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कौन था एमपी का ‘भुलक्कड़’ सीएम? जो वकील से बना मुख्यमंत्री…कलेक्टर-मंत्री से पूछ लिया था तुम कौन?

Forgetful CM of Madhya Pradesh: पहले वकील...सांसद और फिर बन गए मध्यप्रदेश के पैराशूट मुख्यमंत्री... पढ़िए कैलाश नाथ काटजू की रोचक कहानी।

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कैलाश नाथ काटजू

Forgetful CM of Madhya Pradesh: मध्यप्रदेश की सियासत में एक मुख्यमंत्री ऐसा भी हुआ है। जिसके बारे में कई अनकहे किस्से हैं। इन्हीं अनकहे किस्सों की सीरीज patrika.com लेकर आया है। आज आपको मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे कैलाश नाथ काटजू की कहानी बताएंगे। जो व्यक्ति आजाद हिंद फौज का केस लड़ा, यूपी में वकालत करते-करते देश के दिल मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बन गया।

यूपी का वकील बना एमपी का सीएम

कैलाश नाथ काटजू का जन्म 17 जून 1887 रतलाम जिले के जावरा में हुआ था। उनके पिता उन दिनों त्रिभुवन नाथ काटजू जावरा के दीवान थे। उन्होंने लाहौर में रहकर स्कूल की पढ़ाई की और इलाहाबाद यानी आज के प्रयागराज में वकालत की पढ़ाई की। वह पढ़ने में काफी होनहार थे। इसी के साथ वह कांग्रेस और आजादी के आंदोलन से जुड़े। फिर धीरे-धीरे वकालत में उन्होंने पैठ बनाई।

काटजू को एमपी कनेक्शन का फायदा मिला

संविधान सभा के चुनाव में काटजू उत्तरप्रदेश नहीं पहुंच पाए तो नेहरू ने मध्य भारत से चुनकर आए सीताराम जाजू का इस्तीफा करा दिया। फिर आजादी मिलने के बाद वह ओडिशा और पं. बंगाल के गवर्नर बने। उनकी वापसी मंदसौर से सांसद चुने जाने का बाद हुई। काटजू 31 जनवरी 1957 भोपाल के बैरागढ़ हवाई अड्डे पर उतरे तो उन्हें जानने वाला कोई नहीं था। तब हाईकमान के आदेश पर मध्यप्रदेश के नेताओं ने उन्हें अपना नेता तो मान लिया, मगर ऊपरी तौर पर ही, लेकिन काटजू ने इस चीज को ठंडे बस्ते में डालकर चुनाव की तैयारियों में जुट गए। सन् 1957 में दूसरी विधानसभा चुनी गई तो कांग्रेस 288 सीटों में से कांग्रेस ने 232 सीटें हासिल की। जिसमें काटजू को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री घोषित किया गया।

भूलने के भी कई किस्से

काटजू के भूलने का एक किस्सा खडंवा है। जब वह खंडवा से बुरहानपुर जा रहे थे, तब उनकी गाड़ी की स्टेयरिंग तत्कालीन कलेक्टर सुशील चन्द्र वर्मा संभाल रहे थे। बुरहानपुर रेस्ट हाऊस में अधिकारियों से परिचय के वक्त वर्मा मुख्यमंत्री से दूर बगल में खड़े थे। जब सबसे परिचय हो गया तो डॉ. का‌टजू ने वर्मा से मुखातिब होते हुए कहा-महाशय आपने अपना परिचय नहीं दिया। तब कलेक्टर हैरान रह गए और अगल-बगल झांकने लगे। फिर धीमे स्वर में कहा कि सर मैं कलेक्टर हूं। आपकी गाड़ी मैं ही चलाकर आया था। ये बात सुनते ही काटजू जोर से हंसे।

मंत्री जी को भूल गए थे काटजू

ऐसा ही भूलने का एक और किस्सा छतरपुर स्थित सर्किट हाउस का था। यहां पर स्थानीय विधायक और मंत्री दशरथ जैन एक प्रतिनिधि मंडल का परिचय कराने ले आए थे। उस दौरान दशरथ जैन ने लोगों का परिचय कराया। इतने में ही काटजू ने पूछ लिया कि और आप कौन? इस पर दशरथ जैन ने कहा कि मैं दशरथ जैन हूं...। इसके बाद जो जवाब मिला, उसे सुनकर जैन और प्रतिनिधि मंडल भौच्चके रह गए। काटजू बोले एक दशरथ जैन तो हमारे मंत्रिमंडल में भी है। इस बात का जवाब देते हुए जैन बोले मैं वही दशरथ जैन हूं। मुख्यमंत्री बोले तो पहले क्यों नहीं बताया...क्या मैं आपको जानता नहीं?

जब सिटिंग सीएम हार गया चुनाव

काटजू के पांच साल का कार्यकाल समाप्त हुआ और बारी आई सन् 1962 की। आम चुनाव हुए, सत्ता में कांग्रेस की वापसी हुई। मगर तत्कालीन मुख्यमंत्री काटजू जावरा से चुनाव लड़े। नेहरू को उन्होंने बताया कि मैं हार रहा हूं। जावरा से विजयी हुएजनसंघ के प्रत्याशी लक्ष्मी नारायण पांडे। ये बात सुनकर नेहरू को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने हार के कारणों का पता लगाने के लिए हैदराबाद के पूर्व सीएम वी रामकृष्ण राव को एमपी तलब किया।

नेहरू जानना चाहते थे आखिर पार्टी के भीतर किसने काटजू को चुनाव हरवाया। हार के लिए तखतमल जैन और देशलहेरा के नाम भी सामने आए। नेहरू जानने इच्छुक थे कि इन दोनों का काटजू की हार में कितना हाथ है। कमेटी ने रिपोर्ट साझा कि तो सामने मूलचंद देशलहरा दोषी हैं। जिसके बाद देशलहरा को इस्तीफा देना पड़ा और तखमल जैन को दिल्ली भेज दिया गया।

नेहरू अभी भी इस बात पर अड़े हुए थे मुख्यमंत्री बनेंगे तो डॉ काटजू ही बनेंगे। इस पर विचार किया गया और नरसिंहगढ़ के राजा भानुप्रकाश सिंह की सीट खाली कराई गई। और भानुप्रकाश सिंह उस चुनाव में लोकसभा चुनाव लड़े। दोनों की जीत हुई। कांग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाई गई। तभी खंडवा से आने वाले मुख्यमंत्री भगवन्त राव मण्डलोई और देशलहरा गुट के आठ विधायकों को मंत्री बनाया गया। प्लान के अनुसार, लेकिन डेढ़ साल सीएम रहने के बाद कामराज प्लान लाया गया।

लोगों को लगा काटजू को सीएम बनाया जाएगा, लेकिन तब मध्यप्रदेश की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले द्वारिका प्रसाद मिश्र की एंट्री हो चुकी थी। मिश्र ने दांव खेला और बोले काटजू सीएम बनें। मगर उन्हें आम सहमति से सीएम बनाया जाए। विधायक दल की बैठक में हुए गुप्त मतदान में काटजू समझ गए कि लोग उनके पक्ष में नहीं हैं, इसलिए उनका निर्विरोध चुना जाना मुश्किल है। इसलिए वह धीरे से सीएम की रेस से बाहर हो गए।