20 सितंबर 2026,

रविवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

भिंडी की खेती: गर्मी और खरीफ में कब करें बुवाई, कितनी रखें दूरी और खाद-उर्वरक का सही प्रबंधन

भिंडी कम अवधि में तैयार होने वाली प्रमुख सब्जी फसल है। सही समय पर बुवाई, उचित दूरी, संतुलित खाद-उर्वरक और कीट प्रबंधन अपनाकर किसान अच्छी उपज ले सकते हैं। जानिए खेती की पूरी जानकारी।
4 min read
Google source verification

image

Avaneesh Kumar Mishra

Sep 14, 2026

भिंडी की खेती देश के अधिकांश मैदानी और गर्म क्षेत्रों में की जाती है। इसकी मांग सालभर बनी रहती है, इसलिए किसान इसे गर्मी और खरीफ दोनों मौसम में उगा सकते हैं। अच्छी उपज के लिए किस्म का चुनाव, बुवाई का समय और खेत में जल निकासी पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।

गर्मी और खरीफ में कब करें भिंडी की बुवाई?

भिंडी की बुवाई मुख्य रूप से दो मौसम में की जाती है। वसंत-ग्रीष्म फसल के लिए फरवरी से मार्च और खरीफ फसल के लिए जून से जुलाई उपयुक्त समय माना जाता है। हालांकि, स्थानीय तापमान और बारिश के अनुसार बुवाई का समय थोड़ा आगे-पीछे हो सकता है।

भिंडी के बीज अंकुरण और पौधों की शुरुआती बढ़वार के लिए गर्म मौसम अनुकूल रहता है। बहुत कम तापमान में अंकुरण प्रभावित हो सकता है, जबकि लगातार बारिश और खेत में पानी भरने से पौधों को नुकसान पहुंच सकता है।

बीज की मात्रा और पौधों के बीच कितनी दूरी रखें?

बीज दर किस्म, बीज के आकार, अंकुरण क्षमता और मौसम के अनुसार बदलती है। सामान्य तौर पर गर्मी की फसल में लगभग 4-6 किलोग्राम और खरीफ में 6-8 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर का इस्तेमाल किया जा सकता है। संकर किस्मों में कंपनी या कृषि विश्वविद्यालय की अनुशंसित बीज दर को प्राथमिकता दें।

कतार से कतार की दूरी सामान्यतः 45–60 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी करीब 15–25 सेंटीमीटर रखी जा सकती है। अधिक घनी बुवाई से पौधों में हवा का संचार कम हो सकता है और रोग-कीट का दबाव बढ़ सकता है।

कैसी मिट्टी और जलवायु भिंडी के लिए बेहतर?

भिंडी के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त रहती है। सामान्यतः हल्की अम्लीय से तटस्थ मिट्टी में इसकी अच्छी बढ़वार होती है। लगभग pH 6.0 से 7.5 के आसपास की मिट्टी बेहतर मानी जाती है।

खेत में पानी रुकना भिंडी के लिए नुकसानदायक है। इसलिए भारी मिट्टी में जल निकासी की व्यवस्था करना जरूरी है। बुवाई से पहले खेत की 2–3 जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बनाएं और खेत को समतल करें।

खेत की तैयारी और जैविक खाद का इस्तेमाल

अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट खेत की तैयारी के समय मिट्टी में मिलाई जा सकती है। इसकी मात्रा मिट्टी की उर्वरता और उपलब्ध जैविक खाद के अनुसार तय करें। सामान्य तौर पर 8–10 टन अच्छी तरह सड़ी गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर उपयोग की जा सकती है।

रासायनिक उर्वरकों की मात्रा मिट्टी परीक्षण के आधार पर तय करना बेहतर है। बिना मिट्टी की जांच के DAP, यूरिया और पोटाश की एक निश्चित मात्रा हर खेत में देना सही नहीं है। नाइट्रोजन की जरूरत को फसल की अवस्था के अनुसार बांटकर देने से पौधों की बढ़वार और फल उत्पादन में मदद मिलती है।

फूल और फल बनने के समय पोषण पर दें ध्यान

भिंडी में संतुलित पोषण जरूरी है। नाइट्रोजन की अधिक मात्रा देने से केवल पत्तियों की बढ़वार बढ़ सकती है और फसल का संतुलन बिगड़ सकता है। इसलिए नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की मात्रा मिट्टी परीक्षण तथा स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार दें।

जिंक, बोरॉन या मैग्नीशियम जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की जरूरत तभी पूरी करें जब मिट्टी या पौधों में उनकी कमी की पुष्टि हो। बिना कमी जाने इनका बार-बार छिड़काव करना जरूरी नहीं है।

पीला शिरा मोजेक रोग से कैसे बचाएं?

भिंडी में पीला शिरा मोजेक वायरस (YVMV) प्रमुख समस्याओं में शामिल है। इसका प्रसार मुख्य रूप से सफेद मक्खी के जरिए होता है। इसलिए रोग के प्रबंधन में स्वस्थ बीज, सहनशील या प्रतिरोधी किस्मों का चयन और सफेद मक्खी की निगरानी महत्वपूर्ण है।

खेत में संक्रमित पौधों को शुरुआती अवस्था में निकालकर नष्ट करना भी उपयोगी उपाय है। सफेद मक्खी की संख्या बढ़ने पर कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र की अनुशंसा के अनुसार जैविक अथवा स्वीकृत कीटनाशी उपाय अपनाएं।

बीज उपचार से शुरुआती रोगों का जोखिम घटाएं

बुवाई से पहले बीज उपचार करने से बीज और मिट्टी से होने वाले कुछ रोगों का जोखिम कम किया जा सकता है। ट्राइकोडर्मा जैसे जैव-एजेंटों का उपयोग स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की अनुशंसित मात्रा के अनुसार किया जा सकता है।

रासायनिक बीज उपचार के लिए भी किसी एक दवा की मात्रा को सार्वभौमिक मानने के बजाय संबंधित फसल और उत्पाद के वर्तमान लेबल तथा कृषि विभाग की सिफारिश का पालन करें। इससे गलत मात्रा या असंगत दवा के इस्तेमाल से बचा जा सकता है।

सिंचाई में रखें मिट्टी की नमी का ध्यान

गर्मी की भिंडी में सिंचाई की जरूरत अधिक हो सकती है, लेकिन हर खेत में 4–5 दिन का निश्चित अंतराल लागू नहीं होता। मिट्टी का प्रकार, तापमान, फसल की अवस्था और मौसम देखकर सिंचाई करें।

फूल और फल बनने के दौरान पानी की कमी से उपज और फलों की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। वहीं अधिक पानी या जलभराव जड़ों को नुकसान पहुंचा सकता है। ड्रिप सिंचाई अपनाने से पानी को पौधों की जरूरत के अनुसार नियंत्रित किया जा सकता है।

निराई-गुड़ाई और तुड़ाई कब करें?

शुरुआती अवस्था में खेत को खरपतवार से मुक्त रखना जरूरी है। जरूरत के अनुसार 2–3 बार निराई-गुड़ाई की जा सकती है। खरीफ में बारिश के कारण खरपतवार अधिक आने पर अतिरिक्त निराई की जरूरत पड़ सकती है।

भिंडी की फलियों की तुड़ाई तब करें जब वे कोमल और बाजार योग्य अवस्था में हों। फलियों को अधिक देर पौधे पर छोड़ने से वे कड़ी और रेशेदार हो सकती हैं। गर्म मौसम में तुड़ाई का अंतर कम हो सकता है, इसलिए खेत की स्थिति के अनुसार नियमित तुड़ाई करें।

कितनी मिल सकती है उपज?

भिंडी की उपज किस्म, मौसम, पौध संख्या, मिट्टी, सिंचाई और प्रबंधन पर निर्भर करती है। अच्छी देखभाल में संकर किस्मों की उपज सामान्य किस्मों से अधिक हो सकती है, लेकिन किसी एक आंकड़े को हर क्षेत्र के लिए निश्चित उपज नहीं माना जा सकता।

कृषि अनुसंधान संस्थानों के परीक्षणों में अलग-अलग किस्मों और प्रबंधन प्रणालियों के तहत उपज में काफी अंतर पाया गया है। इसलिए बीज खरीदते समय कंपनी द्वारा बताए गए संभावित उत्पादन के साथ स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विज्ञान केंद्र की अनुशंसा को भी देखें।

भिंडी की खेती का संक्षिप्त कैलेंडर

कामसामान्य समय/सुझाव
गर्मी की बुवाईफरवरी–मार्च
खरीफ की बुवाईजून–जुलाई
कतार दूरी45–60 सेमी
पौधे की दूरी15–25 सेमी
मिट्टीदोमट/बलुई दोमट, अच्छी जल निकासी
गोबर खादकरीब 8–10 टन/हेक्टेयर, मिट्टी के अनुसार
सिंचाईमौसम और मिट्टी की नमी के अनुसार
निराई-गुड़ाईजरूरत के अनुसार 2–3 बार या अधिक
प्रमुख रोगपीला शिरा मोजेक वायरस
प्रमुख वाहक कीटसफेद मक्खी
तुड़ाईकोमल फलियों की नियमित तुड़ाई

टिकाऊ खेती के लिए इन बातों का रखें ध्यान

भिंडी में संतुलित उर्वरक उपयोग, जैविक खाद, जल की बचत और एकीकृत कीट प्रबंधन अपनाने से खेती की लागत और पर्यावरणीय दबाव को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। खेत में रोगग्रस्त पौधों और खरपतवार की नियमित निगरानी करें।

बड़ी खबरें

View All

Patrika+

ट्रेंडिंग