
Definition of marginal and small farmers India
क्या आप जानते हैं कि सरकार की कई योजनाओं में किसान की पहचान केवल उसके नाम या खेती करने से नहीं, बल्कि उसकी जमीन के आकार से तय होती है? यही कारण है कि किसी किसान को सीमांत किसान, किसी को लघु किसान और किसी को बड़ा किसान कहा जाता है।
यह वर्गीकरण सिर्फ आंकड़ों के लिए नहीं होता, बल्कि इसी के आधार पर कई सरकारी योजनाओं, सब्सिडी, पेंशन, कृषि ऋण, बीमा और अन्य सुविधाओं की पात्रता तय की जाती है। यही वजह है कि हर किसान को यह पता होना चाहिए कि वह किस श्रेणी में आता है।
भारत में किसानों का वर्गीकरण आमतौर पर उनके पास मौजूद या परिचालन (Operational Holding) भूमि के आकार के आधार पर किया जाता है। कृषि जनगणना के अनुसार किसानों को मुख्य रूप से पांच श्रेणियों में बांटा जाता है-
| 🌾 किसान श्रेणी | 📏 भूमि का आकार |
|---|---|
| सीमांत किसान | 1 हेक्टेयर से कम |
| लघु किसान | 1 से 2 हेक्टेयर |
| अर्द्ध-मध्यम किसान | 2 से 4 हेक्टेयर |
| मध्यम किसान | 4 से 10 हेक्टेयर |
| बड़ा किसान | 10 हेक्टेयर से अधिक |
ध्यान देने वाली बात यह है कि 1 हेक्टेयर लगभग 2.47 एकड़ के बराबर होता है। इसका मतलब है कि यदि किसी किसान के पास 2.47 एकड़ से कम भूमि है, तो वह सीमांत किसान की श्रेणी में आएगा।
भारत की कृषि व्यवस्था मुख्य रूप से छोटे किसानों पर आधारित है। देश में अधिकांश किसान सीमांत और लघु श्रेणी में आते हैं। इनके पास खेती योग्य जमीन कम होती है, जिसके कारण उत्पादन क्षमता, आय और निवेश की संभावनाएं भी सीमित रहती हैं। इसी वजह से सरकार की कई योजनाएं विशेष रूप से इन्हीं किसानों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं।
कुछ कानूनों और योजनाओं में केवल भूमि का क्षेत्रफल ही नहीं, बल्कि भूमि की सिंचाई स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है। उदाहरण के लिए, भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास से जुड़े कुछ प्रावधानों में सिंचित और असिंचित भूमि के लिए अलग-अलग मानक अपनाए जाते हैं। क्योंकि एक हेक्टेयर सिंचित भूमि की उत्पादन क्षमता कई बार एक हेक्टेयर असिंचित भूमि से कहीं अधिक होती है। इसलिए कुछ योजनाओं और कानूनी मामलों में जमीन का आकार और उसकी सिंचाई स्थिति दोनों को ध्यान में रखा जाता है।
सभी किसानों की आर्थिक स्थिति समान नहीं होती। जिस किसान के पास आधा हेक्टेयर जमीन है और जिस किसान के पास 15 हेक्टेयर जमीन है, दोनों की जरूरतें और चुनौतियां अलग-अलग होती हैं। सरकार इसी आधार पर योजनाएं तैयार करती है ताकि सहायता उन किसानों तक पहुंच सके जिन्हें उसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। इनमें कई बार सीमांत और लघु किसानों को प्राथमिकता दी जाती है।
कम भूमि होने का सीधा असर किसान की आय पर पड़ता है। सीमांत और लघु किसान अक्सर निम्न समस्याओं का सामना करते हैं -
यही कारण है कि कृषि विशेषज्ञ छोटे किसानों को कृषि नीतियों का केंद्र मानते हैं।
भारत में किसानों का बड़ा हिस्सा छोटी जोतों पर खेती करता है। कृषि जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि सीमांत और लघु किसान कुल किसानों का लगभग 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हैं। हालांकि संख्या में इनकी हिस्सेदारी बहुत बड़ी है, लेकिन कुल कृषि भूमि का हिस्सा इनके पास अपेक्षाकृत कम है। इसका मतलब है कि देश की खेती का बड़ा भार छोटे किसानों के कंधों पर है।
कई किसान अपनी जमीन की श्रेणी के बारे में जानकारी नहीं रखते। नतीजा यह होता है कि वे उन योजनाओं के लिए आवेदन ही नहीं कर पाते जिनके लिए वे पात्र हैं। मान लीजिए किसी किसान के पास 1.5 हेक्टेयर भूमि है। वह लघु किसान की श्रेणी में आता है। यदि उसे यह जानकारी नहीं है, तो वह उन योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाएगा जो विशेष रूप से लघु किसानों के लिए बनाई गई हैं। इसलिए अपनी भूमि का सही क्षेत्रफल और श्रेणी जानना बेहद जरूरी है।
किसान अपने भूमि रिकॉर्ड की मदद से आसानी से यह पता लगा सकते हैं। इसके लिए -
यदि भूमि अलग-अलग खसरा नंबरों में दर्ज है, तो कुल क्षेत्रफल जोड़कर श्रेणी तय करनी चाहिए।
Updated on:
07 Aug 2026 04:40 pm
Published on:
07 Aug 2026 04:40 pm
