
Ayushman Bharat Card Treatment Denial : आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना, PC- Chatgpt
आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना यानी AB-PMJAY का मकसद गरीब और पात्र परिवारों को अस्पताल में इलाज के लिए आर्थिक सुरक्षा देना है। योजना के तहत पात्र परिवार को सालाना 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य कवर मिलता है। लेकिन सवाल यह है कि कार्ड हाथ में होने के बावजूद क्या हर मरीज को आसानी से इलाज मिल जाता है?
जवाब पूरी तरह हां नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसे मामले सामने आते रहे हैं, जहां मरीजों ने आयुष्मान कार्ड स्वीकार न करने, पैकेज में इलाज उपलब्ध नहीं होने, अतिरिक्त पैसे मांगने या अस्पताल द्वारा योजना के तहत भर्ती करने से इनकार करने की शिकायत की है।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। सरकार के पास देशभर में इलाज से मना करने वाले अस्पतालों की कोई अलग और ताजा संख्या सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि “इतने अस्पताल आयुष्मान मरीजों को भर्ती नहीं करते।” उपलब्ध आंकड़े शिकायतों, अस्पतालों के निलंबन और योजना से बाहर होने की संख्या बताते हैं।
स्वास्थ्य मंत्रालय की 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी से दिसंबर 2025 के दौरान Centralized Grievance Redressal Management System (CGRMS) पर 93,537 शिकायतें दर्ज हुईं। इसके अलावा 5,877 शिकायतें CPGRAMS पर दर्ज हुईं। इनमें क्रमशः 99.46 प्रतिशत और 99.74 प्रतिशत शिकायतों का निर्धारित समयसीमा में निपटारा किया गया।
लेकिन इन 93,537 शिकायतों को सीधे “इलाज से इनकार” नहीं माना जा सकता। शिकायतों में कार्ड, पात्रता, अस्पताल में भर्ती, पैसे की मांग, इलाज से जुड़ी समस्याएं और दूसरी दिक्कतें भी शामिल होती हैं।
यानी 93 हजार से ज्यादा शिकायतें यह बताती हैं कि योजना के इस्तेमाल में समस्याएं हैं, लेकिन यह आंकड़ा यह नहीं बताता कि कितने मरीजों को अस्पताल ने इलाज देने से मना किया। यह अंतर स्टोरी में साफ रखना बेहद जरूरी है।
AB-PMJAY के नियमों के मुताबिक, योजना में शामिल यानी empanelled अस्पताल किसी पात्र लाभार्थी को योजना के तहत मिलने वाले इलाज से मना नहीं कर सकता। अगर अस्पताल इलाज से इनकार करता है या योजना के तहत मिलने वाली सुविधा के लिए पैसे मांगता है, तो लाभार्थी शिकायत कर सकता है।
सरकार ने इसके लिए जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर तीन-स्तरीय शिकायत निवारण व्यवस्था बनाई है। लाभार्थी 14555 पर संपर्क कर सकते हैं और CGRMS के जरिए शिकायत दर्ज कर सकते हैं। यानी नियमों में मरीज के लिए सुरक्षा मौजूद है, लेकिन असली सवाल इसका जमीन पर कितना प्रभावी क्रियान्वयन है।
यहां तस्वीर पहले के मुकाबले काफी बड़ी हुई है। 28 फरवरी 2026 तक देश में 36,229 अस्पताल AB-PMJAY के तहत empanelled थे। इनमें 19,483 सरकारी और 16,746 निजी अस्पताल थे। यानी कुल नेटवर्क का करीब 46 प्रतिशत निजी अस्पतालों का है।
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आयुष्मान योजना की सफलता सिर्फ सरकारी अस्पतालों पर निर्भर नहीं है। खासकर बड़े शहरों में विशेषज्ञ और महंगे इलाज के लिए निजी अस्पतालों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
योजना के तहत अब तक 11.69 करोड़ अस्पताल में भर्ती के मामले अधिकृत किए जा चुके थे, जिनमें 6.74 करोड़ निजी अस्पतालों में हुए। यानी कुल अधिकृत admissions का लगभग 58 प्रतिशत निजी अस्पतालों से आया। इससे साफ है कि निजी अस्पताल योजना के सिर्फ साझेदार नहीं हैं, बल्कि इसकी पूरी व्यवस्था का बड़ा हिस्सा हैं।
यहीं से कहानी का दूसरा पक्ष सामने आता है। निजी अस्पतालों का कहना रहा है कि उन्हें मरीज का इलाज पहले करना पड़ता है और भुगतान बाद में मिलता है। अगर भुगतान में देरी हो, दावा खारिज हो जाए या पैकेज की तय दर इलाज की वास्तविक लागत के मुकाबले कम हो, तो अस्पतालों पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।
मार्च 2025 में सरकार ने लोकसभा में बताया था कि निजी अस्पतालों की भागीदारी बढ़ाने के लिए Health Benefit Packages में बदलाव किए गए हैं। 1,961 प्रक्रियाओं को पैकेज में शामिल किया गया और 350 पैकेज की दरों में बढ़ोतरी की गई। सरकार ने दावा निपटाने की प्रक्रिया पर निगरानी और अस्पतालों की समस्याओं के लिए अलग व्यवस्था की बात भी कही। लेकिन जमीन पर भुगतान को लेकर विवाद खत्म नहीं हुआ।
अगस्त 2025 में हरियाणा इसका बड़ा उदाहरण बना। राज्य के करीब 650 निजी अस्पतालों ने बकाया भुगतान को लेकर आयुष्मान योजना के तहत सेवाएं रोक दी थीं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की हरियाणा इकाई ने लगभग 490 करोड़ रुपये के बकाये का मुद्दा उठाया था। बाद में बातचीत और भुगतान प्रक्रिया शुरू होने के बाद 19 दिन के बाद सेवाएं बहाल हुईं।
यह घटना यह दिखाती है कि मरीज को इलाज न मिलने का कारण हमेशा अस्पताल की मनमानी ही नहीं होता। कई बार सरकार और अस्पताल के बीच भुगतान का विवाद भी मरीज तक पहुंचने वाली सेवा को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि इससे यह निष्कर्ष भी नहीं निकालना चाहिए कि हर निजी अस्पताल आयुष्मान मरीज को मना करता है। देशभर में लाखों मरीजों का निजी अस्पतालों में इलाज हो रहा है।
यह भी एक महत्वपूर्ण आंकड़ा है। 15 नवंबर 2025 तक 1,184 अस्पतालों को योजना से de-empanelled किया गया था और 411 अस्पतालों को suspend किया गया था। इन कार्रवाइयों का संबंध योजना के नियमों के उल्लंघन और दूसरी अनियमितताओं से था। लेकिन, यहां भी सावधानी जरूरी है।
1,184 de-empanelled अस्पतालों को “इलाज से इनकार करने वाले अस्पताल” कहना गलत होगा। अस्पतालों को अलग-अलग कारणों से योजना से हटाया जा सकता है, जिसमें धोखाधड़ी और नियमों का उल्लंघन भी शामिल है।
सरकार की 2025-26 की रिपोर्ट के अनुसार, fraud-control व्यवस्था के तहत 1,184 अस्पतालों को de-empanel किया गया, 411 को suspend किया गया, 26 FIR दर्ज हुईं और कुल 231.88 करोड़ रुपये की penalties लगाई गईं।
आयुष्मान योजना की सबसे बड़ी चुनौती अब केवल कार्ड बनाने या अस्पतालों की संख्या बढ़ाने की नहीं है। चुनौती है कि कार्ड को वास्तविक इलाज में बदला जाए।
इसके लिए तीन स्तर पर समस्या दिखाई देती है। पहली, अस्पतालों की उपलब्धता। हर जिले में समान संख्या में निजी अस्पताल नहीं हैं। शोध में भी पाया गया है कि निजी अस्पताल शहरी और अपेक्षाकृत समृद्ध इलाकों में अधिक केंद्रित हैं, जबकि ग्रामीण और कम विकसित क्षेत्रों में इनकी उपलब्धता कम है।
दूसरी, पैकेज और भुगतान। अगर अस्पतालों को समय पर भुगतान नहीं मिलता या इलाज की लागत और पैकेज दर में बड़ा अंतर होता है, तो निजी अस्पतालों की योजना में रुचि कम हो सकती है।
तीसरी, मरीज की जानकारी। कई लाभार्थियों को यह स्पष्ट जानकारी नहीं होती कि कौन सा इलाज योजना में शामिल है, किस अस्पताल में वह सुविधा उपलब्ध है और अस्पताल द्वारा अतिरिक्त पैसे मांगने पर कहां शिकायत करनी है। हालिया शोध में बिहार और उत्तर प्रदेश समेत कुछ राज्यों में लाभार्थियों के ऐसे अनुभव दर्ज किए गए हैं, जहां वे लंबी दूरी तय करने के बाद योजना के तहत इलाज न मिलने की स्थिति में लौटे।
अगर कोई empanelled अस्पताल पात्र मरीज को आयुष्मान योजना के तहत इलाज देने से मना करता है या कैशलेस इलाज के लिए पैसे मांगता है, तो मरीज को केवल अस्पताल से बहस करने के बजाय शिकायत दर्ज करनी चाहिए।
राष्ट्रीय स्तर पर 14555 हेल्पलाइन और CGRMS शिकायत व्यवस्था उपलब्ध है। सरकार के अनुसार denial of treatment जैसी शिकायतों को संबंधित राज्य स्वास्थ्य एजेंसी तक भेजकर कार्रवाई की जाती है।
Updated on:
16 Aug 2026 11:41 am
Published on:
16 Aug 2026 11:41 am
