
जई की खेती भारत में मुख्य रूप से पशुओं के लिए हरे चारे के रूप में की जाती है। खासकर डेयरी किसानों के लिए यह सर्दियों में हरे चारे का महत्वपूर्ण स्रोत है। इसकी खेती अपेक्षाकृत आसान है और अच्छी सिंचाई व प्रबंधन मिलने पर पर्याप्त मात्रा में हरा चारा तैयार किया जा सकता है।
देश में चारे वाली जई की खेती करीब 0.25 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में होने का अनुमान है। उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार, हरियाणा और मध्य प्रदेश इसके प्रमुख उत्पादक राज्यों में शामिल हैं।
जई में हरे चारे के रूप में अच्छी पोषण गुणवत्ता पाई जाती है। इसे अकेले चारे के रूप में या दूसरे चारा फसलों के साथ भी उपयोग किया जा सकता है। डेयरी पशुओं को संतुलित आहार देने में हरे चारे की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
इसकी एक खासियत यह है कि किसान एक कटाई या बहु-कटाई वाली किस्मों का चुनाव कर सकते हैं। इससे उपलब्ध जमीन, पानी और पशुओं की संख्या के अनुसार चारा उत्पादन की योजना बनाई जा सकती है।
जई रबी मौसम की फसल है। इसकी बुवाई का सही समय क्षेत्र की जलवायु और उपलब्ध सिंचाई पर निर्भर करता है। सामान्य तौर पर उत्तर भारत में इसकी बुवाई अक्टूबर से नवंबर के दौरान की जाती है।
बहुत देर से बुवाई करने पर फसल की बढ़वार और कुल हरे चारे की उपज प्रभावित हो सकती है। इसलिए किसान अपने क्षेत्र के कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र की स्थानीय सलाह के अनुसार बुवाई का समय तय करें।
जई की खेती के लिए उपजाऊ दोमट मिट्टी और अच्छी जल निकासी वाली जमीन उपयुक्त मानी जाती है। खेत में पानी का लंबे समय तक जमाव फसल की बढ़वार को प्रभावित कर सकता है।
बुवाई से पहले खेत की अच्छी जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बनाएं। खाद और उर्वरक की मात्रा मिट्टी की जांच तथा स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के आधार पर तय करना बेहतर है।
जई की खेती में किसान अपनी जरूरत के अनुसार कटाई का तरीका चुन सकते हैं। एक कटाई वाली जई में फसल को एक बार काटकर अधिक मात्रा में हरा चारा लिया जाता है। वहीं बहु-कटाई वाली जई में पहली कटाई अपेक्षाकृत जल्दी की जाती है और अनुकूल परिस्थितियों में बाद में भी कटाई की जा सकती है।
बहु-कटाई का फायदा यह है कि किसान लंबे समय तक हरे चारे की उपलब्धता बनाए रख सकता है। हालांकि, कटाई की संख्या और अंतराल किस्म, मौसम और फसल की बढ़वार पर निर्भर करते हैं।
किसानों को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए-
जई की उन्नत तकनीक का फायदा किसानों को मिल सकता है। जम्मू-कश्मीर के राजौरी में कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से 2021-22 से 2023-24 के दौरान किए गए अग्रिम पंक्ति प्रदर्शनों में बेहतर तकनीक अपनाने वाले खेतों में पारंपरिक पद्धति की तुलना में औसत उपज में 29.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
इन प्रदर्शनों में प्रति हेक्टेयर करीब ₹40,258 का अतिरिक्त लाभ दर्ज हुआ। बेहतर तकनीक वाले खेतों में लाभ-लागत अनुपात 2.84 रहा, जबकि किसानों की सामान्य पद्धति में यह 2.29 था।
हरे चारे के लिए कटाई का समय बहुत महत्वपूर्ण है। बहुत जल्दी कटाई करने पर कुल चारे की मात्रा कम हो सकती है, जबकि बहुत देर से कटाई करने पर चारे की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
बहु-कटाई वाली जई में पहली कटाई सामान्यतः 40–45 दिन के आसपास की जा सकती है। इसके बाद फसल की बढ़वार और मौसम के अनुसार अगली कटाई का समय तय किया जाता है। स्थानीय किस्म की अनुशंसा के अनुसार कटाई करना बेहतर रहता है।
जिन किसानों के पास डेयरी पशु हैं, उनके लिए जई की खेती हरे चारे की जरूरत पूरी करने में मदद कर सकती है। बुवाई से पहले किसान को यह गणना कर लेनी चाहिए कि उसके पास कितने पशु हैं और रोजाना कितने हरे चारे की जरूरत होगी।
यदि पर्याप्त जमीन उपलब्ध है तो जई की खेती को दूसरी चारा फसलों के साथ मिलाकर पूरे रबी सीजन के लिए चारा प्रबंधन की योजना बनाई जा सकती है।
| बिंदु | जानकारी |
|---|---|
| मुख्य उद्देश्य | पशुओं के लिए हरा चारा |
| फसल मौसम | रबी |
| सामान्य बुवाई | अक्टूबर–नवंबर |
| उपयुक्त मिट्टी | उपजाऊ दोमट और अच्छी जल निकासी वाली |
| कटाई का तरीका | एक कटाई या बहु-कटाई |
| पहली कटाई | बहु-कटाई में करीब 40–45 दिन |
| प्रमुख राज्य | उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश |
| जरूरी सावधानी | समय पर बुवाई, सिंचाई और कटाई |
| बीज चयन | क्षेत्र के लिए अनुशंसित प्रमाणित किस्म |
जई की खेती में बिना जानकारी के अधिक बीज डालना, खेत में पानी जमा रहने देना या कटाई में बहुत देरी करना नुकसानदायक हो सकता है। इसी तरह केवल अधिक चारा उत्पादन के लक्ष्य में चारे की गुणवत्ता को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
Updated on:
14 Sept 2026 02:05 pm
Published on:
14 Sept 2026 02:05 pm
