
Andhra Pradesh Junior Doctors Protest : आंध्र प्रदेश के जूनियर डॉक्टर कर रहे प्रदर्शन, PC-Symbolic image by chatgpt
भारत के सरकारी अस्पतालों की रीढ़ माने जाने वाले जूनियर डॉक्टर एक बार फिर सड़कों पर हैं। आंध्र प्रदेश में जूनियर डॉक्टरों के विरोध-प्रदर्शन ने सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावित नहीं किया, बल्कि यह सवाल भी खड़ा किया है कि आखिर देश के मेडिकल सिस्टम में काम करने वाले युवा डॉक्टर किन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं।
जूनियर डॉक्टरों का कहना है कि वे केवल अपने लिए नहीं, बल्कि सुरक्षित कार्यस्थल, बेहतर सुविधाओं और मरीजों के लिए बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि उनकी मांगों पर काम किया जा रहा है। ऐसे में समझना जरूरी है कि यह विवाद आखिर है क्या और इसकी जड़ें कहां तक जाती हैं।
जूनियर डॉक्टर वे मेडिकल ग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट डॉक्टर होते हैं जो मेडिकल कॉलेजों और सरकारी अस्पतालों में प्रशिक्षण के साथ-साथ मरीजों का इलाज भी करते हैं। इनमें शामिल होते हैं-
सरकारी अस्पतालों में ओपीडी, इमरजेंसी, वार्ड और सर्जरी जैसी अधिकांश सेवाओं का बड़ा हिस्सा इन्हीं डॉक्टरों के कंधों पर होता है।
हाल के वर्षों में आंध्र प्रदेश में जूनियर डॉक्टरों के कई अलग-अलग मुद्दों को लेकर आंदोलन हुए हैं। इनमें सबसे प्रमुख मुद्दा डॉक्टरों की सुरक्षा रहा है।
2024 में विजयवाड़ा के सरकारी अस्पताल में एक ड्यूटी डॉक्टर पर मरीज के परिजनों द्वारा कथित हमला किए जाने के बाद आंध्र प्रदेश जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन (APJUDA) ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया। डॉक्टरों ने आरोप लगाया कि अस्पतालों में सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त नहीं है और स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले लगातार बढ़ रहे हैं।
इसके अलावा, कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर की हत्या के बाद देशव्यापी आंदोलन के दौरान आंध्र प्रदेश के जूनियर डॉक्टर भी प्रदर्शन में शामिल हुए। उनकी मांग थी कि डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए सख्त केंद्रीय कानून लागू किया जाए।
सरकारी मेडिकल कॉलेजों और बड़े अस्पतालों में जूनियर डॉक्टर स्वास्थ्य सेवाओं का सबसे सक्रिय हिस्सा होते हैं। जब वे हड़ताल पर जाते हैं, तो सबसे पहले ओपीडी सेवाएं प्रभावित होती हैं।
| सेवा | असर |
|---|---|
| ओपीडी | मरीजों की संख्या कम करनी पड़ती है |
| वार्ड सेवाएं | कार्यभार बढ़ जाता है |
| वैकल्पिक सर्जरी | स्थगित हो सकती हैं |
| मेडिकल कॉलेज | प्रशिक्षण प्रभावित होता है |
| इमरजेंसी | आमतौर पर जारी रखी जाती है |
कई बार अस्पतालों को वरिष्ठ डॉक्टरों और फैकल्टी सदस्यों की मदद से सेवाएं चलानी पड़ती हैं।
भारत में डॉक्टरों पर हमले की घटनाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। मरीज की मौत, इलाज में देरी, अस्पताल में भीड़ या गलतफहमी जैसी परिस्थितियों में कई बार स्वास्थ्यकर्मी हिंसा का शिकार हो जाते हैं।
जूनियर डॉक्टरों का तर्क है कि वे सबसे अधिक समय मरीजों के संपर्क में रहते हैं। कई अस्पतालों में सुरक्षा व्यवस्था सीमित है।तनावपूर्ण माहौल में काम करना पड़ता है। लंबे समय तक ड्यूटी करने से मानसिक दबाव बढ़ता है। इसी वजह से वे लंबे समय से मजबूत सुरक्षा कानून की मांग कर रहे हैं।
आंध्र प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा विभाग ने कई मौकों पर कहा है कि डॉक्टरों की सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी मांगों पर कार्रवाई की जा रही है।
अधिकारियों ने अस्पताल परिसरों में सुरक्षा बढ़ाने, ड्यूटी रूम और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने का आश्वासन भी दिया है। हालांकि डॉक्टर संगठनों का कहना है कि केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि जमीनी स्तर पर बदलाव दिखाई देने चाहिए।
Updated on:
24 Aug 2026 03:17 pm
Published on:
17 Aug 2026 03:59 pm
