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संसद को चलाने में एक दिन में खर्च होते हैं करोड़ों! जानिए कहां खर्च होता है इतना पैसा

भारतीय संसद को चलाने में हर दिन करीब 9 करोड़ रुपये यानी लगभग 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट का भारी भरकम खर्च आता है। जब संसद में गतिरोध या हंगामे से कामकाज बाधित होता है, तो जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये सीधे बर्बाद हो जाते हैं।
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भारत

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Adarsh Thakur

Aug 16, 2026

Parliament Running Cost

संसद को चलाने में कितना खर्च लगता है? (फोटोः एआई)

भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर यानी संसद का सत्र जब भी शुरू होता है, पूरे देश की निगाहें दोनों सदनों पर टिक जाती हैं। जनता को उम्मीद होती है कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि देशहित की नीतियों, महंगाई, रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी मुद्दों पर सार्थक बहस करेंगे, लेकिन अक्सर राजनीतिक गतिरोध और हंगामे के चलते कार्यवाही स्थगित हो जाती है। क्या आपने कभी सोचा है कि जिस संसद को हम टीवी पर देखते हैं, उसे सुचारू रूप से चलाने में देश का कितना पैसा खर्च होता है? आंकड़े बताते हैं कि संसद के एक दिन के संचालन पर करीब ₹9 करोड़ का खर्च आता है। यानी संसद के हर एक मिनट की कीमत लगभग ₹2.5 लाख बैठती है।

यह भारी भरकम खर्च लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों का संयुक्त व्यय होता है। जब भी सदन हंगामे की भेंट चढ़ता है, तो समय और देश के ईमानदार टैक्सपेयर्स के पैसों का सीधा नुकसान होता है।

प्रति मिनट ₹2.5 लाख का खर्च

संसद के संचालन खर्च का यह विश्लेषण दोनों सदनों के संयुक्त वार्षिक बजट और सत्र के कार्यदिवसों पर आधारित होता है। संसदीय कार्य मंत्रालय और पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अध्ययनों के अनुसार, संसद के एक सामान्य कार्यदिवस में दोनों सदनों की लगभग 6-6 घंटे की कार्यवाही तय होती है।

इस समय सारिणी के अनुसार खर्च का विभाजन इस प्रकार समझा जा सकता है:

  • प्रति मिनट खर्च: लगभग ₹2.5 लाख (लोकसभा और राज्यसभा दोनों का मिलाकर)
  • प्रति घंटा खर्च: लगभग ₹1.5 करोड़
  • प्रति दिन खर्च (6 घंटे के सत्र आधार पर): लगभग ₹9 करोड़

यदि संसद का कोई सत्र (जैसे मानसून या शीतकालीन सत्र) 15 से 20 कार्यदिवसों का है, तो उस पूरे सत्र को आयोजित करने का कुल वित्तीय भार लगभग ₹135 करोड़ से ₹180 करोड़ के बीच आता है। यदि किसी सत्र में हंगामे और स्थगन के कारण 50 घंटे का समय बर्बाद होता है, तो देश को सीधे तौर पर करीब ₹75 करोड़ का सीधा वित्तीय नुकसान झेलना पड़ता है।

जानिए कहां खर्च होता है इतना पैसा?

संसद चलाना सांसदों का एक हॉल में बैठना भर नहीं है। इसके पीछे एक विशाल प्रशासनिक, तकनीकी और सुरक्षा तंत्र चौबीसों घंटे काम करता है। ₹9 करोड़ के दैनिक खर्च में मुख्य रूप से निम्नलिखित मदें (खर्च) शामिल होती हैं:

  1. सांसदों के वेतन, भत्ते और सुविधाएं:लोकसभा के 543 और राज्यसभा के 245 सांसदों का मासिक वेतन, दैनिक भत्ता (Per Diem), निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, कार्यालय व्यय और देश भर में यात्रा करने के लिए मिलने वाले यात्रा भत्ते (टीए/डीए) इस बजट का बड़ा हिस्सा होते हैं।
  2. सचिवालय और कर्मचारियों का विशाल अमला:लोकसभा सचिवालय और राज्यसभा सचिवालय के हजारों अधिकारियों, शोधकर्ताओं, अनुवादकों, आशुलिपिकों, टेबल ऑफिस स्टाफ और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का वेतन तथा प्रशासनिक प्रबंधन। संसद में बोली जाने वाली विभिन्न भारतीय भाषाओं के लाइव अनुवाद (Simultaneous Interpretation) के लिए विशेष व्यवस्था होती है।
  3. त्रिस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था:संसद परिसर देश के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है। दिल्ली पुलिस, संसद सुरक्षा सेवा (PSS), केंद्रीय अर्धसैनिक बल और विशेष कमांडो दस्ते की चौबीसों घंटे तैनाती, आधुनिक स्कैनर, बायोमेट्रिक और एंटी ड्रोन सुरक्षा ग्रिड पर प्रतिदिन भारी भरकम राशि खर्च होती है।
  4. भवन रखरखाव, ऊर्जा और आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर:नए संसद भवन और संपूर्ण परिसर का बिजली बिल, एयर कंडीशनिंग, शुद्ध जल आपूर्ति, हाईटेक ऑडियो विजुअल सिस्टम, डिजिटल वोटिंग कंसोल, वाईफाई और सुरक्षित सर्वर नेटवर्क का मेंटेनेंस लगातार चलता रहता है।
  5. प्रसारण और डिजिटल रिकॉर्डिंग (संसद टीवी):संसदीय बहसों का देश भर में सीधा प्रसारण करने वाला संसद टीवी, एचडी कैमरा नेटवर्क, ब्रॉडकास्टिंग ओबी वैन, डिजिटल आर्काइव और हर शब्द का आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार करने वाली रिपोर्टिंग टीम का संचालन।

संसद ठप होने से पैसे के अलावा और क्या खोता है देश?

संसद का काम कानून बनाने के अलावा सरकार की जवाबदेही तय करना भी है। जब सदन हंगामे के कारण ठप होता है, तो वित्तीय बर्बादी से भी बड़ा नुकसान लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पहुंचता है:

  • प्रश्नकाल की बलि: शून्यकाल और प्रश्नकाल रद्द होने से जनता से जुड़े ज्वलंत मुद्दों (महंगाई, बेरोजगारी, स्वास्थ्य संकट, किसान समस्याएं) पर सरकार से सीधे सवाल पूछने का अवसर खत्म हो जाता है।
  • बिना बहस पास होते महत्वपूर्ण कानून: सत्र समाप्ति के अंतिम दिनों में गतिरोध के बीच कई महत्वपूर्ण और दूरगामी विधेयक बिना किसी गहन बहस, समीक्षा या संशोधनों के महज 5 से 10 मिनट में पारित करा लिए जाते हैं। इससे कानूनों की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
  • विकास योजनाओं और नीतियों में देरी: जनहित से जुड़े सुधार, स्वास्थ्य सुरक्षा और शिक्षा से जुड़े नए विधेयक महीनों या सालों तक लटक जाते हैं, जिससे देश की समग्र विकास गति धीमी पड़ती है।

संसद देश की संप्रभुता और जन आकांक्षाओं का प्रतीक है। इसलिए जब संसद का एक भी घंटा बिना काम के बीतता है, तो वह जनता के हितों और लोकतंत्र के सबसे कीमती समय का नुकसान होता है।