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नॉर्थ ईस्ट में एक भी एक्सप्रेस-वे नहीं, उत्तर और दक्षिण भारत में बिछ चुका है रफ्तार का जाल

Expressways in India : उत्तर और दक्षिण भारत में एक्सप्रेस-वे का जाल बिछ चुका है, लेकिन पूर्वोत्तर भारत समेत देश के 12 राज्यों में एक भी चालू एक्सप्रेस-वे क्यों नहीं है? जानिए इसके पीछे के कारण और पूरी सूची।
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Expressways in India

नार्थ ईस्ट में नहीं है एक भी एक्सप्रेस-वे।

भारत में सड़क कनेक्टिविटी की तस्वीर पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदली है। देश के कई हिस्सों में एक्सप्रेस-वे का ऐसा नेटवर्क तैयार हो चुका है, जिसने बड़े शहरों के बीच सफर का समय घंटों तक कम कर दिया है। उत्तर भारत में उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली जैसे राज्यों में एक्सप्रेस-वे का नेटवर्क लगातार फैल रहा है, तो पश्चिम और दक्षिण भारत में भी कई बड़े हाई-स्पीड कॉरिडोर यातायात को नई रफ्तार दे रहे हैं। लेकिन देश का एक बड़ा हिस्सा अभी इस रफ्तार की दौड़ में पीछे है।

अगर चालू यानी operational access-controlled expressway को आधार माना जाए, तो देश के कई राज्यों में अभी तक एक भी एक्सप्रेस-वे चालू नहीं हुआ है। इनमें सबसे बड़ा समूह पूर्वोत्तर भारत का है। नॉर्थ ईस्ट के सभी आठ राज्य—अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा में फिलहाल कोई चालू एक्सप्रेस-वे नहीं है। इसके अलावा गोवा, हिमाचल प्रदेश, केरल और ओडिशा भी उन राज्यों में शामिल हैं, जहां अभी operational expressway नहीं है।

इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि इन राज्यों में आधुनिक या चौड़े हाईवे नहीं हैं। कई राज्यों में चार-लेन और छह-लेन राष्ट्रीय राजमार्ग मौजूद हैं और कई हाई-स्पीड कॉरिडोर निर्माणाधीन या प्रस्तावित हैं। इसलिए एक्सप्रेस-वे और हाईवे के बीच अंतर समझना जरूरी है।

आखिर एक्सप्रेस-वे और सामान्य हाईवे में क्या फर्क है?

एक्सप्रेस-वे सिर्फ चौड़ी सड़क का नाम नहीं है। आम तौर पर एक्सप्रेस-वे access-controlled होता है, यानी इसमें प्रवेश और निकास निर्धारित इंटरचेंज से होता है। बीच में सामान्य चौराहे, बाजार या स्थानीय यातायात नहीं होते। इसी वजह से वाहनों की औसत रफ्तार ज्यादा रहती है और लंबे सफर का समय काफी कम हो जाता है।

यही वजह है कि दिल्ली-मेरठ, आगरा-लखनऊ या मुंबई-नागपुर जैसे रूट पर एक्सप्रेस-वे ने यात्रा के तरीके को बदल दिया है। उत्तर प्रदेश तो एक्सप्रेस-वे नेटवर्क के मामले में देश के सबसे प्रमुख राज्यों में शामिल हो चुका है। राज्य में कई बड़े एक्सप्रेस-वे अलग-अलग क्षेत्रों को जोड़ते हुए एक व्यापक हाई-स्पीड नेटवर्क तैयार कर रहे हैं।

नॉर्थ ईस्ट में एक्सप्रेस-वे आखिर क्यों नहीं?

अब सवाल उठता है कि जब उत्तर भारत में एक्सप्रेस-वे का जाल बिछ रहा है, तो नॉर्थ ईस्ट में इसकी रफ्तार इतनी धीमी क्यों है?

इसकी सबसे बड़ी वजह है भूगोल। पूर्वोत्तर के बड़े हिस्से में पहाड़ी और बेहद ऊबड़-खाबड़ इलाका है। अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मिजोरम, नागालैंड और मेघालय जैसे राज्यों में सड़क को सीधा और चौड़ा बनाने के लिए पहाड़ काटने, सुरंग बनाने और बड़े पुलों का निर्माण करना पड़ता है। इससे परियोजनाओं की लागत और निर्माण का समय दोनों बढ़ जाते हैं।

दूसरी बड़ी चुनौती जमीन अधिग्रहण है। एक्सप्रेस-वे के लिए सिर्फ मौजूदा सड़क को चौड़ा करना पर्याप्त नहीं होता। अक्सर नया alignment बनाना पड़ता है, जिसके लिए बड़ी मात्रा में जमीन चाहिए। इसके साथ वन और पर्यावरण संबंधी मंजूरियां भी कई परियोजनाओं की गति को प्रभावित करती हैं।

पूर्वोत्तर में घने जंगल, भारी बारिश, भूस्खलन और नदियां भी सड़क निर्माण को कठिन बनाती हैं। खासकर पहाड़ी इलाकों में बारिश के दौरान निर्माण का समय सीमित हो जाता है। कई जगह slope protection, retaining wall, बड़े पुल और सुरंग जैसी संरचनाओं की जरूरत पड़ती है।

यानी नॉर्थ ईस्ट में समस्या यह नहीं है कि सड़क निर्माण पर काम नहीं हो रहा। असल बात यह है कि यहां सड़क बनाना मैदानी इलाकों की तुलना में कहीं ज्यादा जटिल और महंगा है।

फिर नॉर्थ ईस्ट में हो क्या रहा है?

पूर्वोत्तर में सरकार का फोकस लंबे समय से राष्ट्रीय राजमार्गों, चार-लेन कॉरिडोर, सीमावर्ती सड़कों और राज्य की राजधानियों व प्रमुख शहरों को जोड़ने पर रहा है।

असम इस बदलाव का प्रमुख केंद्र बन रहा है। राज्य में एक्सप्रेस-वे और हाई-स्पीड कॉरिडोर का नेटवर्क विकसित करने की योजना पर काम हो रहा है। इसी दिशा में बईहाटा चारियाली–तेजपुर 135.87 किमी चार-लेन access-controlled corridor जैसी परियोजना महत्वपूर्ण है।

यानी नॉर्थ ईस्ट में अभी operational expressway का नेटवर्क भले नहीं है, लेकिन आने वाले वर्षों के लिए हाई-स्पीड कनेक्टिविटी की नींव रखी जा रही है।

देश में कुल कितने राज्य ऐसे हैं?

अगर चालू access-controlled expressway को आधार मानें, तो 2026 में ऐसे 12 राज्य हैं जहां अभी कोई एक्सप्रेस-वे चालू नहीं है।

इन राज्यों की पूरी सूची

  • अरुणाचल प्रदेश
  • असम
  • गोवा
  • हिमाचल प्रदेश
  • केरल
  • मणिपुर
  • मेघालय
  • मिजोरम
  • नागालैंड
  • ओडिशा
  • सिक्किम
  • त्रिपुरा

इन 12 राज्यों में सबसे खास बात यह है कि 8 राज्य अकेले नॉर्थ ईस्ट के हैं। यानी एक्सप्रेस-वे के मामले में सबसे बड़ा गैप पूर्वोत्तर भारत में दिखाई देता है।

वहीं बाकी चार राज्य गोवा, हिमाचल प्रदेश, केरल और ओडिशा—देश के दूसरे हिस्सों में हैं। इनमें भी आधुनिक राष्ट्रीय राजमार्ग और बड़े सड़क कॉरिडोर मौजूद हैं, लेकिन उन्हें operational access-controlled expressway की श्रेणी में नहीं रखा जाता।

उत्तर भारत में सबसे आगे कौन?

अगर एक्सप्रेस-वे नेटवर्क की बात करें तो उत्तर प्रदेश सबसे अलग नजर आता है। आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे, पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे, बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे और गंगा एक्सप्रेस-वे जैसे प्रोजेक्ट राज्य के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ रहे हैं।

दिल्ली-एनसीआर से जुड़े एक्सप्रेस-वे ने भी उत्तर भारत में हाई-स्पीड सड़क नेटवर्क को मजबूत किया है। दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस-वे और ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस-वे जैसे कॉरिडोर ने दिल्ली के आसपास लंबी दूरी के यातायात को वैकल्पिक रास्ते दिए हैं। गंगा एक्सप्रेस-वे का विस्तार भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आगे कनेक्टिविटी को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।

दक्षिण भारत भी पीछे नहीं

दक्षिण भारत में भी एक्सप्रेस-वे और हाई-स्पीड कॉरिडोर का विस्तार हो रहा है। कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में बड़े इंटर-स्टेट कॉरिडोर विकसित किए जा रहे हैं।

बेंगलुरु–चेन्नई एक्सप्रेस-वे इसका बड़ा उदाहरण है, जो कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु को जोड़ता है। इसका उद्देश्य देश के दो बड़े आर्थिक और औद्योगिक केंद्रों के बीच सड़क संपर्क को तेज करना है।

दक्षिण भारत में एक्सप्रेस-वे के साथ-साथ आर्थिक कॉरिडोर और चार-लेन/छह-लेन राष्ट्रीय राजमार्ग भी औद्योगिक शहरों और बंदरगाहों के बीच कनेक्टिविटी मजबूत कर रहे हैं।

गोवा, हिमाचल, केरल और ओडिशा क्यों पीछे?

12 राज्यों की सूची में सिर्फ नॉर्थ ईस्ट ही नहीं है। गोवा, हिमाचल प्रदेश, केरल और ओडिशा भी ऐसे राज्य हैं जहां अभी operational expressway नहीं है। हालांकि इन चारों राज्यों की वजह अलग-अलग है।

हिमाचल प्रदेश में सबसे बड़ी चुनौती पहाड़ी भूगोल है। यहां लंबे, सीधे और access-controlled expressway के बजाय सुरंगों, पुलों और चौड़े राष्ट्रीय राजमार्गों के जरिए कनेक्टिविटी सुधारना अधिक व्यावहारिक रहा है।

केरल की समस्या बिल्कुल अलग है। राज्य की आबादी घनी है और बड़े हिस्से में लगातार बसी हुई जमीन है। ऐसे में नए alignment के लिए जमीन अधिग्रहण कठिन और महंगा हो जाता है। राज्य में हाई-स्पीड सड़क कनेक्टिविटी के लिए कई बड़े प्रोजेक्ट प्रस्तावित रहे हैं, लेकिन operational expressway नेटवर्क अभी नहीं बना है।

गोवा छोटा राज्य है और इसका बड़ा हिस्सा पहले से ही राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। यहां लंबे अंतरराज्यीय एक्सप्रेस-वे की जरूरत उत्तर प्रदेश या राजस्थान जैसे बड़े राज्यों की तुलना में कम रही है।

वहीं ओडिशा में एक्सप्रेस-वे नेटवर्क विकसित करने की दिशा में योजनाएं आगे बढ़ रही हैं। राज्य में औद्योगिक और बंदरगाह आधारित कनेक्टिविटी की जरूरत बढ़ने के साथ हाई-स्पीड कॉरिडोर पर जोर भी बढ़ रहा है।

तस्वीर तेजी से बदल रही है

भारत का एक्सप्रेस-वे नेटवर्क अभी निर्माण के दौर में है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने 2025 के अंत तक देश में लगभग 3,052 किमी राष्ट्रीय हाई-स्पीड कॉरिडोर/एक्सप्रेसवे चालू होने की जानकारी दी थी। आने वाले वर्षों में कई नए कॉरिडोर प्रस्तावित और निर्माणाधीन हैं।