजीनियर सस्पेंड

राज्य में पुलों की स्ट्रक्चरल मजबूती सुनिश्चित करने के लिए RCD के साथ समन्वय बनाने की जिम्मेदारी BRPNNL की होती है। सूत्रों के मुताबिक, पिछले दो महीनों के दौरान कई बार BRPNNL और RCD दोनों को पुल की खराब हालत के बारे में आगाह किया गया था। हालांकि, पुल का हिस्सा ढहने के बाद RCD के NH डिवीजन, भागलपुर के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर साकेत कुमार रोशन को कथित तौर पर कर्तव्य में लापरवाही बरतने के आरोप में सस्पेंड कर दिया गया। 4 मई को जारी सस्पेंशन लेटर में कहा गया कि पुल के रखरखाव की जिम्मेदारी RCD के NH डिवीजन, भागलपुर के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर साकेत कुमार रोशन के पास थी। पहली नजर में उन्हें अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाह और उदासीन पाया गया, जिसके बाद तत्काल प्रभाव से उन्हें सस्पेंड कर दिया गया।

सात बैठकों में उठा था खतरे का मुद्दा

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त 2024 से अप्रैल 2026 के बीच वर्ष 2001 में बने इस पुल की खराब स्थिति को लेकर कम से कम सात बार अंदरूनी स्तर पर चर्चा हुई थी। अधिकारियों के अनुसार, बैठकों में पिछले कुछ वर्षों से पुल पर ओवरलोड ट्रकों के आवागमन का मुद्दा भी उठाया गया था। इसमें साफ तौर पर कहा गया था कि भारी वाहनों के दबाव के कारण पुल के जोड़ों (जॉइंट्स) पर लगी बेयरिंग कमजोर हो रही हैं और इस पर तत्काल रोक लगनी चाहिए। इसके बावजूद इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, जिससे पुल की स्थिति लगातार बिगड़ती चली गई।

छह जॉइंट्स में मिला था खतरे का संकेत

RCD के एक सूत्र के मुताबिक, अगस्त 2024 में विभाग के सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर ने पुल का निरीक्षण किया था। इस दौरान करीब 60 एक्सपेंशन जॉइंट्स में से छह में दरारें और गैप पाए गए थे। जनवरी 2025 में RCD मुख्यालय को इस निरीक्षण रिपोर्ट की दोबारा याद दिलाई गई। इसके बाद मार्च 2025 में भागलपुर के जिलाधिकारी नवल किशोर चौधरी ने राज्य सरकार के दौरे पर आए अधिकारियों को पुल में बढ़ती दरारों की जानकारी दी। हालांकि, उसी महीने के अंत में IIT पटना और BRPNNL की संयुक्त टीम ने पुल का निरीक्षण करने के बाद उसकी संरचना को सुरक्षित बताया था।

चेतावनी के बावजूद नहीं हुई कार्रवाई

सूत्रों के मुताबिक, अप्रैल 2025 में नेशनल हाईवे डिवीजन, भागलपुर ने RCD मुख्यालय को पुल में चार नई दरारें मिलने की रिपोर्ट भेजी थी। इसके बाद अप्रैल 2026 में दौरे पर आए RCD अधिकारियों को पुल की बेयरिंग में हुए नुकसान की जानकारी दी गई। उसी महीने पुल की खराब स्थिति को लेकर एक विस्तृत रिपोर्ट भी RCD मुख्यालय को भेजी गई। हालांकि, इन चेतावनियों के एक महीने के भीतर ही पुल का एक हिस्सा ढह गया।

26 करोड़ की मरम्मत नाकाम, अब 75 करोड़ की चुनौती

इन चेतावनियों के सामने आने से पहले ही वर्ष 2020 से 2024 के बीच पुल की दो बड़ी मरम्मतें की जा चुकी थीं। अधिकारियों का कहना है कि पुल को लंबे समय से व्यापक और बेहतर रखरखाव की जरूरत थी। RCD के एक अधिकारी के मुताबिक, 2020 से 2022 के बीच पुल को कुछ समय के लिए बंद कर कई एक्सपेंशन जॉइंट्स की मरम्मत की गई थी। वहीं, 2024 में खंभों के पास दिखाई दे रही दरारों को भरने के लिए नई बिटुमिनस (डामर) परत बिछाकर पुल की ऊपरी सतह और संरचना को मजबूत करने की कोशिश की गई। हालांकि, इस मरम्मत से सीमित सफलता ही मिल सकी। हादसे के बाद पुल का निरीक्षण करने वाले विशेषज्ञों ने बताया कि ढहने से पहले मरम्मत के लिए तय 26 करोड़ रुपये का बजट अब बढ़कर 75 करोड़ रुपये हो गया है, क्योंकि पुल में 13 नई दरारों की पहचान की गई है।