
ईरान में लगातार विरोध-प्रदर्शन चल रहा है। (Photo: IANS)
Iran Protest: ईरान में इस समय काफी विरोध प्रदर्शन चल रहा है। ईरान से लगभग 3,400 किलोमीटर दूर अल्बानिया में प्रतिबंधित समूह मुजाहिदीन-ए-खल्क (MEK) के लगभग 3,000 सदस्य शरण लिए हुए हैं। इस संगठन की स्थापना 1965 में ही हो गई थी और इसने रजा पहलवी को गद्दी से उतारने में अयातुल्ला खुमैनी (Ayatullah al Khomeini) का साथ दिया था। आइए जानते हैं कि ईरान को तरक्की की राह पर ले जाने वाले रज़ा पहलवी को कैसे बेदखल किया गया था?
वर्ष 1970 के दशक में ईरान में शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी का राज था। रजा तरक्की पसंद व्यक्ति था और देश को धर्मनिरपेक्षता की राह पर ले जाना चाहते थे और यह बात कट्टरपंथियों को पसंद नहीं आ रही थी। बीबीसी की ईरानी सेवा में काम कर चुकी हिंदी की वरिष्ठ साहित्यकार नासिरा शर्मा ने पत्रिका से बातचीत में कहा, 'रजा के समय ईरान में तेल के कुएं आए। जाहिर सी बात है कि देश के सामने आर्थिक समस्या नहीं रह गई। इस मौके का फायदा उठाकर पहले वाला रजा पहलवी ने ईरान को मॉडर्न बनाने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया। आगे उनके बेटे पहलवी ने भी देश के विकास को काम को आगे बढ़ाया। यह बात कट्टरपंथियों के गले नहीं उतर रही थी। आम जनता धर्मभीरू होती है, सो उनको कट्टरपंथियों ने अपने पक्ष में करना शुरू कर किया।'
उन्होंने बताया कि रजा पहलवी की छवि खराब की गई। उसे निरंकुश बताया गया। धीरे-धीरे अयातुल्ला खुमैनी के पक्ष में लोग आते गए। ईरान के पीपुल्स मोजाहिदीन संगठन, कम्युनिस्ट, यूरोप के कुछ देश भी अयातुल्ला के पक्ष में आ गए और वहां 1979 में इस्लामी क्रांति (Iranian Islamic Revolution) को अंजाम दिया गया। रज़ा पहलवी को सत्ता छोड़नी पड़ी।
पहलवी को सत्ता से उतारने के बाद वहां धार्मिक समिति ने अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी को सत्ता में बिठाया और इस्लामिक गणराज्य की स्थापना हुई। अयातुल्ला को एमईके ने पहलवी के खिलाफ लड़ाई में भरपूर साथ दिया। रज़ा पहलवी और उनके बेटे पहलवी का शासन पश्चिमी प्रभाव और आधुनिकीकरण पर केंद्रित था। उनके समय में ईरान का काफी विकास भी हो रहा था लेकिन भ्रष्टाचार, दमन और गरीबी के कारण जनता में भारी असंतोष था, जिसके परिणामस्वरूप क्रांति हुई और राजशाही समाप्त हो गई। शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी ने ईरान पर 1941 से 1979 तक शासन किया।
शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी ने यूरोप में हो रहे विकास के बराबर बिठाने के लिए देश में श्वेत क्रांति (White Revolution) को जन्म दिया। उन्होंने इसके तहत ईरान में औद्योगिक विकास से लेकर सेना के आधुनिकीकरण पर जोर दिया। ईरान में समाज के विकास और सामाजिक बराबरी के लिए शिक्षा का विस्तार, भूमि सुधार और महिलाओं को अधिकार दिए गए। रज़ा पहलवी के समय ही ईरान की महिलाओं को वोटिंग के अधिकार मिले। उन्होंने अर्थव्यवस्था के विकास के लिए बुनियादी ढांचे मसलन सड़क और बांधों का विकास हुआ। पहलवी ने ईरान को 'महान सभ्यता' के तौर विकसित करने का सपना देखा। उन्होंने देश में धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा देने पर जोर दिया। यह बात वहां के पारंपरिक सोच और धार्मिक नेताओं को खलने लगी और धीरे-धीरे असंतोष भी बढ़ता चला गया।
रज़ा पहलवी के समय में ईरान में महिलाओं की हालत बेहतर थी या अयातुल्ला खुमैनी या अब अली ख़ामेनेई के समय में? इस सवाल के जवाब में नासिरा कहती हैं कि मैं ईरान में अलग-अलग समय में कई-कई महीने रही हूं। ईरान में रज़ा के समय महिलाएं बुर्का नहीं पहनती थीं। वह बहुत सलीके से चादर ओढ़ती थीं। बुर्का का चलन अब आया है। अभी भी वहां औरतों पर बहुत पाबंदियां नहीं हैं। वह बुर्का पहनकर भी साइंस, मेडिकल के क्षेत्र में बहुत अच्छा कर रही हैं। वह बम बनाती हैं। बहुत बड़ी-बड़ी बिल्डर हैं। वहां की औरतें वह सबकुछ करती हैं, जो दुनिया की औरतें करती हैं। अब ईरान में बुर्का के खिलाफ आंदोलन चल रहा है तो अच्छी बात है लेकिन इससे वे बेचारी नहीं हो गई हैं। वह रज़ा के समय भी बेचारी नहीं थीं और अब भी नहीं। ईरान में दूसरे रज़ा के इस्रायल से मेलमिलाप बढ़ाने से चीजें बदतर हुई हैं। वहां के हालात बिगाड़ने में पीपुल्स मोजाहिदीन संगठन का भी हाथ रहा है। वैसे, दोनों ही रज़ा के समय ईरान ज्यादा तरक्की कर रहा था।'
ईरान में पैदा हुए संगठन पीपुल्स मोजाहिदीन के सदस्य देश से बहुत दूर अल्बानिया की राजधानी तिराना के पास एक छोटे से गांव मंजे में स्थित एक किलेबंद शिविर में रह रहे हैं। ईरान के पीपुल्स मोजाहिदीन संगठन (पीएमओआई, जिसे मुजाहिदीन-ए-खल्क, एमईके MEK के नाम से भी जाना जाता है) के लगभग 3,000 सदस्य अल्बानिया में रह रहे हैं।
एमईके के सदस्य अल्बानिया में 2013 से ही रह रहे हैं। अल्बानियाई सरकार ने अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र के अनुरोध पर उन्हें अपने यहां शरण देने पर सहमति जताई थी। एमईके समाजवादी विचारधारा का अनुसरण करते हैं और यह इस्लामी राजनीति का विरोधी समूह है।
इस संगठन की स्थापना ईरान में 1965 में हुई थी। संगठन ने उस समय ईरान में सत्तारूढ़ पहलवी राजवंश के खिलाफ हथियार उठाए। एमईके ने 1970 के दशक में शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी की सरकार और अमेरिकी ठिकानों के खिलाफ बमबारी अभियान चलाए और 1978-1979 की इस्लामी क्रांति में अयातुल्ला खुमैनी का समर्थन किया।
ईरान में इस्लामी क्रांति (Iranian Islamic Revolution) के कुछ ही समय बाद एमईके का तेहरान के नए खुमैनी से मतभेद हो गया और देश में संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसके बाद संगठन के सदस्य देश से निर्वासित होकर विदेशों से अपनी विपक्षी गतिविधियां जारी रखीं। इस बारे में संगठन का कहना है कि राज्य दमन की ओर तेजी से बढ़ रहा था जिसमें संगठन के काम को जारी रखने के लिए हम दूसरे देश में शिफ्ट हुए।
हालांकि, हाल के दशकों में ईरान में कई राष्ट्रव्यापी विरोध-प्रदर्शन हुए हैं, लेकिन देश के अंदर और बाहर दोनों जगह ईरानी विपक्ष संगठित नहीं है। विरोध करने वालों में बड़ी संख्या में प्रतिद्वंद्वी समूह और वैचारिक गुट शामिल हैं।
ईरान के अयातुल्ला खुमैनी से विरोध रखने वाले दो दो सबसे बड़े विपक्षी समूह राजशाही समर्थक और एमईके देश के बाहर से अपना अभियान चला रहे हैं। 1979 में ईरानी क्रांति के दौरान पहलवी राजवंश के पतन के बाद से दोनों समूहों के नेता और सदस्य निर्वासन में रह रहे हैं।
ईरान के अंतिम शाह मोहम्मद रजा पहलवी के उत्तराधिकारी रजा पहलवी अमेरिका में रहते हैं। हालांकि ईरानी प्रवासी समुदाय में उनके बहुत सारे प्रशंसक हैं, लेकिन देश के भीतर सत्ता प्रदान के लिए कितना समर्थन प्राप्त है, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
Published on:
21 Jan 2026 01:51 pm
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