
दुनिया की खेती अगले 25 वर्षों में केवल ज्यादा उत्पादन की चुनौती नहीं झेलेगी, बल्कि कहां कौन-सी फसल उगाई जाए, यह सवाल भी बदल सकता है। बढ़ता तापमान, अनियमित बारिश, सूखा, बाढ़, समुद्री पानी से बढ़ती लवणता और घटता भूजल कई मौजूदा कृषि क्षेत्रों को प्रभावित कर रहे हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि 2050 तक गेहूं, चावल या मक्का खेतों से गायब हो जाएंगे। लेकिन उनका भौगोलिक नक्शा, किस्में और खेती का तरीका बदल सकता है। इसके समानांतर बाजरा, ज्वार, दालें और दूसरी कम पानी वाली फसलें खाद्य सुरक्षा में बड़ी भूमिका हासिल कर सकती हैं।
FAO के अनुसार 2050 तक दुनिया की आबादी लगभग 10 अरब के करीब पहुंच सकती है। इतने लोगों के लिए पर्याप्त और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के लिए कृषि-खाद्य प्रणाली में बड़े बदलाव की जरूरत होगी।
2025 में नेचर में प्रकाशित एक बड़े वैश्विक अध्ययन ने मक्का, चावल, गेहूं, सोयाबीन, कसावा और ज्वार जैसी प्रमुख फसलों का विश्लेषण किया। शोधकर्ताओं के अनुसार किसानों के अनुकूलन को शामिल करने के बाद भी तापमान बढ़ने से अधिकांश प्रमुख खाद्य फसलों पर नकारात्मक दबाव रहेगा।
अध्ययन का अनुमान है कि वैश्विक तापमान में प्रत्येक अतिरिक्त 1 डिग्री सेल्सियस वृद्धि दुनिया की खाद्य उत्पादन क्षमता को औसतन लगभग 120 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन, यानी वर्तमान दैनिक खपत के करीब 4.4 प्रतिशत के बराबर प्रभावित कर सकती है। उच्च उत्सर्जन वाले परिदृश्य में सदी के अंत तक मुख्य फसलों से मिलने वाली कैलोरी का उत्पादन बिना जलवायु परिवर्तन वाली स्थिति के मुकाबले करीब 24 प्रतिशत कम हो सकता है।
2026 में साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित अध्ययन में मक्का, चावल, गेहूं और सोयाबीन के लिए भविष्य की जलवायु उपयुक्तता का आकलन किया गया। इसमें प्रमुख उष्णकटिबंधीय उत्पादन क्षेत्रों में उपयुक्तता और उपज घटने, जबकि कई समशीतोष्ण तथा उच्च अक्षांश वाले क्षेत्रों में परिस्थितियां अपेक्षाकृत बेहतर होने की संभावना सामने आई।
2025 के एक अन्य अध्ययन में 30 प्रमुख खाद्य फसलों को शामिल किया गया। इसके अनुसार 2 डिग्री सेल्सियस वैश्विक तापवृद्धि की स्थिति में निम्न अक्षांश वाले क्षेत्रों के मौजूदा फसल उत्पादन का 10 से 31 प्रतिशत हिस्सा अपनी वर्तमान जलवायु अनुकूल सीमा से बाहर जा सकता है। मध्य और उच्च अक्षांशों पर फसलों की संभावित विविधता बढ़ने की संभावना भी सामने आई।
मक्का गर्म क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में उगाया जाता है, इसलिए लगातार बढ़ता तापमान और सूखा इसके लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं। दक्षिण एशिया के लिए CIMMYT के आकलनों में जलवायु परिवर्तन से 2050 तक मक्का उत्पादन क्षमता में करीब 17 प्रतिशत तक कमी का जोखिम बताया गया है। इसी वजह से संस्थान गर्मी और सूखे को सहने वाले हाइब्रिड विकसित कर रहा है।
इसका अर्थ मक्का की खेती खत्म होना नहीं है। भविष्य में किसानों को ज्यादा गर्मी सहने वाली किस्में, फसल की तारीख में बदलाव और बेहतर जल प्रबंधन अपनाना पड़ सकता है।
गेहूं की सबसे बड़ी समस्या ‘टर्मिनल हीट’ यानी फसल के अंतिम चरण में अचानक ज्यादा गर्मी बन सकती है। दक्षिण एशिया और अफ्रीका के कई हिस्सों में इस खतरे पर शोध जारी है और नई गर्मी-सहनशील किस्में विकसित की जा रही हैं।
दूसरी ओर गर्म होती जलवायु कनाडा, रूस और उत्तरी यूरोप जैसे उच्च अक्षांश वाले क्षेत्रों में कुछ फसलों के लिए मौसम की अवधि बढ़ा सकती है। FAO भी कहता है कि कई फसलों के लिए उपयुक्त क्षेत्र धीरे-धीरे अधिक अक्षांश और अधिक ऊंचाई की तरफ स्थानांतरित हो सकते हैं।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वहां नई कृषि भूमि आसानी से मिल जाएगी। मिट्टी, पानी, पर्यावरण संरक्षण और पर्माफ्रॉस्ट जैसी सीमाएं वास्तविक खेती के विस्तार को रोक सकती हैं।
एशिया के करोड़ों लोगों का मुख्य भोजन चावल है। लेकिन इसकी खेती को एक साथ सूखा, बाढ़, तापमान और समुद्री तटीय क्षेत्रों में बढ़ती लवणता प्रभावित कर सकती है।
इसीलिए भविष्य के चावल का मतलब केवल नई जगह पर खेती नहीं, बल्कि नई किस्म भी होगा। अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान ने सूखा-सहनशील, बाढ़ में जीवित रहने वाली और लवणता सहने वाली किस्मों पर काम किया है। SUB1 जीन वाली किस्में 10–15 दिन के जलभराव के बाद भी सामान्य किस्मों के मुकाबले बेहतर उत्पादन दे सकती हैं।
भविष्य की खेती में सबसे दिलचस्प बदलाव मिलेट्स यानी बाजरा वर्ग की फसलों में दिखाई दे सकता है। FAO के मुताबिक कई मिलेट फसलें ऊंचे तापमान, कम पानी और अपेक्षाकृत कमजोर मिट्टी में भी उत्पादन दे सकती हैं तथा चरम मौसम में दूसरी फसलों की तुलना में बेहतर टिक सकती हैं।
भारत में भी अनुसंधान इसी दिशा में बढ़ रहा है। 2026 में ICRISAT और ICAR ने सूखे क्षेत्रों के लिए दुनिया का पहला तीन-तरफा पर्ल मिलेट हाइब्रिड RHB 273 जारी किया, जिसे राजस्थान, गुजरात और हरियाणा के कम वर्षा वाले इलाकों के लिए विकसित किया गया है।
चना, अरहर, मसूर, लोबिया जैसी दालों का महत्व सिर्फ प्रोटीन के कारण नहीं बढ़ रहा। कई दाल प्रजातियां कम पानी और सूखे की परिस्थितियों में उग सकती हैं। साथ ही वे जैविक रूप से नाइट्रोजन स्थिरीकरण कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती हैं और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में मदद करती हैं।
दक्षिणी अफ्रीका में 2026 में जलवायु-अनुकूल चना उत्पादन बढ़ाने की परियोजनाएं भी इसी बदलाव का संकेत हैं।
| फसल | ज्यादा जोखिम वाले क्षेत्र | भविष्य की संभावित दिशा | बड़ा कारण |
|---|---|---|---|
| मक्का | दक्षिण एशिया, उप-सहारा अफ्रीका और गर्म उष्णकटिबंधीय क्षेत्र | गर्मी-सहनशील किस्में, कुछ उत्पादन उच्च अक्षांश की ओर | गर्मी + सूखा |
| गेहूं | दक्षिण एशिया, अफ्रीका के गर्म क्षेत्र | उत्तरी अक्षांशों में कुछ विस्तार, हीट-टॉलरेंट किस्में | टर्मिनल हीट |
| चावल | दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के संवेदनशील इलाके | बाढ़, सूखा और लवणता-सहनशील किस्में | पानी + गर्मी + लवणता |
| बाजरा-ज्वार | अवसर मुख्यतः शुष्क क्षेत्र | एशिया-अफ्रीका के ड्राइलैंड में हिस्सेदारी बढ़ सकती है | कम पानी, गर्मी सहनशीलता |
| दालें | वर्तमान उत्पादन भी जलवायु जोखिम में | शुष्क और वर्षा आधारित क्षेत्रों में अधिक महत्व | कम इनपुट + मिट्टी में नाइट्रोजन |
| फल-सब्जियां | ज्यादा गर्म और जल-संकट वाले पुराने बेल्ट | कुछ फसलें अधिक ऊंचाई/अक्षांश की ओर | तापमान और पानी की उपलब्धता |
Updated on:
14 Sept 2026 01:49 pm
Published on:
14 Sept 2026 01:49 pm
