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आलू की खेती से पहले जान लें ये जरूरी बातें, बुवाई से लेकर मंडी भाव तक पूरी जानकारी

क्या आप जानते हैं कि आलू की खेती में सफलता और जोखिम दोनों छिपे हैं? आइए, हम आपको बताएंगे कि कैसे आलू की फसल से अधिकतम लाभ उठाएं और उन चुनौतियों का सामना करें जो आपके फसल उत्पादन को प्रभावित कर सकती हैं!
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Avaneesh Kumar Mishra

Sep 14, 2026

आलू देश की प्रमुख सब्जी और नकदी फसलों में शामिल है। उत्तर भारत में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। किसान आमतौर पर रबी मौसम में इसकी बुवाई करते हैं। फसल से अच्छी उपज लेने के लिए सही समय पर बुवाई, स्वस्थ बीज, संतुलित खाद-उर्वरक और सिंचाई का सही प्रबंधन जरूरी है। वहीं फसल तैयार होने के बाद बाजार भाव में उतार-चढ़ाव किसान की कमाई को सीधे प्रभावित करता है।

आलू की खेती कैसे करें?

खेत और मिट्टी की तैयारी

आलू की खेती के लिए भुरभुरी, उपजाऊ और अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी बेहतर रहती है। खेत में पानी जमा होने से कंद सड़ने और रोग लगने का खतरा बढ़ जाता है। बुवाई से पहले खेत की अच्छी जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बनाएं। मिट्टी की जांच कराने के बाद ही खाद और उर्वरक की मात्रा तय करना बेहतर है।

स्वस्थ बीज का करें इस्तेमाल

आलू की खेती में बीज की गुणवत्ता सबसे महत्वपूर्ण होती है। किसान को प्रमाणित और रोगमुक्त बीज ही खरीदना चाहिए। संक्रमित बीज से खेत में रोग फैलने का खतरा बढ़ सकता है और उपज प्रभावित हो सकती है। किस्म का चुनाव स्थानीय जलवायु, बाजार की मांग और फसल की अवधि को ध्यान में रखकर करें।

कितनी दूरी पर लगाएं आलू?

आलू को सामान्यतः मेड़ों या क्यारियों में लगाया जाता है। कई क्षेत्रों में कतार से कतार करीब 45–60 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी लगभग 15–20 सेंटीमीटर रखी जाती है। हालांकि, यह दूरी किस्म और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार बदल सकती है।

सिंचाई में रखें विशेष सावधानी

आलू की फसल में नमी की कमी और अधिक पानी दोनों नुकसानदायक हैं। बुवाई के बाद मिट्टी की नमी और मौसम को देखकर सिंचाई करें। कंद बनने और उनके विकास के समय पर्याप्त नमी जरूरी होती है।

खेत में पानी जमा होने से कंद सड़ सकते हैं। इसलिए अच्छी जल निकासी की व्यवस्था पहले से रखें।

मिट्टी चढ़ाना क्यों जरूरी?

आलू की फसल में पौधों की बढ़वार के दौरान मेड़ों पर मिट्टी चढ़ाई जाती है। इससे कंद मिट्टी के अंदर सुरक्षित रहते हैं और धूप के संपर्क में आने से बचते हैं।

मिट्टी चढ़ाने से मेड़ भी मजबूत होती है और कंदों के विकास के लिए पर्याप्त जगह मिलती है।

आलू की खेती में ये हैं बड़े जोखिम

आलू की खेती में सिर्फ उत्पादन ही नहीं, बल्कि मौसम और बाजार दोनों का जोखिम रहता है।

मुख्य जोखिम इस प्रकार हैं-

  • असामान्य तापमान से कंदों की बढ़वार प्रभावित हो सकती है।
  • पाला पड़ने पर पौधों को नुकसान हो सकता है।
  • पछेती झुलसा जैसे रोग फसल को प्रभावित कर सकते हैं।
  • संक्रमित बीज से रोग खेत में फैल सकता है।
  • अधिक सिंचाई या जलभराव से कंद सड़ने का खतरा रहता है।
  • फसल के समय मंडी में आवक बढ़ने पर भाव गिर सकते हैं।
  • कोल्ड स्टोरेज में रखने पर भंडारण और परिवहन का अतिरिक्त खर्च जुड़ता है।

इसलिए बुवाई से पहले किसान को संभावित उत्पादन के साथ अपनी कुल लागत और बाजार भाव का भी अनुमान लगाना चाहिए।

आलू के रेट कितने हैं?

आलू का भाव हर मंडी में अलग होता है। इसमें किस्म, गुणवत्ता, आवक और स्थानीय मांग का बड़ा असर रहता है। 10 सितंबर 2026 के उपलब्ध मंडी आंकड़ों में आगरा में मॉडल भाव करीब ₹515 प्रति क्विंटल, फर्रुखाबाद में ₹505, अलीगढ़ में ₹465, इंदौर में ₹710 और डीसा में करीब ₹800 प्रति क्विंटल दर्ज किया गया।

उत्तर प्रदेश की मंडियों में भी कीमतों में अंतर रहा। 9 सितंबर 2026 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मथुरा की कोसीकलां मंडी में औसत भाव करीब ₹760, संभल की बहजोई मंडी में ₹605 और मुजफ्फरनगर की खतौली मंडी में करीब ₹1,003 प्रति क्विंटल दर्ज किया गया।

ध्यान रखें कि मंडी भाव रोज बदल सकते हैं। इसलिए किसान को बिक्री से पहले अपनी नजदीकी मंडी का ताजा भाव और आवक जरूर देखनी चाहिए।

आलू की खेती: जरूरी बातें एक नजर में

बिंदुजानकारी
फसलरबी
बुवाईसामान्यतः अक्टूबर–नवंबर
मिट्टीभुरभुरी दोमट और अच्छी जल निकासी वाली
कतार दूरीकरीब 45–60 सेमी
पौधे की दूरीकरीब 15–20 सेमी
बीजप्रमाणित और रोगमुक्त
सिंचाईमिट्टी और मौसम के अनुसार
जरूरी काममेड़ों पर मिट्टी चढ़ाना
प्रमुख जोखिमरोग, मौसम, जलभराव और भाव में गिरावट
बिक्रीस्थानीय मंडी/व्यापारी/भंडारण के विकल्प देखकर

किसान बिक्री से पहले क्या देखें?

आलू की खेती में कमाई सिर्फ अच्छी उपज पर निर्भर नहीं करती। उत्पादन लागत, मंडी भाव, भंडारण खर्च और बाजार की मांग को ध्यान में रखकर बिक्री का फैसला करना चाहिए।

अगर किसान कोल्ड स्टोरेज में फसल रखने की योजना बना रहा है तो भंडारण शुल्क, परिवहन खर्च और भविष्य में संभावित भाव को भी गणना में शामिल करें। मंडी में बिक्री से पहले Agmarknet, eNAM या संबंधित राज्य के मंडी पोर्टल पर उपलब्ध ताजा भाव देखना उपयोगी रहेगा।

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