
आधुनिक युद्ध का सबसे बड़ा बदलाव यह नहीं है कि मिसाइलें और लड़ाकू विमान बेकार हो गए हैं, बल्कि यह है कि अब उनके साथ हजारों सस्ते, छोटे और मुश्किल से दिखाई देने वाले ड्रोन भी युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं।
यूक्रेन युद्ध ने इसका अर्थशास्त्र पूरी दुनिया को दिखाया है। जनवरी 2026 के एक विश्लेषण में करीब 35 हजार डॉलर के शाहेद जैसे ड्रोन को रोकने के लिए 30 लाख डॉलर तक की मिसाइल इस्तेमाल होने की लागत-असमानता का उदाहरण दिया गया। यूक्रेन अब इसी कारण अपेक्षाकृत सस्ते ‘इंटरसेप्टर ड्रोन’ पर जोर दे रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक कुछ यूक्रेनी इकाइयों ने ऐसे इंटरसेप्टर से ड्रोन गिराने की लागत मिसाइल की तुलना में करीब पांचवां हिस्सा बताई।
भारत के लिए भी सवाल बदल रहा है0 दुश्मन का ड्रोन गिराने से पहले उसे जल्दी और सही पहचानना कैसे संभव होगा? इसीलिए भविष्य की एयर डिफेंस में रडार, रेडियो फ्रीक्वेंसी सेंसर, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल कैमरे, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जैमर और लेजर एक ही नेटवर्क में जुड़ते दिखाई दे रहे हैं।
किसी सस्ते ड्रोन को अत्यधिक महंगी एयर डिफेंस मिसाइल से गिराना तकनीकी रूप से संभव हो सकता है, लेकिन हर बार आर्थिक रूप से सही नहीं। यही ‘कॉस्ट एक्सचेंज रेशियो’ की समस्या है।
अगर हमलावर बड़ी संख्या में सस्ते ड्रोन भेजता है और रक्षक हर ड्रोन पर महंगी मिसाइल खर्च करता है तो हमला विफल होने के बावजूद हमलावर आर्थिक दबाव पैदा कर सकता है।
इसलिए नई रक्षा रणनीति में हथियार को खतरे के अनुसार चुना जाता है। साधारण व्यावसायिक या रेडियो-नियंत्रित ड्रोन पर इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग प्रभावी हो सकती है। कुछ ड्रोन को इंटरसेप्टर ड्रोन या कम लागत वाले साधनों से रोका जा सकता है। ज्यादा गंभीर लक्ष्य के लिए लेजर या दूसरे हार्ड-किल हथियार और बड़े हवाई खतरे के लिए परंपरागत एयर डिफेंस मिसाइलें बनी रहेंगी। यानी भविष्य मिसाइल बनाम ड्रोन नहीं, बल्कि सही खतरे के खिलाफ सही कीमत वाला हथियार चुनने का है।
DRDO के काउंटर-ड्रोन सिस्टम में किसी एक सेंसर पर भरोसा नहीं किया जाता। आधिकारिक दस्तावेज के मुताबिक इसमें ड्रोन को खोजने और ट्रैक करने के लिए रडार तथा रेडियो फ्रीक्वेंसी डिटेक्शन, पहचान के लिए इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर और फिर निष्क्रिय करने के लिए ‘सॉफ्ट-किल’ तथा ‘हार्ड-किल’ विकल्प शामिल हैं।
सॉफ्ट-किल में संचार या नेविगेशन संबंधी इलेक्ट्रॉनिक उपाय शामिल हो सकते हैं, जबकि हार्ड-किल लेयर में निर्देशित ऊर्जा यानी लेजर तकनीक भी शामिल है। DRDO स्वयं कहता है कि छोटे, कम ऊंचाई और धीमी गति वाले ड्रोन के लिए अकेला सेंसर पर्याप्त नहीं है; इसलिए कई सेंसरों को जोड़ना जरूरी है। यही असल बदलाव है-एंटी-ड्रोन सिस्टम सिर्फ ‘बंदूक’ नहीं बल्कि सेंसर से निर्णय तक की पूरी डिजिटल श्रृंखला है।
यह शायद एंटी-ड्रोन युद्ध का सबसे कठिन हिस्सा है। छोटे ड्रोन रडार पर बहुत छोटे लक्ष्य दिखाई देते हैं। वे कम ऊंचाई पर उड़ सकते हैं और उनका व्यवहार पक्षियों या दूसरे छोटे हवाई ऑब्जेक्ट से मिलता-जुलता हो सकता है।
इस चुनौती का ताजा उदाहरण 13 सितंबर 2026 को लिथुआनिया में सामने आया। संदिग्ध ड्रोन समझकर एयरस्पेस अलर्ट हुआ और नाटो लड़ाकू विमान भेजे गए, लेकिन बाद में वह वस्तु पक्षियों का झुंड निकली।
AI इसी समस्या में मदद कर सकता है। रडार सिग्नेचर, उड़ान पैटर्न, रेडियो संकेत तथा इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल/इन्फ्रारेड तस्वीरों जैसे कई स्रोतों को मिलाकर एल्गोरिदम संभावित लक्ष्य को वर्गीकृत कर सकते हैं। DRDO की तकनीकी प्राथमिकताओं में भी हवाई लक्ष्यों की AI आधारित पहचान और रडार अनुप्रयोगों के लिए AI/ML शामिल हैं।
लेकिन AI को अंतिम सत्य मानना जोखिमपूर्ण होगा। युद्ध क्षेत्र में गलत पहचान का परिणाम गंभीर हो सकता है, इसलिए कमांड-एंड-कंट्रोल और मानवीय सत्यापन की भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहती है।
यहीं ‘ड्रोन स्वार्म’ परंपरागत एयर डिफेंस के लिए चुनौती बनता है। एक या दो ड्रोन पकड़ना अपेक्षाकृत आसान है। लेकिन दर्जनों या सैकड़ों लक्ष्य अलग-अलग दिशा से आएं तो रडार, ऑपरेटर और हथियार प्रणाली को तय करना पड़ता है कि कौन-सा लक्ष्य सबसे खतरनाक है और किसे पहले रोकना है।
इस स्थिति में AI का काम सिर्फ पहचान नहीं बल्कि ट्रैक मैनेजमेंट और खतरे की प्राथमिकता तय करने में सहायता करना भी हो सकता है। DRDO की भविष्य की तकनीकी सूची में ‘काउंटर स्वार्म टेक्नोलॉजी’ और AI/ML आधारित एंटी-स्वार्म समाधान अलग क्षेत्र के रूप में शामिल हैं।
इसी चुनौती को देखते हुए भारतीय वायु सेना 14 से 16 सितंबर 2026 तक पोखरण में ‘ड्रोनथॉन-2026’ आयोजित कर रही है। इसमें स्वार्म तकनीक, ऑटोनॉमस ऑपरेशन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और काउंटर-UAS प्रणालियों का लाइव मूल्यांकन होना है।
लेजर का सबसे बड़ा आकर्षण इसकी प्रति-शॉट लागत और प्रतिक्रिया गति है। एक बार प्रणाली और ऊर्जा स्रोत उपलब्ध होने पर हर लक्ष्य के लिए अलग महंगी मिसाइल की जरूरत नहीं पड़ती।
भारत पहले ही लेजर आधारित निर्देशित ऊर्जा हथियार पर परीक्षण कर चुका है। इसके साथ DRDO ने अगस्त 2025 में जिस इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस वेपन सिस्टम का पहला परीक्षण किया, उसमें QRSAM, VSHORADS और उच्च-शक्ति लेजर निर्देशित ऊर्जा हथियार को एक बहुस्तरीय व्यवस्था में जोड़ा गया था।
यह बताता है कि भारत का लक्ष्य मिसाइल को लेजर से बदलना नहीं, बल्कि मिसाइल + इलेक्ट्रॉनिक युद्ध + छोटी दूरी की रक्षा + लेजर को एक साथ जोड़ना है।
| तकनीक | भूमिका और चुनौती |
|---|---|
| रडार + RF सेंसर | छोटे हवाई लक्ष्य खोजने और ट्रैक करने की पहली परत; पक्षियों और छोटे ड्रोन में अंतर चुनौती |
| EO/IR कैमरा | संदिग्ध लक्ष्य की दृश्य/इन्फ्रारेड पुष्टि में मदद |
| AI/ML | कई सेंसरों का डेटा जोड़कर पहचान और खतरे की प्राथमिकता में सहायता |
| इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग | कुछ संचार या नेविगेशन आधारित ड्रोन को बिना मिसाइल के निष्क्रिय करने का विकल्प |
| इंटरसेप्टर ड्रोन | कम लागत में ड्रोन-से-ड्रोन रक्षा का उभरता मॉडल |
| लेजर DEW | छोटे ड्रोन के खिलाफ कम प्रति-शॉट लागत वाला हार्ड-किल विकल्प, लेकिन मौसम और लाइन-ऑफ-साइट जैसी व्यावहारिक सीमाएं |
| एयर डिफेंस मिसाइल | ज्यादा तेज, बड़े और गंभीर हवाई खतरों के लिए जरूरी उच्च स्तरीय रक्षा |
इस दिशा में खरीद भी बढ़ रही है। जुलाई 2026 में रक्षा अधिग्रहण परिषद ने भारतीय सेना के लिए ‘आकाश तरंग’ एंटी-UAV इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम की खरीद को सैद्धांतिक मंजूरी दी। वहीं भारत में सैन्य ड्रोन खरीद का संभावित अगला चरण 2 अरब डॉलर से ज्यादा का हो सकता है।
इसलिए भारत की अगली बड़ी रक्षा ताकत केवल ज्यादा शक्तिशाली मिसाइल बनाना नहीं होगी। असली बढ़त उस प्रणाली से आ सकती है जो एक छोटे बिंदु को रडार पर देखे, AI से समझे कि वह पक्षी है या हथियारबंद ड्रोन, सही हथियार चुने और महंगी मिसाइल बचाते हुए खतरे को रोक दे।
Updated on:
14 Sept 2026 03:57 pm
Published on:
14 Sept 2026 03:57 pm
