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परिसीमन में नया विपक्षी मोर्चा? तमिलनाडु से महाराष्ट्र-पंजाब तक किन दलों को एक मंच पर ला सकता है सीटों का नया गणित

क्या आपको पता है कि दक्षिण भारत के राजनीतिक दलों ने एकजुट होकर एक नया मोर्चा क्यों बनाया है? जानिए, कैसे एक प्रस्तावित बिल ने उनके भीतर की नाराजगी को जगा दिया और क्या इसका असर भविष्य की राजनीति पर पड़ेगा!
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Avaneesh Kumar Mishra

Sep 13, 2026

लोकसभा सीटों का अगला परिसीमन अब केवल उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत की बहस नहीं रह गया है। तमिलनाडु की डीएमके जिस मुद्दे को जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़ रही थी, वही सवाल अब महाराष्ट्र और पंजाब जैसे राज्यों के क्षेत्रीय दलों तक पहुंच रहा है।

13 सितंबर को सामने आई जानकारी के मुताबिक डीएमके सांसद कनिमोझी करुणानिधि ने एक दिन पहले मुंबई में शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे से मुलाकात की। बातचीत में परिसीमन और विपक्षी दलों के आपसी तालमेल पर चर्चा हुई। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मार्च 2025 में एमके स्टालिन के नेतृत्व में बनी ‘फेयर डिलिमिटेशन’ संयुक्त कार्रवाई समिति का मुख्य आधार दक्षिण के राज्य और पंजाब थे; महाराष्ट्र तब इस मोर्चे का प्रमुख हिस्सा नहीं था।

अब सवाल है—क्या परिसीमन ऐसा मुद्दा बन सकता है जो डीएमके, कांग्रेस, माकपा, बीआरएस, आप और शिवसेना (यूबीटी) जैसे अलग-अलग क्षेत्रीय हितों वाले दलों को एक साझा मंच दे?

पहले समझिए विवाद अभी खत्म क्यों नहीं हुआ

केंद्र सरकार ने अप्रैल 2026 में संविधान का 131वां संशोधन विधेयक और परिसीमन से जुड़े दो अन्य विधेयक लोकसभा में पेश किए थे। संविधान संशोधन विधेयक जरूरी विशेष बहुमत हासिल नहीं कर सका और 17 अप्रैल को अस्वीकृत हो गया। उससे जुड़े बाकी दोनों विधेयकों पर भी आगे कार्रवाई नहीं हुई। यानी अभी कोई नया परिसीमन फार्मूला कानून नहीं बना है।

इसीलिए मौजूदा राजनीतिक लड़ाई भविष्य के फार्मूले को लेकर है—क्या राज्यों की सीटें केवल नई आबादी के अनुपात से तय होंगी, मौजूदा हिस्सेदारी सुरक्षित रखी जाएगी या कोई तीसरा रास्ता निकलेगा?

छह राज्यों का वर्तमान सीट बनाम आबादी गणित

नीचे आबादी का हिस्सा 2011 की अंतिम प्रकाशित जनगणना पर आधारित है। 2027 की जनगणना पूरी होने से पहले इसे भविष्य के परिसीमन का अंतिम आंकड़ा नहीं माना जा सकता।

राज्य2011 आबादीदेश की आबादी में हिस्सामौजूदा लोकसभा सीटेंलोकसभा में हिस्साप्रमुख राजनीतिक रुख
तमिलनाडु7.21 करोड़5.96%397.18%डीएमके मौजूदा आनुपातिक हिस्सेदारी सुरक्षित रखने और फ्रीज बढ़ाने के पक्ष में
केरल3.34 करोड़2.76%203.68%माकपा का कहना—जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को दंड न मिले
कर्नाटक6.11 करोड़5.05%285.16%कांग्रेस ‘फेयर डिलिमिटेशन’ और मौजूदा राजनीतिक वजन की सुरक्षा के पक्ष में
तेलंगाना3.50 करोड़2.89%173.13%कांग्रेस सरकार केवल आबादी के बजाय मिश्रित फार्मूले की मांग कर रही
महाराष्ट्र11.24 करोड़9.28%488.84%शिवसेना (यूबीटी) मौजूदा रूप में परिसीमन के विरोध और व्यापक चर्चा के पक्ष में
पंजाब2.77 करोड़2.29%132.39%आप ने हिस्सेदारी घटने का विरोध किया; अकाली दल समान 50% वृद्धि के पक्ष में

तमिलनाडु-केरल सबसे ज्यादा चिंतित क्यों?

2011 की आबादी के आधार पर तैयार पीआरएस के एक उदाहरण में अगर सीटों का राज्यों के बीच पुनर्वितरण केवल आबादी के अनुपात से हो, तो तमिलनाडु की मौजूदा 7.18% लोकसभा हिस्सेदारी लगभग 5.9% और केरल की 3.68% हिस्सेदारी करीब 2.7% तक आ सकती है। कर्नाटक पर असर अपेक्षाकृत कम दिखता है।

इसी वजह से डीएमके ने मांग की है कि 1971 की आबादी पर आधारित राज्यों की सीट हिस्सेदारी का संरक्षण आगे भी बढ़ाया जाए। अगस्त 2026 में कनिमोझी ने दोहराया था कि पार्टी अपने इस रुख से पीछे नहीं हटी है।

केरल के पिनराई विजयन का तर्क भी लगभग यही है—जिन राज्यों ने राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण नीति को सफलतापूर्वक लागू किया, उनकी राजनीतिक आवाज कम करना एक तरह का दंड होगा।

तेलंगाना ने दिया आबादी से आगे का नया फार्मूला

तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी इस बहस को एक कदम आगे ले गए हैं। अप्रैल 2026 में उन्होंने प्रस्ताव दिया कि यदि लोकसभा में अतिरिक्त सीटें बढ़ानी हैं तो आधी सीटें मौजूदा अनुपात के अनुसार और बाकी आधी राज्यों के आर्थिक योगदान जैसे सकल राज्य घरेलू उत्पाद के आधार पर बांटने पर चर्चा हो।

उनका तर्क है कि केवल जनसंख्या राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अकेला पैमाना नहीं होना चाहिए।

यह प्रस्ताव अभी किसी संवैधानिक फार्मूले का हिस्सा नहीं है, लेकिन इससे साफ है कि विपक्ष के भीतर भी केवल “सीटें फ्रीज करो” वाली एक ही राय नहीं है।

महाराष्ट्र की एंट्री क्यों बदलती है कहानी?

यही सबसे दिलचस्प हिस्सा है। महाराष्ट्र की स्थिति तमिलनाडु या केरल जैसी नहीं है। 2011 में देश की आबादी में महाराष्ट्र का हिस्सा करीब 9.28% था, जबकि मौजूदा लोकसभा में उसकी हिस्सेदारी 8.84% है।

पीआरएस के 2011 आबादी आधारित उदाहरण में महाराष्ट्र को मौजूदा 48 के मुकाबले 50 सीटें मिल सकती थीं; 50% बड़े सदन की स्थिति में संख्या 75 तक पहुंचने का अनुमान था। यानी महाराष्ट्र शुद्ध रूप से सीट गंवाने वाला राज्य नहीं है।

इसके बावजूद उद्धव ठाकरे ने अप्रैल में कहा था कि परिसीमन को जल्दबाजी में आगे बढ़ाने के बजाय व्यापक चर्चा होनी चाहिए। जुलाई में शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत ने कहा कि पार्टी मौजूदा स्वरूप का विरोध करेगी, हालांकि विपक्ष के सुझाए बदलाव स्वीकार होने पर रुख पर दोबारा विचार किया जा सकता है।

इसलिए कनिमोझी-उद्धव बातचीत का संकेत केवल सीट नुकसान नहीं, बल्कि राज्यों के अधिकार और केंद्र-राज्य शक्ति संतुलन की राजनीति है।

पंजाब में विपक्षी मोर्चे के भीतर ही दो रास्ते

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान 2025 के चेन्नई परिसीमन सम्मेलन में शामिल हुए थे। उन्होंने आशंका जताई थी कि लोकसभा का आकार बढ़ने के बावजूद पंजाब की कुल हिस्सेदारी कम हो सकती है।

लेकिन पंजाब में सभी दल एक फार्मूले पर नहीं हैं। अगस्त 2026 में शिरोमणि अकाली दल ने मौजूदा सीटें 25 साल और फ्रीज रखने के प्रस्ताव का विरोध करते हुए सभी राज्यों की सीटों में समान करीब 50% वृद्धि का समर्थन किया।

इससे साफ है कि संभावित मोर्चा राजनीतिक रूप से एकजुट हो सकता है, लेकिन परिसीमन का समाधान क्या हो—इस पर मतभेद रहेंगे।

केंद्र का जवाब: दक्षिण की सीटें घटेंगी नहीं

केंद्र सरकार इस पूरे तर्क को खारिज करती रही है। अप्रैल में गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में कहा था कि प्रस्तावित 50% वृद्धि मॉडल में दक्षिण भारत की कुल सीटें 129 से बढ़कर 195 हो सकती हैं और कुल लोकसभा में दक्षिण की हिस्सेदारी लगभग 24% के आसपास बनी रहेगी। उन्होंने तमिलनाडु के लिए 39 से 59, कर्नाटक के लिए 28 से 42, केरल के लिए 20 से 30 और तेलंगाना के लिए 17 से 26 सीटों का उदाहरण दिया था।

हालांकि पीआरएस ने अप्रैल में पेश विधेयक की भाषा का विश्लेषण करते हुए कहा था कि आबादी के अनुपात का सिद्धांत राज्यों की सापेक्ष हिस्सेदारी बदल सकता था। यही सरकार और विपक्ष के बीच तकनीकी तथा राजनीतिक विवाद का मूल है।

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