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डिजास्टर डीएनए बैंकिंग! नेपाल बाढ़ ने खड़ा किया ‘हिमालय की सुरक्षा’ पर बड़ा सवाल, क्या भारत करेगा ये पहल?

Nepal flood disaster DNA banking: नेपाल में ग्लेशियर पिघलने से अचानक आई बाढ़ ने भारत की भी चिंता बढ़ा दी है। वहां हजारों लोग लापता हैं, अपनों को खोजती आंखें जवाब ढूंढ रही हैं? पहचान का यही संकट अब एक अहम सवाल खड़ा कर रहा है, क्या डिजास्टर डीएनए बैंकिंग वक्त की जरूरत है?
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 31, 2026

Nepal Flood Disaster DNA banking

Nepal Flood Disaster DNA banking: AI Creative

Nepal Flood Disaster DNA Banking: नेपाल में हाल ही में आई हिमालयी बाढ़ ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल है कि, क्या भविष्य में हिमालयी क्षेत्रों के लिए डिजास्टर डीएनए बैंकिंग, यानी आपदा-आधारित डीएनए पहचान प्रणाली बनाई जानी चाहिए? यह सवाल केवल तकनीकी नहीं, बल्कि भावनात्मक, सामाजिक और प्रशासनिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जानिए कैसे? क्या भारत भी इस दिशा में काम करेगा?

बाढ़ के बाद डीएनए संग्रह की नई प्रैक्टिस

नेपाल में 26 अगस्त 2026 को ग्लेशियर के टूटने से अचानक आई बाढ़ ने रासुवा, नुवाकोट, चितवन और धादिंग जैसे जिलों में भारी तबाही मचाई। इस आपदा में अब तक नेपाल में 734 लोग मारे गए हैं और लगभग 2,498 लोग लापता हैं, जबकि तिब्बत में 16 मौतें और 546 लोग लापता बताए गए हैं।

पहचान की चुनौतियां इतनी बड़ी थीं कि सरकार ने अज्ञात शवों को दफनाने से पहले डीएनए और अन्य पहचान संबंधी साक्ष्य सुरक्षित रखने का निर्णय लिया। चितवन में 669 शवों में से केवल 20-29 की ही पहचान हो सकी है। शेष के लिए डीएनए, फिंगरप्रिंट, तस्वीरें, कपड़े, गहने आदि को ट्रैकिंग नंबर के साथ संग्रहित किया जा रहा है।

बता दें कि इस प्रक्रिया में भारत ने भी सहायता की है। गुजरात की नेशनल फॉरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी (NFSU) की 10 सदस्यीय टीम नेपाल भेजी गई है, जो डीएनए आधारित आपदा पीड़ित पहचान (DVI) में सहयोग कर रही है।

क्या यह एक अस्थायी उपाय है या भविष्य की तैयारी?

यह कदम स्पष्ट रूप से एक आपातकालीन प्रतिक्रिया है, लेकिन इससे यह सवाल उठता है कि क्या हिमालयी क्षेत्रों में स्थायी डीएनए बैंकिंग प्रणाली बनानी चाहिए।

ग्लेशियर टूटने जैसी घटनाएं अब दुर्लभ नहीं रह गई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लेशियर का टूटना और अचानक बाढ़ आना बढ़ते तापमान और हिमालयी अस्थिरता का संकेत है।

डीएनए बैंकिंग क्या है और यह कैसे काम कर सकती है?

डीएनए बैंकिंग का अर्थ है कि संभावित आपदा वाले क्षेत्रों में पहले से ही लोगों के डीएनए नमूने सुरक्षित रखे जाएं। जब आपदा आती है, तो शवों से लिए गए डीएनए को इन नमूनों से मिलाकर पहचान की जा सकती है।

यह प्रक्रिया डिजास्टर विक्टिम आइडेंटिफिकेशन (DVI) के तहत आती है, जिसमें फिंगरप्रिंट, डेंटल रिकॉर्ड और डीएनए प्रोफाइलिंग शामिल होती है। कुछ देशों में, जैसे कनाडा में, राष्ट्रीय डीएनए डेटाबैंक और मिसिंग पर्सन्स डेटाबेस पहले से मौजूद हैं।

हिमालयी क्षेत्रों में डीएनए बैंकिंग की चुनौतियां और लाभ

ये हैं चुनौतियां

  • पहले से डीएनए संग्रह करना महंगा और जटिल है।
  • गोपनीयता और डेटा सुरक्षा के प्रश्न उठते हैं।
  • ग्रामीण और दूरदराज इलाकों में संग्रह और रखरखाव की सुविधा सीमित है।

ये फायदे भी

  • आपदा के बाद पहचान तेज और सटीक हो सकती है।
  • परिवारों को मानसिक शांति मिल सकती है।
  • प्रशासनिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ती है।

क्या यह व्यावहारिक है?

यदि सरकारें, स्थानीय प्रशासन और वैज्ञानिक संस्थान मिलकर एक योजना बनाएं, तो यह संभव हो सकता है। उदाहरण के लिए, स्कूलों, पंचायतों या स्वास्थ्य केंद्रों में स्वैब संग्रह शिविर लगाकर डीएनए नमूने लिए जा सकते हैं।

इन्हें सुरक्षित डीएनए बैंक में रखा जा सकता है। आपदा आने पर, शवों से लिए गए नमूनों को इनसे मिलाकर पहचान की जा सकती है। इसके लिए एक मजबूत कानूनी ढांचा, गोपनीयता की गारंटी और तकनीकी आधार आवश्यक है।

अब आगे क्या?

नेपाल की हालिया प्रतिक्रिया ने यह दिखाया है कि डीएनए आधारित पहचान आपदा में कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन यह केवल एक आपातकालीन उपाय नहीं रहना चाहिए। हिमालयी क्षेत्रों में स्थायी डीएनए बैंकिंग प्रणाली बनाने पर विचार करना समय की मांग है। इससे भविष्य में ऐसी त्रासदियों में पहचान की प्रक्रिया तेज, सुरक्षित और मानवीय हो सकती है।

यह कदम केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और जवाबदेह समाज की पहचान भी हो सकता है। जहां आपदा में खोए लोगों को सम्मान और पहचान मिल सके और परिवारों को closure।