
बसपा सुप्रीमो मायावती की रैली (फोटो-IANS)
चुनाव की रणभेरी बिहार में बजी, लेकिन एक तैयारी यूपी में शुरू होती दिख रही है। यह तैयारी बसपा प्रमुख मायावती ने शुरू की है। मायावती को सियासी जमीन खिसकने के खतरे का एहसास होने लगा है। लिहाजा, 9 अक्टूबर को कांशीराम की जयंती के मौके पर उन्होंने यूपी की राजधानी लखनऊ में एक रैली को संबोधित किया।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की सड़कें सालों बाद भगवा और लाल झंडों के बजाए नीली पताकों से पट गया। अपनी रैली के दौरान मायावती ने साफ कर दिया कि डेढ बरस बाद होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी किसी भी दल से गठबंधन नहीं करेगी। साथ ही, यह दंभ भी भर दिया है कि बसपा एक बार फिर पूर्ण बहुमत के दम पर अपनी सरकार बनाएगी।
बसपा संस्थापक काशीराम की पुण्यतिथि पर मायावती ने भारी भीड़ जुटाई थी। इस दौरान अपनी रैली में सबसे अधिक निशाना समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर साधा। गौर करने वाली बात यह रही कि सभा को संबोधित करते हुए सपा सुप्रीमो अखिलेश के खिलाफ मायावती के बोल जितने तल्ख थे। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ पर उन्होंने उतना ही हल्का हाथ रखा। बीते कुछ सालों से बसपा को बीजेपी की बी टीम भी बताया जाने लगा। इसका फायदा यूपी में मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी को मिला है।
उत्तर प्रदेश में कुल 80 लोकसभा सीटें हैं, जिनमें से 17 सीटें अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित (सुरक्षित) हैं, जबकि दलित आबादी 21 फीसदी है। इनमें से आधे जाटव हैं। इसी समुदाय से मायावती भी आती हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों के अनुसार, 17 रिजर्व सीटों में से 8 पर बीजेपी ने और 7 पर समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की। कांग्रेस और आजाद समाज पार्टी (चंद्रशेखर) को एक-एक सीट मिली। जबकि, 2019 के चुनाव में 10 सीट जीतने वाली बसपा जीरो पर सिमट गई।
इससे भी अधिक मायावती के लिए चिंता की बात यह है कि उनका कोर वोटर जाटव समुदाय सपा की तरफ शिफ्ट हो रहा है। 2024 के लोस. चुनाव में सपा के दो जाटव प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की। जालौन से नारायण दास अहरिवार और इटावा से जितेंद्र दोहरे। वहीं, बीजेपी पहले ही गैर जाटव वोट बैंक को अपने पाले में कर चुकी है। यह मत प्रतिशत में भी साफ दिख रहा है।
साल 2007 के यूपी विधानसभा चुनाव में में बसपा ने 30.40 फीसदी वोट और 206 सीटें सीटों के साथ पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी, लेकिन उसके बाद से बसपा का मत प्रतिशत घटने लगा। 2012 में 25.90% (80 सीटें), 2017 में 22.20% (19 सीटें) और 2022 में मत फीसदी घटकर 12.90% (1 सीट) पर आ गया। वहीं, 2017 के विस. चुनाव में सपा को 21.90% (47 सीटें) वोट मिले, जबकि 2022 में मत फीसदी बढ़कर 32.10% पहुंच गया और सीटों की संख्या बढ़कर 111 पर पहुंच गई। 2022 में बसपा को 10 फीसदी कम वोट मिले, लगभग उतने वोटरों का जुड़ाव सपा में हुआ। इससे सपा की सीटों की संख्या में सीधा उछाल आया।
1989: 2.80% (11 सीटें)
1991: 4.40% (1 सीट)
1996: 4.23% (11 सीटें)
1998: 4.36% (4 सीटें)
1999: 4.68% (5 सीटें)
2004: 5.67% (21 सीटें)
2009: 6.33% (21 सीटें)
2014: 4.20% (0 सीटें)
2019: 3.67% (10 सीटें)
2024: 2.07% (0 सीटें)
1985: 2.00% (2 सीटें)
1989: 9.00% (13 सीटें)
1991: 10.00% (12 सीटें)
1993: 14.00% (67 सीटें)
1996: 20.60% (67 सीटें)
2002: 23.10% (98 सीटें)
2007: 30.40% (206 सीटें)
2012: 25.90% (80 सीटें)
2017: 22.20% (19 सीटें)
2022: 12.90% (1 सीट)
मायावती बोलीं, 'सपा को जब सत्ता में रहने का मौका मिलता है, तब इन्हें न तो PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) याद आता है, न ही बहुजन समाज के हितों की चिंता होती है। लेकिन जैसे ही कुर्सी हाथ से जाती है, ये खुद को सामाजिक न्याय का सबसे बड़ा ठेकेदार बताने लगते हैं। जनता अब इनके ऐसे दोगले और स्वार्थी रवैये को अच्छी तरह समझ चुकी है।'
उन्होंने अपने भाषण के दौरान यूपी सरकार का आभार जताया। मायावती ने कहा कि मैं वर्तमान सरकार की आभारी हूं। कांशीराम पार्क और अंबेडकर पार्क में आने वाले लोगों से मिले टिकटों का पैसा सपा सरकार की तरह दबाकर नहीं रखा गया। मेरी आग्रह पर पार्क की मरम्मत पर पूरा खर्च किया गया, जबकि सपा सरकार ने पार्क के रखरखाव की बजाय दूसरे मदों पर पैसा खर्च कर दिया था।
यूपी में दलित की सियासत अब बसपा और मायावती से चंद्रशेखर आजाद की तरफ शिफ्ट होता जा रहा है। कम से कम सोशल मीडिया में ऐसा लग रहा है। मायावती ने चंद्रशेखर पर निशाना साधते हुए कहा कि हमें कमजोर करने के लिए एक षड्यंत्र रचा जा रहा है। स्वार्थी और बिकाऊ किस्म के लोगों का इस्तेमाल करके कई संगठन बनवा दिए गए हैं। अब तो ये अंदर ही अंदर अपने वोट ट्रांसफर करवा कर इनके एक-दो उम्मीदवारों को जिता भी रहे हैं, ताकि दलित वोट बांटे जा सकें।
मायावती के सामने सबसे बड़ी चुनौती उत्तराधिकारी चुनने को लेकर भी है। पिछले लोकसभा चुनाव में आकाश आनंद को मायावती में आगे बढ़ाया, लेकिन आकाश ने सीतापुर में जब बीजेपी के खिलाफ जोरदार बयान दिया तो मायावती इतनी नाराज हो गई थी कि उन्हें चुनाव प्रचार से ही हटवा दिया। 9 अक्टूबर की रैली में एक बार फिर आकाश आनंद मायावती के बगल में खड़े हुए दिखे।
मायवाती ने भी भतीजे की पुरानी गलतियों को माफ करते हुए कहा, 'आकाश आनंद एक बार फिर पार्टी के मूवमेंट से जुड़ चुके हैं, यह शुभ संकेत है। वह मेरे दिशानिर्देश में काम करेंगे। जिस प्रकार कांशीराम जी ने मुझे आगे बढ़ाया, उसी तरह मैंने आकाश आनंद को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। मुझे विश्वास है और आप सभी से अपील है कि आप लोग मेरी तरह आकाश का भी हर हाल में साथ देंगे।'
Published on:
10 Oct 2025 10:09 am
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