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AI किसान से पहले जान लेगा फसल का संकट? सैटेलाइट, ड्रोन और सेंसर बदल रहे दुनिया की खेती

सोचिए, अगर आपके खेतों की हर छोटी-बड़ी समस्या आपको पहले से ही पता चल जाए? अब तकनीक के सहारे किसान फसल की सुरक्षा के लिए सिर्फ सोचना नहीं, बल्कि तुरंत कार्रवाई भी कर सकते हैं!
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Avaneesh Kumar Mishra

Sep 14, 2026

खेत में खड़ी फसल ऊपर से बिल्कुल हरी दिखाई दे रही है, लेकिन पौधे पानी के तनाव से जूझ रहे हैं। गेहूं में बीमारी के शुरुआती संकेत अभी किसान को दिखाई नहीं दिए, लेकिन सैटेलाइट की तस्वीर में पत्तियों के प्रकाश परावर्तन का पैटर्न बदल चुका है। किसी दूसरे खेत में ड्रोन कैमरा कुछ पौधों की असामान्य बढ़वार रिकॉर्ड कर रहा है और मिट्टी में लगा सेंसर बता रहा है कि अगली सिंचाई कब करनी चाहिए।

दुनिया की खेती धीरे-धीरे इसी दिशा में बढ़ रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब केवल चैटबॉट तक सीमित नहीं है। सैटेलाइट, ड्रोन, खेत में लगे सेंसर, मौसम स्टेशन, मोबाइल कैमरा और वर्षों के कृषि डेटा को जोड़कर ऐसे सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं जो फसल का संकट जल्दी पहचानने, पानी की जरूरत बताने और उत्पादन का अनुमान लगाने में मदद कर सकते हैं।

FAO का कहना है कि डिजिटल कृषि और AI प्रिसिजन फार्मिंग, जलवायु-अनुकूल खेती, बाजार तक पहुंच और सप्लाई चेन प्रबंधन को बदल सकते हैं। लेकिन संस्था साथ ही डिजिटल, ग्रामीण और लैंगिक अंतर को बड़ी चुनौती मानती है।

किसान की आंख से पहले संकट कैसे पकड़ सकता है AI?

पौधे में बीमारी या पानी की कमी का असर हमेशा सबसे पहले पत्ते सूखने के रूप में दिखाई नहीं देता। इससे पहले पौधे का तापमान, क्लोरोफिल, नमी और प्रकाश परावर्तन बदल सकता है। यहीं रिमोट सेंसिंग काम आती है। सैटेलाइट अलग-अलग वेवलेंथ में खेत की तस्वीर लेते हैं। AI इन तस्वीरों को पुराने मौसम, मिट्टी और फसल डेटा से मिलाकर असामान्य पैटर्न पहचान सकता है।

यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी से जुड़े CROPWATCH प्रोजेक्ट में सेंटिनल-2 सैटेलाइट, खेत के सेंसर, मौसम डेटा और मशीन लर्निंग को मिलाकर गेहूं, चुकंदर और टमाटर जैसी फसलों में रोगजनकों से जुड़े बदलाव जल्दी पहचानने की प्रणाली विकसित की जा रही है। इसका उद्देश्य बीमारी गंभीर होने से पहले जोखिम वाले हिस्से की पहचान करना है। इसलिए AI भविष्य नहीं देखता; वह डेटा में दिखाई देने वाले शुरुआती संकेतों को इंसान से कहीं बड़े क्षेत्र में तेजी से खोजता है।

सैटेलाइट बताएगा खेत को कितना पानी चाहिए

खेती में AI का सबसे व्यावहारिक उपयोग सिंचाई में हो सकता है। दुनिया के मीठे पानी की निकासी का करीब 70 प्रतिशत कृषि में जाता है। इसलिए थोड़ी-सी जल दक्षता भी बड़े स्तर पर महत्वपूर्ण हो सकती है।

NASA के ECOSTRESS मिशन से मिलने वाला थर्मल डेटा पौधों के तापमान और वाष्पोत्सर्जन के जरिए यह समझने में मदद करता है कि खेत के किस हिस्से में पानी का तनाव बढ़ रहा है। इससे सिंचाई की जरूरत का बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है।

NASA और USGS समर्थित OpenET का FARMS टूल भी सैटेलाइट आधारित वाष्पोत्सर्जन डेटा किसानों तक पहुंचाता है, ताकि वे जान सकें कि फसल वास्तव में कितना पानी इस्तेमाल कर रही है। भविष्य का मॉडल इसलिए “हर सात दिन में पानी दो” से बदलकर “इस खेत के इस हिस्से को आज इतनी सिंचाई चाहिए” की तरफ जा सकता है।

ड्रोन बनेगा खेत का उड़ता डॉक्टर?

ड्रोन सैटेलाइट की तुलना में छोटे क्षेत्र की ज्यादा बारीक तस्वीर ले सकते हैं। मल्टीस्पेक्ट्रल और हाइपरस्पेक्ट्रल कैमरे पौधे के रंग, वृद्धि और तनाव में ऐसे बदलाव पकड़ सकते हैं जो सामान्य फोटो में साफ दिखाई नहीं देते।

CGIAR के दुनिया भर में 150 से अधिक ब्रीडिंग स्टेशनों पर अब ड्रोन इमेजिंग, स्मार्टफोन और AI आधारित कम्प्यूटर विजन का इस्तेमाल सूखा सहनशीलता, बीमारी प्रतिरोध और पौधों की उत्पादकता का आकलन तेज करने के लिए किया जा रहा है।

यह तकनीक केवल अनुसंधान तक सीमित नहीं रहेगी। ड्रोन खेत में बीमारी वाले पैच, खरपतवार और पोषण की कमी वाले हिस्सों की पहचान कर सकता है। इससे पूरे खेत में समान मात्रा में दवा या खाद डालने के बजाय जरूरत वाली जगह पर उपचार संभव होगा।

उपज भी पहले बता सकता है AI

सैटेलाइट में फसल की हरियाली, बायोमास और बढ़वार का डेटा; मौसम स्टेशन से तापमान और बारिश; सेंसर से मिट्टी की नमी और ऐतिहासिक रिकॉर्ड—इन सभी को जोड़कर मशीन लर्निंग मॉडल फसल की संभावित उपज का अनुमान लगा सकते हैं।

भारत में FASAL कार्यक्रम धान, गेहूं, कपास, सोयाबीन, गन्ना, चना और सरसों समेत 11 प्रमुख फसलों के लिए सैटेलाइट तथा कृषि-मौसम डेटा के आधार पर कटाई से पहले उत्पादन अनुमान तैयार करता है। अगस्त 2026 में केंद्र सरकार ने बताया कि तकनीक आधारित फसल निगरानी में सैटेलाइट, ड्रोन, AI, रिमोट सेंसिंग, GIS और IoT का इस्तेमाल किया जा रहा है।

फसल बीमा में भी यही बदलाव दिख रहा है। YES-TECH व्यवस्था में सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग और फसल मॉडल का इस्तेमाल उत्पादन अनुमान में किया जा रहा है।

दुनिया में AI खेती कहां पहुंची?

तकनीकक्या देख सकती हैकिसान को संभावित फायदामुख्य सीमा
सैटेलाइटहरियाली, सूखा, नमी, फसल वृद्धिबड़े क्षेत्र की लगातार निगरानीबादल और कम स्थानिक रिजॉल्यूशन
ड्रोनरोग, खरपतवार, पौध तनावखेत के छोटे हिस्से की बारीक पहचानमशीन और संचालन की लागत
मिट्टी सेंसरनमी, तापमान और दूसरी स्थितियांसिंचाई का बेहतर समयरखरखाव और नेटवर्क
AI मोबाइल कैमराकीट या रोग की फोटो पहचानतुरंत प्राथमिक सलाहगलत फोटो या कमजोर मॉडल से त्रुटि
AI उपज मॉडलमौसम+फसल+सैटेलाइट डेटाउत्पादन और बीमा अनुमानखराब इनपुट डेटा से खराब अनुमान
डिजिटल एडवाइजरीमौसम, रोग, कीमत, कृषि सलाहछोटे किसान तक विशेषज्ञ जानकारीइंटरनेट, भाषा और डिजिटल साक्षरता

भारत में किसान के मोबाइल तक पहुंच रहा AI

भारत में राष्ट्रीय कीट निगरानी प्रणाली यानी NPSS AI और मशीन लर्निंग से कीट पहचान में मदद कर रही है। जुलाई 2026 तक सरकार के अनुसार इसका इस्तेमाल 10 हजार से अधिक कृषि विस्तार कार्यकर्ता कर रहे थे। किसान या कर्मचारी कीट की तस्वीर अपलोड करके पहचान और नियंत्रण संबंधी सहायता ले सकते हैं।

ICAR के प्रिसिजन एग्रीकल्चर नेटवर्क कार्यक्रम में 16 संस्थान सेंसर, ड्रोन, सैटेलाइट, AI और IoT आधारित कृषि तकनीकों पर काम कर रहे हैं।

2026 में शुरू भारत-विस्तार प्लेटफॉर्म को भी बहुभाषी, आवाज आधारित AI व्यवस्था के रूप में विकसित किया जा रहा है, जिसका लक्ष्य मौसम, मंडी भाव, कीट-रोग और मिट्टी संबंधी व्यक्तिगत सलाह किसान तक पहुंचाना है।

लेकिन क्या छोटे किसान पीछे छूट जाएंगे?

यहीं AI खेती का सबसे बड़ा सवाल शुरू होता है। FAO के अनुसार दो हेक्टेयर से कम भूमि वाले छोटे किसान दुनिया की कृषि भूमि के करीब 12 प्रतिशत हिस्से पर काम करते हुए लगभग एक-तिहाई भोजन पैदा करते हैं। इसके बावजूद यही किसान चरम मौसम और डिजिटल बहिष्कार के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं।

2024 में दुनिया में करीब 2.6 अरब लोग अब भी ऑफलाइन थे। ग्रामीण और कम आय वाले क्षेत्रों में यह अंतर ज्यादा है। दक्षिण एशिया और उप-सहारा अफ्रीका में महिलाओं के लिए डिजिटल पहुंच की समस्या और गंभीर है।

अगर AI आधारित खेती के लिए महंगा ड्रोन, सेंसर, सब्सक्रिप्शन और तेज इंटरनेट जरूरी हुआ तो बड़ी कृषि कंपनियां पहले लाभ उठा सकती हैं। इसके विपरीत मोबाइल पर चलने वाला सस्ता ‘स्मॉल AI’, सार्वजनिक सैटेलाइट डेटा और स्थानीय भाषा की वॉइस सेवा छोटे किसानों तक तकनीक पहुंचा सकती है। विश्व बैंक भी कम लागत वाले ‘स्मॉल AI’ को विकासशील देशों में कृषि सहित कई क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण संभावना मानता है।

AI खेती के 5 सबसे बड़े बदलाव

  • बीमारी और कीट का जोखिम दृश्य लक्षण गंभीर होने से पहले पहचानने की संभावना बढ़ेगी।
  • सिंचाई कैलेंडर के बजाय खेत की वास्तविक जल जरूरत के आधार पर हो सकेगी।
  • ड्रोन और सेंसर खाद तथा कीटनाशी का इस्तेमाल पूरे खेत के बजाय जरूरत वाली जगह केंद्रित कर सकते हैं।
  • उपज, सूखा और नुकसान का अनुमान फसल बीमा तथा सरकारी नीति को ज्यादा डेटा आधारित बना सकता है।
  • सबसे बड़ा सवाल तकनीक नहीं, किसान तक पहुंच का होगा—डेटा किसका होगा, AI किस भाषा में बोलेगा और इसकी कीमत कौन देगा?

खेती में अगली बड़ी प्रतिस्पर्धा शायद सबसे बड़ा ट्रैक्टर खरीदने की नहीं होगी। अंतर इस बात से बन सकता है कि किस किसान के पास अपने खेत के बारे में सबसे जल्दी, सबसे सही और सबसे उपयोगी सूचना पहुंचती है।

AI किसान का अनुभव खत्म नहीं करेगा। अधिक वास्तविक संभावना यह है कि अनुभवी किसान की नजर के साथ सैटेलाइट की ऊंचाई, ड्रोन की बारीकी और सेंसर की लगातार निगरानी जुड़ जाएगी। लेकिन यह कृषि क्रांति तभी व्यापक होगी जब तकनीक केवल बड़े खेतों की सुविधा न रहकर छोटे किसान के मोबाइल तक भी पहुंचे।

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