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नया Mining Tax कानून : राज्यों और केंद्र के बीच टकराव क्यों?

Mining Tax Law in India : जानें नए Mining Tax कानून 2026 पर केंद्र और राज्यों के बीच टकराव क्यों है। MMDR संशोधन विधेयक, राज्यों के राजस्व नुकसान और संघवाद के मुद्दों को विस्तार से समझें।
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Mining Tax Law in India

Mining Tax Law in India : क्या हैं माइनिंग के नियम, PC- Chatgpt

भारत में खनिज सिर्फ उद्योगों के लिए कच्चा माल नहीं हैं। ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की अर्थव्यवस्था में कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट और दूसरे खनिजों से मिलने वाला राजस्व बेहद महत्वपूर्ण है। अब इन्हीं खनिजों पर टैक्स और सेस लगाने के अधिकार को लेकर केंद्र और राज्यों के बीच टकराव शुरू हो गया है।

संसद ने Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 को अगस्त 2026 में पास किया। नए कानून का सबसे अहम प्रावधान राज्यों की ओर से खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त जमीन पर लगाए जाने वाले टैक्स, सेस और दूसरी लेवी को सीमित करना है। ऐसी लेवी अब केंद्र सरकार की तय शर्तों और सीमाओं के अनुरूप ही लगाई जा सकेगी।

यही बात खनिज संपन्न राज्यों को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है। सवाल है- खनिज राज्य की जमीन से निकलता है, तो उस पर टैक्स लगाने का अधिकार राज्य के पास कितना होना चाहिए और केंद्र के पास कितना?

नए कानून में क्या बदला?

नए संशोधन के तहत MMDR Act, 1957 में Section 9D जोड़ा गया है। इसके मुताबिक राज्य सरकारें खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर अपनी तरफ से कोई टैक्स, सेस या दूसरी लेवी नहीं लगा सकतीं, जब तक वह केंद्र सरकार द्वारा तय शर्तों के अनुरूप न हो। यह लेवी खनिज की मात्रा, कीमत, रॉयल्टी या किसी दूसरे आधार पर भी हो सकती है।

कानून में पुराने बकाये को लेकर भी प्रावधान है। कानून लागू होने से पहले ऐसी राज्य लेवी जो वसूल या जमा नहीं हुई है, उसे अमान्य माना जाएगा। हालांकि जो राशि पहले ही वसूल या जमा हो चुकी है, उसे वापस करने की जरूरत नहीं होगी। यानी विवाद सिर्फ भविष्य में टैक्स लगाने का नहीं है, बल्कि पुरानी लेवी की वसूली को लेकर भी है।

केंद्र सरकार ऐसा कानून क्यों लाई?

केंद्र का तर्क है कि अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग लेवी से खनन की लागत बढ़ती है और कंपनियों के लिए निवेश का अनुमान लगाना मुश्किल होता है।

मान लीजिए किसी कंपनी को एक राज्य में किसी खनिज पर अतिरिक्त सेस देना पड़ता है और दूसरे राज्य में नहीं। इससे दोनों जगह खनन की लागत अलग हो जाएगी। केंद्र का कहना है कि ऐसी व्यवस्था से निवेश प्रभावित हो सकता है और खनिजों की कीमत भी बढ़ सकती है। सरकार इसलिए एक समान और अनुमानित खनन कर व्यवस्था चाहती है।

इसका असर केवल खनन कंपनियों तक सीमित नहीं है। कोयला बिजली उत्पादन के लिए, लौह अयस्क स्टील उद्योग के लिए और दूसरे खनिज निर्माण व विनिर्माण क्षेत्र के लिए जरूरी हैं। इसलिए केंद्र का तर्क है कि खनिजों की लागत बढ़ने का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

राज्यों को आपत्ति क्यों है?

राज्यों का तर्क बिल्कुल अलग है। उनका कहना है कि खनिज उनकी जमीन से निकलता है और खनन का सबसे ज्यादा सामाजिक और पर्यावरणीय असर भी उन्हीं को झेलना पड़ता है। खनन वाले इलाकों में सड़क, पानी, स्वास्थ्य, प्रदूषण, विस्थापन और स्थानीय बुनियादी ढांचे पर दबाव बढ़ता है। ऐसे में राज्यों के पास अतिरिक्त राजस्व जुटाने का अधिकार होना जरूरी है।

यानी राज्य पूछ रहे हैं- अगर संसाधन स्थानीय है और उसका बोझ भी स्थानीय है, तो उस संसाधन से मिलने वाले अतिरिक्त राजस्व पर राज्य का अधिकार क्यों सीमित किया जाए? यहीं से मामला टैक्स से निकलकर राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और संघवाद तक पहुंच जाता है।

2024 का सुप्रीम कोर्ट फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

इस विवाद की पृष्ठभूमि में 25 जुलाई 2024 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला बेहद महत्वपूर्ण है। नौ जजों की संविधान पीठ ने 8:1 के बहुमत से कहा था कि रॉयल्टी टैक्स नहीं है और राज्यों के पास खनिज अधिकारों तथा खनिज-युक्त जमीन पर टैक्स लगाने की विधायी शक्ति है। इस फैसले के बाद खनिज संपन्न राज्यों के लिए अपनी अतिरिक्त लेवी लगाने की संवैधानिक गुंजाइश मजबूत हुई।

झारखंड ने इसी पृष्ठभूमि में Mineral Bearing Land Cess Act, 2024 बनाया। इसमें कोयला और लौह अयस्क पर 100 रुपये प्रति टन, बॉक्साइट पर 70 रुपये और चूना पत्थर तथा मैंगनीज पर 50 रुपये प्रति टन सेस की व्यवस्था की गई।

अब नया केंद्रीय कानून ऐसी राज्य लेवी को केंद्र की तय शर्तों के अधीन करता है। इसलिए राज्यों का बड़ा सवाल है- सुप्रीम कोर्ट द्वारा मान्यता दिए गए अधिकार को संसद किस सीमा तक नियंत्रित कर सकती है?

खनिज राज्यों के लिए पैसा कितना महत्वपूर्ण?

यह समझने के लिए राज्यों के बजट पर नजर डालना जरूरी है।

राज्य2026-27 में अनुमानित खनन राजस्व
ओडिशाकरीब ₹56,000 करोड़
छत्तीसगढ़करीब ₹19,000 करोड़
झारखंडकरीब ₹16,000 करोड़

इन आंकड़ों से साफ है कि खनिज इन राज्यों के लिए सिर्फ प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि सरकारी आय का बड़ा स्रोत हैं।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने केंद्र को लिखे पत्र में कहा कि Mineral Bearing Land Cess से राज्य को भविष्य में करीब 7,110 करोड़ रुपये सालाना की संभावित आय हो सकती थी। उन्होंने नए कानून पर पुनर्विचार की मांग की है।

इसलिए राज्य सरकारों की चिंता यह है कि अगर भविष्य में अतिरिक्त लेवी लगाने की शक्ति सीमित हो गई तो उनके पास खनिजों से अतिरिक्त राजस्व जुटाने का रास्ता भी सीमित हो जाएगा।

ओडिशा और छत्तीसगढ़ की चिंता क्या है?

ओडिशा देश के सबसे बड़े खनिज उत्पादक राज्यों में है। राज्य के बजट में खनन से मिलने वाली आय की भूमिका बहुत बड़ी है।छत्तीसगढ़ भी कोयला और लौह अयस्क जैसे खनिजों का बड़ा उत्पादक है। राज्य की गैर-कर आय में खनन महत्वपूर्ण योगदान देता है। इसलिए इन राज्यों का सवाल केवल यह नहीं है कि आज कितना पैसा मिलेगा। उनकी चिंता यह है कि भविष्य में खनिजों से अतिरिक्त राजस्व जुटाने की नीतिगत स्वतंत्रता कितनी बचेगी। यानी नया कानून राज्यों की मौजूदा आय से ज्यादा उनके भविष्य के वित्तीय अधिकार को लेकर चिंता पैदा कर रहा है।

केंद्र बनाम राज्य: विवाद को एक नजर में समझिए

केंद्र का तर्कराज्यों की आपत्ति
पूरे देश में समान व्यवस्था जरूरीराज्यों की वित्तीय स्वायत्तता घटेगी
अलग-अलग लेवी से खनन महंगा होता हैखनिज राज्यों का महत्वपूर्ण राजस्व स्रोत है
निवेशकों को नीति में स्थिरता मिलेगीस्थानीय संसाधन पर राज्य की भूमिका कमजोर होगी
खनिज राष्ट्रीय उद्योगों के लिए जरूरीखनन का स्थानीय बोझ राज्य उठाते हैं
समान नीति से निवेश बढ़ सकता हैकेंद्र का नियंत्रण बढ़ने से संघवाद प्रभावित होगा

क्या खनन कंपनियों को फायदा होगा?

नए कानून से खनन कंपनियों को सबसे बड़ा संभावित फायदा नीति और लागत में स्थिरता का हो सकता है। अगर अलग-अलग राज्यों में अचानक अलग-अलग सेस और लेवी लागू नहीं होंगी तो कंपनियों के लिए लंबी अवधि की परियोजनाओं की लागत का अनुमान लगाना आसान होगा। केंद्र का कहना है कि इससे निवेश और खनिज उत्पादन बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

लेकिन दूसरी तरफ सवाल यह है कि अगर कंपनियों की लागत का बोझ कम होता है तो राज्यों के राजस्व पर उसका कितना असर पड़ेगा? यही वह जगह है जहां केंद्र और राज्यों के हित एक-दूसरे से टकराते हैं।

आम लोगों पर इसका क्या असर पड़ेगा?

  • इसका सीधा असर तुरंत दिखाई देना जरूरी नहीं है, लेकिन खनिजों की कीमत का संबंध आम लोगों से भी है।
  • कोयला बिजली उत्पादन में इस्तेमाल होता है। लौह अयस्क से स्टील बनता है और चूना पत्थर सीमेंट के लिए जरूरी है।
  • अगर खनिज महंगे होंगे तो आगे चलकर स्टील, सीमेंट, बिजली और निर्माण की लागत बढ़ सकती है। इसलिए केंद्र चाहता है कि खनिजों पर अनावश्यक अतिरिक्त लागत न बढ़े।
  • दूसरी तरफ अगर खनिज राज्यों की अतिरिक्त आय कम होती है तो खनन प्रभावित क्षेत्रों में विकास और बुनियादी सुविधाओं के लिए राज्य सरकारों के पास उपलब्ध संसाधनों पर असर पड़ सकता है।

इसलिए विवाद के दोनों पक्षों के अपने तर्क हैं। असली लड़ाई टैक्स से ज्यादा संघवाद की है। Mining Tax का यह विवाद सिर्फ कंपनियों और सरकारों के बीच टैक्स का मामला नहीं है। यह भारत में प्राकृतिक संसाधनों और वित्तीय शक्तियों के बंटवारे का सवाल भी है।

केंद्र चाहता है कि देश में खनिजों के लिए एक समान राष्ट्रीय बाजार और नीति हो। राज्य चाहते हैं कि उनके पास अपने क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों से राजस्व जुटाने की पर्याप्त स्वतंत्रता रहे। यानी दोनों के सामने अलग-अलग प्राथमिकताएं हैं।

केंद्र के लिए सवाल है खनिजों की लागत और निवेश को कैसे नियंत्रित रखा जाए। राज्यों के लिए सवाल है—खनिज संपदा से मिलने वाले लाभ में उनकी हिस्सेदारी और वित्तीय स्वतंत्रता कैसे बनी रहे।

अब राज्यों और केंद्र के लिए आगे की राह क्या?

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल कानून के लागू होने के बाद सामने आएंगे। क्या केंद्र ऐसी शर्तें बनाएगा जिनके तहत राज्यों को कुछ लेवी लगाने की अनुमति मिलेगी? अगर मिलेगी तो उसकी सीमा क्या होगी? पुराने बकायों पर राज्यों का दावा कितना टिकेगा? और क्या राज्य इस कानून को अदालत में चुनौती देंगे?

2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले और 2026 के नए कानून के बीच संबंध के कारण यह मामला आगे एक बड़ी संवैधानिक बहस का रूप ले सकता है।

आखिरकार भारत को दो चीजों के बीच संतुलन बनाना होगा-एक तरफ पूरे देश के लिए सस्ती और स्थिर खनिज आपूर्ति, दूसरी तरफ खनिज संपन्न राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता।

यही इस पूरे विवाद का मूल सवाल है। खनिज देश के औद्योगिक विकास के लिए जरूरी हैं, लेकिन वे किसी अमूर्त जगह से नहीं निकलते-वे किसी राज्य की जमीन से निकलते हैं। इसलिए असली बहस यह है कि उस प्राकृतिक संपदा से पैदा होने वाले आर्थिक लाभ और उस पर कर लगाने की शक्ति का बंटवारा केंद्र और राज्यों के बीच कितना होना चाहिए।