
सांकेतिक इमेज (सोर्स-Chatgpt)
राजस्थान में इंटरनेट के जरिए सॉफ्टवेयर से ठगी का जाल फैला हुआ है। इस ठगी के जाल में बड़े पैमाने पर युवा शिकार हो रहे हैं। ठगी का यह मामला सिर्फ खबरों तक सीमित नहीं है, बल्कि एक गंभीर समस्या बन गई है। इस लेख में हम ठगी के तरीके, इसके पीछे के नेटवर्क, पीड़ितों की कहानी और इससे बचाव के उपायों को समझने का प्रयास करेंगे।
राजस्थान में 2026 की शुरुआत से अब तक साइबर ठगी की राशि 387 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। यह आंकड़ा 12 जुलाई तक का है। जयपुर, अलवर, भरतपुर कॉरिडोर इस ठगी का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट बन चुका है। साल 2023 में यह राशि 354 करोड़ थी, जो 2024 में बढ़कर 795 करोड़ हो गई। साल 2025 में ठगी का यह आंकड़ा 768 करोड़ रहा। शिकायतों की संख्या भी 77,880 से बढ़कर 1,27,782 हो गई है, जबकि FIR की संख्या 237 से बढ़कर 492 हो गई है।
ठगी के मामलों में निवेश घोटाले सबसे अधिक नुकसान पहुंचाने वाले रहे हैं। इसके अलावा, डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाकर, नौकरी या सरकारी एजेंसी का झांसा देकर, और ऑनलाइन गेमिंग या फर्जी वेबसाइटों के जरिए भी ठगी की जाती है। एक मामले में जयपुर के भांकरोटा इलाके में एक किराए के फ्लैट से संचालित फर्जी कॉल सेंटर को पुलिस ने पकड़ा। आरोपियों ने ऑनलाइन गेमिंग और निवेश के नाम पर लोगों को फंसाया। उन्होंने RAMESH247.COM और 99exch जैसी वेबसाइटों का इस्तेमाल किया, जहां पहले गेमिंग ID बनाने के लिए ₹500 वसूले गए और बाद में अधिक राशि जमा करवाने का दबाव बनाया गया।
बैंक ट्रांजैक्शन की जांच में करोड़ों रुपये की ठगी का खुलासा हुआ। पुलिस ने ₹1.5 लाख नकद, 16 मोबाइल, 3 लैपटॉप, 24 एटीएम कार्ड और अन्य डिजिटल साक्ष्य जब्त किए। एक अन्य मामला अलवर का है, जहां एक व्यक्ति ने मेडिकल एडमिशन का झांसा देकर छात्रों से लाखों रुपये ठग लिए। यह गिरोह सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों के जरिए सक्रिय था। कई मामलों में ठगों ने खुद को कंपनी का CEO या उच्च अधिकारी बताकर अकाउंटेंटों को व्हाट्सऐप पर संदेश भेजे और ₹5.3 करोड़ तक की राशि ट्रांसफर करवा ली। इस मामले में 17 लोग गिरफ्तार हुए, जिनमें बैंक खाते उपलब्ध कराने, नकद निकालने और क्रिप्टोकरेंसी में बदलने वाले शामिल थे।
डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाकर बुजुर्गों से ₹80 लाख तक की ठगी का मामला भी सामने आया है। इस मामले में मुख्य आरोपी दुबई में है और हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है। अब तक ₹13 लाख की राशि रिकवर की गई है।
ठगी के मामलों में अक्सर युवा, बेरोजगार या नौकरी की तलाश में लगे लोग निशाने पर होते हैं। फर्जी कॉल सेंटर, सोशल मीडिया विज्ञापन और नकली वेबसाइटों के जरिए उन्हें फंसाया जाता है। कई बार पीड़ितों को विश्वास दिलाया जाता है कि यह सरकारी या विश्वसनीय एजेंसी से जुड़ा है।
ठगी के बाद शिकायतें साइबर हेल्पलाइन या पुलिस तक पहुंचती हैं, लेकिन कई बार देर से शिकायत करने के कारण राशि वापस नहीं मिल पाती। वहीं, जो लोग तुरंत शिकायत करते हैं, उन्हें राशि वापस मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
राजस्थान में साइबर ठगी की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। इस पर प्रभावी रोक तभी लगेगी जब पुलिस, बैंक, तकनीकी संस्थान और आम लोग मिलकर काम करें। साइबर जागरूकता अभियान, स्कूल-कॉलेजों में प्रशिक्षण और डिजिटल साक्ष्य संभालने में पुलिस अधिकारियों को बेहतर प्रशिक्षण की आवश्यकता है। ठगी के पीछे अक्सर एक संगठित नेटवर्क होता है, जो युवा, बेरोजगार और तकनीकी रूप से कम सशक्त लोगों को निशाना बनाता है। जागरूकता, सतर्कता और समय पर कार्रवाई ही इस जाल से बाहर निकलने का रास्ता है।
Updated on:
23 Aug 2026 06:43 pm
Published on:
23 Aug 2026 06:43 pm
