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जाति जनगणना का ‘खुला सवाल’: एक कॉलम से कैसे बदल सकता है आरक्षण और चुनावी सीटों का गणित?

क्या आप जानते हैं कि जाति जनगणना सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरण भी बदल सकती है? सोचिए, जब नए आंकड़े सामने आएंगे, तो आपकी वोटिंग रणनीति और आरक्षण की सीमाएं कैसे प्रभावित होंगी!
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Avaneesh Kumar Mishra

Sep 13, 2026

जनगणना 2027 में पहली बार आजादी के बाद सभी नागरिकों से उनकी जाति पूछी जाएगी। सरकार ने 14 अगस्त 2026 को जनसंख्या गणना के लिए 40 सवालों की प्रश्नावली अधिसूचित की है। इसमें प्रश्न संख्या 10 अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और जाति से संबंधित है। सबसे बड़ा विवाद सवाल पूछने के तरीके को लेकर है। जातियों की पहले से तैयार सूची देने के बजाय व्यक्ति अपनी जाति या उपजाति का नाम खुद बताएगा और उसे खुले कॉलम में दर्ज किया जाएगा।

सवाल केवल इतना नहीं है कि कोई व्यक्ति अपनी जाति क्या लिखता है। असली चुनौती उसके बाद शुरू होगी—एक ही समुदाय के अलग-अलग नाम, उपजातियां, स्थानीय नाम, गोत्र और उपनाम को आखिर एक मानक श्रेणी में कैसे जोड़ा जाएगा?

यही एक कॉलम भविष्य में ओबीसी आबादी के आंकड़े, कल्याण योजनाओं, आरक्षण की राजनीतिक बहस और जातीय प्रतिनिधित्व के दावों को प्रभावित कर सकता है।

आखिर ‘खुला सवाल’ क्या है?

मान लीजिए किसी गांव में एक ही समुदाय के लोग अपनी जाति अलग-अलग तरीके से बताते हैं। कोई मुख्य जाति का नाम लिखवाता है, कोई उपजाति, कोई स्थानीय नाम और कोई अपना उपनाम।

खुले कॉलम वाली व्यवस्था में गणनाकर्मी उपलब्ध पूर्वनिर्धारित सूची से नाम चुनने के बजाय उत्तरदाता द्वारा बताया गया नाम दर्ज करेगा।

यहीं समस्या पैदा हो सकती है। उदाहरण के लिए किसी उपनाम का इस्तेमाल अलग-अलग राज्यों या समुदायों में अलग जातियों के लोग कर सकते हैं। उसी तरह एक ही जाति अलग-अलग क्षेत्रों में अलग नाम से जानी जा सकती है। इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में इसी वजह से खुली प्रविष्टि को वर्गीकरण की बड़ी चुनौती बताया गया है।

2011 में 4,147 से कैसे बन गए 46.7 लाख नाम?

इस विवाद के पीछे 2011 की सामाजिक-आर्थिक एवं जाति गणना का अनुभव है। 1931 की आखिरी व्यापक जाति गणना में करीब 4,147 जातियां दर्ज थीं। इसके मुकाबले 2011 की सामाजिक-आर्थिक एवं जाति गणना में लगभग 46.7 लाख अलग-अलग जाति-नाम वाली प्रविष्टियां सामने आईं। इसका मतलब यह नहीं था कि भारत में 46.7 लाख वास्तविक जातियां थीं।

इन प्रविष्टियों में अलग वर्तनी, उपजातियां, उपनाम, गोत्र, स्थानीय नाम और कई प्रकार की पहचान शामिल हो गई थीं। आखिरकार जाति संबंधी पूरा आंकड़ा सार्वजनिक उपयोग में नहीं लाया जा सका।

यही कारण है कि 2027 में सबसे बड़ी परीक्षा गिनती की नहीं बल्कि गिनती के बाद नामों को सही श्रेणी में रखने की होगी।

जातियों के लाखों नाम आखिर जोड़े कैसे जा सकते हैं?

यहां तीन अलग स्तर समझना जरूरी है।

पहला-स्व-पहचान: व्यक्ति जो जाति बताता है, उसे दर्ज किया जाएगा।

दूसरा-नामों का मानकीकरण: एक ही जाति की अलग वर्तनी, स्थानीय नाम और उपजातियों को पहचानकर एक मुख्य समूह से जोड़ना पड़ सकता है।

तीसरा-कानूनी श्रेणी से मिलान: इसके बाद देखना होगा कि संबंधित समुदाय केंद्रीय ओबीसी सूची, राज्य की पिछड़ा वर्ग सूची, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति की अधिसूचित सूची में आता है या नहीं।

अनुसूचित जाति और जनजाति की गणना में जनगणना विभाग पहले से एक गतिशील कोड निर्देशिका का इस्तेमाल करता रहा है। इसमें मुख्य जाति या जनजाति और उसके मान्य पर्याय अथवा उपसमूहों को अलग कोड देकर जोड़ा जाता है।

लेकिन 2027 में सभी जातियों की खुली प्रविष्टियों को अंतिम रूप से किस विस्तृत नियम से मानकीकृत किया जाएगा, इसका पूरा सार्वजनिक तकनीकी ढांचा अभी स्पष्ट नहीं है। यही विवाद की जड़ है।

केंद्रीय सूची में ही करीब 2,483 ओबीसी प्रविष्टियां

समस्या इसलिए भी जटिल है क्योंकि देश में ओबीसी की केवल एक साधारण अखिल भारतीय सूची नहीं है। सामाजिक न्याय मंत्रालय से जुड़ी केंद्रीय सूची में करीब 2,483 प्रविष्टियां होने की जानकारी सरकारी अधिकारियों की बैठक में सामने आई है। इसके अलावा राज्यों की अपनी पिछड़ा वर्ग सूचियां हो सकती हैं और उनमें समुदायों का वर्गीकरण केंद्रीय सूची से अलग भी हो सकता है।

105वें संविधान संशोधन के बाद राज्यों की अपनी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की सूची तय करने की शक्ति बहाल की गई थी। इसलिए कोई जाति किसी राज्य की सूची में पिछड़ा वर्ग हो सकती है, लेकिन केंद्रीय सूची में उसकी स्थिति अलग हो सकती है।

इसका मतलब है कि जाति का नाम दर्ज होना और ओबीसी दर्जा मिलना दो अलग बातें हैं। जनगणना में किसी व्यक्ति का किसी जाति का नाम बताना उस समुदाय को अपने-आप ओबीसी आरक्षण का अधिकार नहीं देगा।

खुला कॉलम बनाम पहले से तैयार सूची

तरीकाफायदासबसे बड़ा खतरा
खुला कॉलमव्यक्ति अपनी पहचान अपने शब्दों में बता सकता हैएक जाति के कई नाम और गलत वर्तनी
पहले से तैयार सूचीआंकड़ों का वर्गीकरण आसानसूची से बाहर की पहचान छूट सकती है
केंद्रीय ओबीसी सूचीकेंद्र की योजनाओं के लिए मानकीकरण आसानराज्य सूची से अंतर
राज्य सूचीस्थानीय सामाजिक संरचना बेहतर दिख सकती हैपूरे देश में समान वर्गीकरण मुश्किल
बाद में कोडिंगअलग नामों को एक समुदाय में जोड़ा जा सकता हैगलत विलय या गलत अलगाव का खतरा

तमिलनाडु ने क्यों जताया विरोध?

तमिलनाडु विधानसभा ने 8 सितंबर 2026 को प्रस्ताव पारित कर खुले कॉलम की व्यवस्था हटाने और केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा अधिसूचित जातियों की पहले से भरी मानकीकृत सूची उपलब्ध कराने की मांग की।

राज्य का तर्क है कि अगर एक ही समुदाय कई नामों में बंट गया तो उसकी वास्तविक आबादी कम दिखाई दे सकती है। दूसरी तरफ अलग-अलग समूहों को गलती से एक साथ जोड़ दिया गया तो किसी समुदाय की संख्या वास्तविकता से अधिक दिखाई दे सकती है।

गलत वर्गीकरण से आरक्षण कैसे प्रभावित हो सकता है?

सबसे जरूरी बात- जनगणना पूरी होते ही आरक्षण प्रतिशत अपने-आप नहीं बदलेगा। केंद्रीय सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था अलग कानूनों और नीतियों से चलती है। सुप्रीम कोर्ट ने इंद्रा साहनी मामले में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण को बरकरार रखते हुए सामान्य परिस्थितियों में कुल आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा और क्रीमी लेयर बाहर रखने का सिद्धांत स्थापित किया था। 2026 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में भी इन सिद्धांतों को दोहराया गया है।

लेकिन विश्वसनीय जातीय आबादी सामने आने पर राजनीतिक सवाल बदल सकते हैं। अगर किसी समुदाय की संख्या अनुमान से बहुत ज्यादा निकलती है तो वह आरक्षण में अधिक हिस्सेदारी की मांग कर सकता है। छोटे ओबीसी समुदाय यह दावा कर सकते हैं कि बड़ी जातियां आरक्षण का अधिकांश लाभ ले रही हैं और उनके लिए ओबीसी के भीतर उप-वर्गीकरण होना चाहिए।

यानी जाति जनगणना आरक्षण नहीं बदलेगी, लेकिन आरक्षण बदलने की राजनीतिक और कानूनी बहस को नया आंकड़ा जरूर दे सकती है।

कल्याण योजनाओं का गणित भी बदल सकता है

जातीय आंकड़ों को शिक्षा, रोजगार, आय, आवास और दूसरे सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों से जोड़ा गया तो सरकारों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि किन समुदायों तक योजनाओं का लाभ कम पहुंच रहा है।

मसलन, किसी जिले में किसी पिछड़े समुदाय की आबादी पहले अनुमान से दोगुनी निकलती है लेकिन छात्रवृत्ति, प्रशिक्षण या स्वरोजगार योजनाओं में उसकी हिस्सेदारी बहुत कम है तो बजट आवंटन बदलने की मांग उठ सकती है।

लेकिन गलत वर्गीकरण हुआ तो इसके उलटे परिणाम भी हो सकते हैं-कागज पर आबादी कम दिखाई देने से समुदाय के लिए बनाई जाने वाली नीति भी कमजोर आधार पर बन सकती है।

क्या जाति के आंकड़ों से लोकसभा सीटें बदलेंगी?

सीधे तौर पर नहीं। लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन मुख्य रूप से कुल जनसंख्या के आधार पर होता है, जाति के आधार पर नहीं। चुनाव आयोग के मुताबिक मौजूदा निर्वाचन क्षेत्र 2001 की जनगणना के आधार पर हैं और अगला बड़ा परिसीमन 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़े प्रकाशित होने के बाद संभव होगा। यानी Census 2027 इस बहस का बेहद महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित लोकसभा और विधानसभा सीटों में संबंधित आबादी महत्वपूर्ण है।

लेकिन अभी लोकसभा और विधानसभाओं में ओबीसी के लिए अलग संवैधानिक सीट आरक्षण नहीं है। इसलिए ओबीसी जातियों की आबादी सामने आने से निर्वाचन क्षेत्र अपने-आप ओबीसी आरक्षित नहीं हो जाएंगे।

हां, राजनीतिक दलों की टिकट रणनीति जरूर बदल सकती है। किसी सीट पर यादव, कुर्मी, जाट, गुर्जर, निषाद या किसी दूसरी जाति की वास्तविक आबादी अनुमान से अलग निकलती है तो प्रत्याशी चयन और चुनावी गठबंधन का गणित बदल सकता है।

स्थानीय निकायों में असर ज्यादा सीधा हो सकता है

पंचायतों और नगर निकायों में ओबीसी राजनीतिक आरक्षण के लिए सुप्रीम कोर्ट ने आंकड़ा-आधारित तीन कसौटियों वाली प्रक्रिया जरूरी मानी है। इसमें पिछड़ेपन और प्रतिनिधित्व की स्थिति की अनुभवजन्य जांच महत्वपूर्ण है। ऐसे में भरोसेमंद जाति आंकड़े राज्यों के लिए स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए ज्यादा मजबूत आधार बन सकते हैं।

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