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क्लासिक बनाम मॉडर्न : एक ही नाम की दो फिल्में, आपने कौन-कौन सी देखी हैं

क्या आपने कभी सोचा है कि एक ही कहानी को दो बार देखना कितना जादुई हो सकता है? क्लासिक और आधुनिक फिल्मों के इस अद्भुत सफर में चलिए ऐसी कुछ फिल्मों के बारे में जानते हैं।
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भारत

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Ravi Gupta

Aug 29, 2026

Movies with same name Bollywood

देवदास के दो अलग-अलग हीरो | ChatGPT

ऐसी कई फिल्में हैं जो दो अलग-अलग दौर में, एक ही नाम से रिलीज की गई हैं। नाम एक लेकिन, कहानी अलग या थोड़ी मिलती जुलती। इनमें से कुछ ने दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ दिया, तो कुछ ने तकनीकी और स्टाइलिश बदलावों से नया जीवन पाया। यहां हम ऐसी अनकही फिल्मी कहानियों पर नजर डालते हैं, जिन्हें आप अपनी वॉचलिस्ट में शामिल कर सकते हैं - खासकर अगर आप क्लासिक और आधुनिक दोनों तरह की फिल्मों का आनंद लेना चाहते हैं।

1955 बनाम 2002: देवदास की दो पीढ़ियां

सरत चंद्र चट्टोपाध्याय के 1917 के उपन्यास ‘देवदास’ पर आधारित बिमल रॉय की 1955 की फिल्म में दिलीप कुमार, सुचित्रा सेन और वैजयंतीमाला ने अभिनय किया था। यह फिल्म अपनी सादगी, भावनात्मक गहराई और शानदार अभिनय के लिए आज भी याद की जाती है।

वहीं, 2002 में संजय लीला भंसाली ने इसे एक नए रूप में पेश किया - शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय और माधुरी दीक्षित की मौजूदगी, भव्य सेट, भव्य संगीत और तकनीकी दृष्टि से समृद्ध प्रस्तुति ने इसे एक अलग पहचान दी। दोनों फिल्मों की कहानी - बचपन का प्यार, सामाजिक बाधाएं, शराब की लत और अंत में त्रासदी - मूल रूप से समान है, लेकिन प्रस्तुति का अंदाज पूरी तरह बदल गया है।

1990 बनाम 2012: अग्निपथ की दो आग

1990 में अमिताभ बच्चन की ‘अग्निपथ’ ने एक पिता की हत्या का बदला लेने वाले बेटे की कहानी को दर्शाया था। यह फिल्म संवाद और गनफाइट दृश्यों के लिए प्रसिद्ध हुई।

2012 में ऋतिक रोशन और संजय दत्त की मुख्य भूमिकाओं वाली अग्निपथ ने इसी कहानी को फिर से जीवंत किया, लेकिन इसे और भी गहरा, अंधेरा और भावनात्मक रूप से तीव्र बनाया गया। दोनों फिल्मों में ही मुख्य किरदार का मकसद और भावनात्मक यात्रा समान है, लेकिन प्रस्तुति और टोन में अंतर स्पष्ट है।

क्यों यह कहानी दोबारा बनी?

इन दोनों उदाहरणों में एक ही कहानी को दो अलग-अलग युगों में दो अलग-अलग दृष्टिकोणों से पेश किया गया। ‘देवदास’ का क्लासिक संस्करण भावनात्मक यथार्थवाद पर आधारित था, जबकि 2002 का संस्करण भव्यता और सिनेमाई शैली पर टिका था। ‘अग्निपथ’ का मूल संस्करण एक पारंपरिक बदला कहानी था, जबकि रीमेक ने उसे आधुनिक सामाजिक संदर्भ और चरित्र की गहराई के साथ पेश किया।

  • पहले ‘देवदास’ (1955) देखें — यह आपको उस युग की सादगी, अभिनय और भावनात्मक गहराई का अनुभव कराएगा।
  • फिर ‘देवदास’ (2002) देखें — यह आपको भव्यता, संगीत और आधुनिक तकनीकी प्रस्तुति का आनंद देगा।
  • इसी तरह, ‘अग्निपथ’ (1990) आपको पारंपरिक बॉलीवुड एक्शन और संवाद का स्वाद देगा।
  • और अंत में, ‘अग्निपथ’ (2012) आपको आधुनिक फिल्म निर्माण की तीव्रता और भावनात्मक गहराई से रूबरू कराएगा।

इन फिल्मों को एक साथ देखने से आप यह समझ पाएंगे कि कैसे एक ही कहानी को समय, तकनीक और दर्शकों की बदलती अपेक्षाओं के अनुसार नया रूप दिया जा सकता है। यह सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की विकास यात्रा का एक छोटा सा दर्शन भी है।

इस वॉचलिस्ट के साथ आप सिर्फ फिल्में नहीं देखेंगे, बल्कि भारतीय सिनेमा के दो युगों की कहानी, शैली और भावना का अनुभव करेंगे।