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शतावरी की खेती: पारंपरिक तरीके से आधुनिक तकनीक तक, जानें बेहतर उत्पादन का तरीका

औषधीय पौधों की बढ़ती मांग के बीच शतावरी किसानों के लिए उभरती फसल है। जानिए बीज और क्राउन से पौध तैयार करने से लेकर मिट्टी, सिंचाई, पोषण, उत्पादन और प्रसंस्करण तक पूरी जानकारी।
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Avaneesh Kumar Mishra

Sep 14, 2026

Asparagus racemosus : कैसे करें शतावरी की खेती, PC- Chatgpt

शतावरी (Asparagus racemosus) आयुर्वेद में महत्वपूर्ण औषधीय पौधों में शामिल है। इसकी जड़ों का उपयोग विभिन्न पारंपरिक औषधीय तैयारियों में किया जाता है। औषधीय उद्योग में मांग बढ़ने के साथ इसकी संगठित खेती की संभावनाएं भी बढ़ी हैं। हालांकि, अच्छी गुणवत्ता वाली जड़ और बाजार योग्य उत्पादन के लिए सही रोपण सामग्री, जल निकासी, पोषण प्रबंधन और खुदाई की तकनीक बेहद महत्वपूर्ण है।

शतावरी की खेती के लिए कैसी मिट्टी और जलवायु जरूरी?

शतावरी गर्म और उपोष्णकटिबंधीय परिस्थितियों में अच्छी तरह विकसित हो सकती है। अच्छी जल निकासी वाली रेतीली दोमट से दोमट मिट्टी इसके लिए उपयुक्त मानी जाती है। मिट्टी का pH लगभग 6 से 8 के बीच रखा जा सकता है। खेत में पानी का ठहराव शतावरी के लिए नुकसानदायक है, क्योंकि इससे जड़ों में सड़न की समस्या बढ़ सकती है।

ऐसे क्षेत्र जहां बारिश के बाद खेत में पानी लंबे समय तक जमा नहीं रहता, वहां इसकी खेती अपेक्षाकृत बेहतर रहती है। सिंचाई की मात्रा मिट्टी, मौसम और पौधे की अवस्था के अनुसार तय करनी चाहिए।

बीज से पौध तैयार करने का पारंपरिक तरीका

शतावरी का प्रवर्धन मुख्य रूप से बीज और पौधे के क्राउन/जड़ वाले भाग से किया जाता है। बीज से पौधे तैयार करने में समय अधिक लग सकता है, लेकिन बड़ी संख्या में पौध तैयार की जा सकती है।

पके हुए फलों से बीज प्राप्त किए जाते हैं। बीजों को साफ करने के बाद नर्सरी में बोया जाता है। बेहतर अंकुरण के लिए बीज को बुवाई से पहले पानी में भिगोने जैसी उपचार विधियां अपनाई जा सकती हैं। हल्का स्कारिफिकेशन भी कुछ परिस्थितियों में अंकुरण सुधार सकता है, लेकिन उपचार की विधि और अवधि स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार तय करना बेहतर है।

बीजों को लगभग 1–2 सेंटीमीटर गहराई पर नर्सरी बेड या ट्रे में बोया जा सकता है। पौध पर्याप्त विकसित होने के बाद खेत में रोपाई की जाती है। बीज से तैयार फसल में जड़ों के व्यावसायिक आकार तक पहुंचने में अपेक्षाकृत अधिक समय लग सकता है।

क्राउन से पौध तैयार करने में मिलती है एकरूपता

क्राउन या जड़युक्त पौध सामग्री से प्रवर्धन करने पर खेत में पौध स्थापित करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। इससे अच्छी गुणवत्ता वाले मातृ पौधों की विशेषताओं को बनाए रखने में मदद मिलती है। हालांकि, इसके लिए स्वस्थ और रोगमुक्त रोपण सामग्री उपलब्ध होना जरूरी है।

बड़ी मात्रा में खेती करने वाले किसानों के लिए प्रमाणित पौध सामग्री का चयन महत्वपूर्ण है, क्योंकि रोगग्रस्त या कमजोर पौध आगे चलकर उत्पादन और जड़ की गुणवत्ता दोनों को प्रभावित कर सकते हैं।

नर्सरी से खेत तक रोपाई में रखें दूरी का ध्यान

नर्सरी में पौध तैयार करने के बाद स्वस्थ पौध को मुख्य खेत में लगाया जाता है। खेत की तैयारी के दौरान पर्याप्त जैविक खाद मिलाने और जल निकासी की व्यवस्था करने पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

रोपाई की दूरी स्थानीय किस्म, मिट्टी और खेती की पद्धति के अनुसार तय की जानी चाहिए। बहुत अधिक घनी रोपाई से हवा का संचार प्रभावित हो सकता है और रोगों का खतरा बढ़ सकता है।

माइक्रोप्रोपेगेशन से तैयार हो सकती है गुणवत्तापूर्ण पौध

शतावरी के बड़े पैमाने पर गुणवत्तापूर्ण और एकरूप पौध उत्पादन के लिए टिश्यू कल्चर या माइक्रोप्रोपेगेशन पर भी काम किया जा रहा है। इसमें पौधे के चयनित हिस्से को नियंत्रित परिस्थितियों में पोषक माध्यम पर विकसित किया जाता है।

हाल के शोधों में नोडल एक्सप्लांट से नए शूट विकसित करने की संभावनाएं सामने आई हैं। हालांकि, शूट बनने के बाद जड़ विकसित करने की प्रक्रिया अभी भी महत्वपूर्ण चुनौती है। इसलिए टिश्यू कल्चर से तैयार पौध को व्यावसायिक स्तर पर अपनाने से पहले उसकी गुणवत्ता, रोगमुक्त स्थिति और स्थानीय परिस्थितियों में अनुकूलता की जांच जरूरी है।

जैविक खाद के साथ संतुलित पोषण से बेहतर उत्पादन

शतावरी में जड़ों का विकास ही उत्पादन का मुख्य आधार है। इसलिए खेत की मिट्टी की जांच के आधार पर पोषक तत्वों का प्रबंधन करना बेहतर है।

जम्मू-कश्मीर में किए गए एक परीक्षण में अलग-अलग शतावरी जीनोटाइप के प्रदर्शन में अंतर पाया गया। कुछ चयनित जीनोटाइप में सूखी ट्यूबर उपज लगभग 3.5 से 4 टन प्रति हेक्टेयर तक दर्ज की गई। इसी तरह, नाइट्रोजन की कुछ मात्रा को वर्मी कम्पोस्ट या गोबर की खाद से बदलने पर भी बेहतर उत्पादन की संभावना देखी गई।

इन आंकड़ों को सभी क्षेत्रों में मिलने वाली सामान्य उपज नहीं माना जाना चाहिए। वास्तविक उत्पादन किस्म, जलवायु, मिट्टी, पौध संख्या, प्रबंधन और खुदाई की उम्र पर निर्भर करता है।

सिंचाई में सबसे जरूरी है जलभराव से बचाव

शतावरी को नमी की आवश्यकता होती है, लेकिन लगातार गीली मिट्टी नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए सिंचाई जरूरत के अनुसार करें और खेत में जल निकासी की व्यवस्था रखें।

हल्की मिट्टी में अपेक्षाकृत कम मात्रा में और आवश्यकता के अनुसार सिंचाई करना बेहतर हो सकता है। ड्रिप सिंचाई जैसी विधियों से पानी को पौधों के पास नियंत्रित मात्रा में पहुंचाया जा सकता है और अनावश्यक नमी को कम किया जा सकता है।

जड़ों की खुदाई में बरतें विशेष सावधानी

शतावरी की व्यावसायिक उपज मुख्य रूप से उसकी जड़ों से प्राप्त होती है। इसलिए खुदाई के दौरान जड़ों को काटने या तोड़ने से बचना जरूरी है। टूटी या क्षतिग्रस्त जड़ों की गुणवत्ता और बाजार मूल्य प्रभावित हो सकता है।

खुदाई के बाद जड़ों को साफ कर आकार के अनुसार अलग किया जाता है। इसके बाद उन्हें निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार सुखाकर औषधीय उपयोग के लिए तैयार किया जाता है। प्रसंस्करण और प्राथमिक सफाई की सुविधा उत्पादन क्षेत्र के आसपास होने पर परिवहन के दौरान होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।

जड़ सड़न से बचाव के लिए क्या करें?

अत्यधिक नमी और खराब जल निकासी से जड़ सड़न जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। प्रभावित पौधों को खेत से निकालकर नष्ट करना और खेत में जल निकासी सुधारना जरूरी है।

जैविक खेती या एकीकृत रोग प्रबंधन में ट्राइकोडर्मा जैसे जैव-एजेंटों का उपयोग किया जाता है। इनका इस्तेमाल स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विभाग की अनुशंसित मात्रा और विधि के अनुसार करना चाहिए। एक ही खेत में लगातार शतावरी लगाने के बजाय उचित फसल चक्र अपनाने से मिट्टी में रोगजनकों के दबाव को कम करने में मदद मिल सकती है।

बाजार से जुड़ाव के बिना औषधीय फसल की खेती अधूरी

शतावरी की खेती शुरू करने से पहले किसान को सिर्फ उत्पादन नहीं, बल्कि खरीदार और प्रसंस्करण बाजार की जानकारी भी जुटानी चाहिए। औषधीय पौधों की बिक्री सामान्य सब्जी मंडी की तरह नहीं होती। गुणवत्ता, नमी, जड़ का आकार, सफाई और प्रसंस्करण के आधार पर कीमत में अंतर हो सकता है।

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