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सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने के लिए मनी बिल पारित, विपक्ष क्यों इसे बता रहा संविधान के साथ धोखाधड़ी, जानिए

राज्यसभा ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 पारित कर दिया। इस विधेयक का उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या मुख्य न्यायाधीश (CJI) सहित 34 से बढ़ाकर 38 करना है। जानिए विपक्ष इसे संविधान के साथ धोखाधड़ी क्यों बता रहा है।
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सुप्रीम कोर्ट में अब जजों की संख्या 34 से बढ़कर 38 हो जाएगी। (Photo: ChatGpt)

सोमवार को लोकसभा से पारित हो चुका था। इसे मनी बिल (धन विधेयक) के रूप में पेश और पारित किया गया, ठीक उसी तरह जैसे 2019 में सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाकर 34 करने वाला विधेयक भी मनी बिल के रूप में लाया गया था। हालांकि, 2018 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में एक असहमति (डिसेंट) वाले मत ने कानूनों को इस तरह मनी बिल के रास्ते पारित कराने की प्रक्रिया को "संविधान के साथ धोखाधड़ी" (Fraud on the Constitution) करार दिया था।

विधेयक के उद्देश्यों और कारणों के विवरण (Statement of Objects and Reasons) में कहा गया है कि चार अतिरिक्त न्यायाधीशों के पद सृजित करने से वेतन, भत्तों, स्टाफ, आधिकारिक आवास और सुरक्षा जैसी व्यवस्थाओं पर अतिरिक्त खर्च आएगा।

चार जज के पद सृजित करने में 14 करोड़ से ज्यादा का खर्च

चार अतिरिक्त न्यायाधीशों के पद सृजित किए जाने से उनके वेतन और भत्तों के साथ आवश्यक स्टाफ की नियुक्ति पर व्यय बढ़ेगा। इन न्यायाधीशों को किराया-मुक्त सरकारी आवास उपलब्ध कराया जाएगा और प्रत्येक न्यायाधीश के आवास तथा कार्यालय के लिए व्यक्तिगत स्टाफ की व्यवस्था करनी होगी। इसके अलावा, न्यायाधीशों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी खर्च होगा। चार न्यायाधीशों तथा उनके स्टाफ के वेतन, परिवहन और अन्य मदों पर वार्षिक (आवर्ती) खर्च लगभग 10 करोड़ 56 लाख रुपये होने का अनुमान है, जबकि कार, सरकारी आवास की साज-सज्जा और अन्य मदों पर एकमुश्त (गैर-आवर्ती) खर्च लगभग 3 करोड़ 47 लाख रुपये होगा। इस तरह कुल अनुमानित खर्च लगभग 14 करोड़ 4 लाख रुपये होगा।

क्यों विपक्ष संविधान से धोखाधड़ी का लगा रहा आरोप?

सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने के लिए हाल ही में पारित मनी बिल पर विपक्ष का आरोप है कि यह संविधान के साथ धोखाधड़ी है। आइए इस कदम का अर्थ, विवाद की जड़ और इसके संभावित प्रभाव समझते हैं।

इस विधेयक के प्रस्ताव को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मई 2026 में मंजूरी दी थी, और राष्ट्रपति ने इसे अध्यादेश के रूप में 16 मई 2026 को लागू किया। बाद में यह विधेयक 20 जुलाई 2026 को लोकसभा में प्रस्तुत किया गया।

क्या है विपक्ष का तर्क?

विपक्ष का तर्क है कि इसे मनी बिल घोषित कर राज्यसभा की भूमिका को कमजोर किया जा रहा है। संविधान के अनुच्छेद 110 के अनुसार, मनी बिल केवल वित्तीय मामलों से संबंधित होता है, जैसे कर, बजट या सरकारी व्यय। राज्यसभा को ऐसे बिल में संशोधन करने या उसे रोकने का अधिकार नहीं होता, केवल सुझाव देने का अधिकार होता है। सरकार का कहना है कि नए जजों की नियुक्ति से वेतन, स्टाफ, सुरक्षा और अन्य सुविधाओं पर खर्च बढ़ेगा, इसलिए इसका वित्तीय प्रभाव है और इसे मनी बिल माना जा सकता है। लेकिन विपक्ष इसे केवल बहाना मानता है और आरोप लगाता है कि सरकार हर कानून को मनी बिल घोषित कर राज्यसभा की भूमिका खत्म करना चाहती है।

लोकसभा में विपक्ष ने अध्यादेश को रद्द करने के लिए एक सांविधिक (Statutory) प्रस्ताव भी पेश किया, जिस पर चर्चा हुई, लेकिन उसे ध्वनिमत से खारिज कर दिया गया।

इस विवाद का मुख्य कारण है?

क्या जजों की संख्या बढ़ाना वास्तव में वित्तीय मामला है, या केवल एक संवैधानिक परिवर्तन? सरकार का तर्क है कि इसमें खर्च जुड़ा है, लेकिन विपक्ष का कहना है कि केवल खर्च होने से कोई विधेयक मनी बिल नहीं बन जाता। यह सवाल संविधान की भावना और संसदीय प्रक्रिया की स्वतंत्रता से जुड़ा है।

इस कदम का प्रभाव क्या हो सकता है?

पहला, सुप्रीम कोर्ट में चार अतिरिक्त जजों की नियुक्ति से लंबित मामलों की सुनवाई तेज हो सकती है, क्योंकि देश में लंबित न्यायिक मामलों की संख्या बहुत अधिक है। दूसरा, चूंकि यह मनी बिल के रूप में पारित हुआ है, इससे राज्यसभा की भूमिका सीमित हो गई है, जिससे संसदीय संतुलन पर सवाल उठ सकते हैं। तीसरा, यह विवाद संवैधानिक प्रक्रिया और संसदीय लोकतंत्र में भरोसे को प्रभावित कर सकता है।

सरकार का यह कदम न्यायिक कार्यक्षमता बढ़ाने की दिशा में एक प्रयास है, लेकिन इसे मनी बिल घोषित कर पारित करने का तरीका संवैधानिक और संसदीय सवाल खड़े करता है। आम पाठक के लिए यह जानना जरूरी है कि यह केवल संख्या बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों - संसदीय संतुलन, उच्च सदन की भूमिका और संविधान की भावना — से जुड़ा विवाद है। आगे की प्रक्रिया और अदालतों में इसकी समीक्षा पर नजर रखनी होगी, क्योंकि यह निर्णय न्यायपालिका और विधायिका के बीच संतुलन को प्रभावित कर सकता है।