
भारत में पॉलीमर नोटों की संभावनाओं पर फिर बढ़ी चर्चा, क्या बदल जाएगी करेंसी की तस्वीर? ( विजुअल डिजाइन: पत्रिका)
भारत में नोटों के भविष्य को लेकर एक बार फिर प्लास्टिक करेंसी यानी पॉलीमर नोट चर्चा में हैं। करीब 14 साल पहले वर्ष 2012 में केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने पॉलीमर नोटों का परीक्षण शुरू किया था। उस समय उद्देश्य था कि ऐसे नोट तैयार किए जाएं जो सामान्य कागजी नोटों की तुलना में ज्यादा टिकाऊ हों, जल्दी खराब न हों और सुरक्षा के लिहाज से बेहतर साबित हों। हालांकि, अभी तक भारत में प्लास्टिक करेंसी को नियमित रूप से लागू नहीं किया गया है। RBI और केंद्र सरकार समय-समय पर करेंसी मैनेजमेंट को बेहतर बनाने के लिए नई तकनीकों का मूल्यांकन करते रहे हैं।
भारत में पॉलीमर नोटों की शुरुआत का विचार पहली बार वर्ष 2012 में सामने आया था। तत्कालीन वित्त मंत्रालय ने संसद में जानकारी दी थी कि ₹10 मूल्य के पॉलीमर नोटों का फील्ड ट्रायल किया जाएगा। इस परीक्षण के लिए करीब 100 करोड़ पॉलीमर नोटों को सीमित क्षेत्रों में इस्तेमाल करने की योजना बनाई गई थी।
उस करेंसी के ट्रायल के लिए पांच शहर चुने गए थे:
जयपुर।
शिमला।
कोच्चि।
मैसूर।
भुवनेश्वर।
इन शहरों का चयन अलग-अलग मौसम और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया गया था, ताकि यह पता लगाया जा सके कि गर्मी, नमी और सामान्य इस्तेमाल में पॉलीमर नोट कितना बेहतर प्रदर्शन करते हैं।
सरकार ने RBI के साथ मिलकर ₹10 के पॉलीमर नोटों का फील्ड ट्रायल करने का फैसला किया था। इसका प्रमुख उद्देश्य नोटों की टिकाऊ उम्र बढ़ाना था।
रेफरेंस: PIB, वित्त मंत्रालय — 13 दिसंबर 2012
सरकार ने बताया कि पांच शहरों में ₹10 के करीब 100 करोड़ पॉलीमर नोटों का परीक्षण किया जाएगा। ट्रायल से इनके प्रदर्शन और टिकाऊपन का आकलन किया जाना था।
रेफरेंस: PIB, वित्त मंत्रालय — 12 मार्च 2013
RBI गवर्नर ने कहा कि पॉलीमर नोटों का प्रस्ताव फिलहाल विचाराधीन है। केंद्रीय बैंक इसके संभावित फायदे और व्यावहारिक पहलुओं का मूल्यांकन कर रहा है।
रेफरेंस: मीडिया रिपोर्ट — 5 जून 2026
नोट: बिजनेस मीडिया रिपोर्टों में छोटे मूल्य वर्ग के पॉलीमर नोटों के संभावित फील्ड ट्रायल की बात सामने आई है। हालांकि, अभी इसे लेकर पुराने कागजी नोटों को हटाने का कोई अंतिम फैसला घोषित नहीं किया गया है।
रेफरेंस: मीडिया रिपोर्ट — 2026
भारत में छोटे मूल्य वर्ग के नोट सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं। ₹10 और ₹20 जैसे नोट रोजाना लाखों बार हाथ बदलते हैं। इससे इनके जल्दी खराब होने की संभावना बढ़ जाती है। RBI को खराब नोटों को वापस लेकर नए नोट जारी करने पड़ते हैं। इससे—
नोट छपाई का खर्च बढ़ता है
कागज और स्याही की खपत बढ़ती है
करेंसी मैनेजमेंट पर अतिरिक्त दबाव आता है
पॉलीमर नोटों को इस समस्या का संभावित समाधान माना जाता है।
पॉलीमर नोट पानी, धूल और नमी से कम प्रभावित होते हैं। सामान्य कागजी नोटों की तुलना में इनकी उम्र अधिक हो सकती है।
इन नोटों में पारदर्शी विंडो, विशेष डिजाइन और आधुनिक सुरक्षा तकनीक जोड़ी जा सकती है, जिससे नकली नोट बनाना मुश्किल हो जाता है।
हालांकि शुरुआत में पॉलीमर नोट तैयार करने की लागत अधिक हो सकती है, लेकिन लंबे समय तक चलने के कारण कुल खर्च कम होने की संभावना रहती है।
2012 के ट्रायल के बाद भारत में इसे बड़े स्तर पर लागू नहीं किया गया। इसके पीछे कई कारण रहे:—
मौजूदा बैंकिंग सिस्टम में बदलाव की जरूरत।
ATM और कैश मशीनों को अपडेट करना।
नोट छपाई व्यवस्था में तकनीकी बदलाव।
उत्पादन क्षमता और लागत।
इसके अलावा भारत जैसे बड़े देश में नई करेंसी व्यवस्था लागू करना धीरे-धीरे किया जाने वाला फैसला होता है।
ऑस्ट्रेलिया ने पॉलीमर करेंसी को बड़े स्तर पर अपनाने वाले शुरुआती देशों में पहचान बनाई। इसके बाद ब्रिटेन, कनाडा और कई अन्य देशों ने भी पॉलीमर नोटों का इस्तेमाल शुरू किया। इन देशों का अनुभव बताता है कि पॉलीमर नोट ज्यादा टिकाऊ और सुरक्षा के लिहाज से प्रभावी हो सकते हैं।
करेंसी से जुड़े फैसले RBI, वित्त मंत्रालय और केंद्र सरकार की मंजूरी प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं। अभी तक पॉलीमर नोटों को लेकर कोई अंतिम लॉन्च कार्यक्रम या सभी नोटों को बदलने का निर्णय सार्वजनिक नहीं किया गया है। हालांकि, दुनिया में बदलती करेंसी तकनीक, डिजिटल भुगतान के विस्तार और नकली नोटों की चुनौती को देखते हुए आधुनिक करेंसी विकल्पों पर चर्चा जारी रहती है।
नहीं। अगर भविष्य में पॉलीमर नोटों को अपनाया जाता है तो भी यह प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से होगी।
RBI आमतौर पर नई करेंसी को धीरे-धीरे सिस्टम में शामिल करता है। पुराने नोट तुरंत बंद करने जैसी स्थिति नहीं होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पॉलीमर नोटों को अपनाया जाता है तो शुरुआत छोटे मूल्य वर्ग के नोटों से हो सकती है।
संभावित कारण—
इनका इस्तेमाल सबसे ज्यादा होता है
खराब होने की दर अधिक होती है
बार-बार बदलने की जरूरत पड़ती है
इसी वजह से ₹10 और ₹20 जैसे नोट संभावित उम्मीदवार माने जाते हैं।
भारत में डिजिटल पेमेंट तेजी से बढ़ा है, लेकिन नकदी की जरूरत अभी भी बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों, छोटे कारोबार, दैनिक मजदूरी और छोटे लेन-देन में कैश की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसलिए RBI डिजिटल रुपये के साथ-साथ भौतिक करेंसी को भी बेहतर बनाने पर ध्यान दे रहा है।
बहरहाल,भारत में प्लास्टिक करेंसी का विचार नया नहीं है। वर्ष 2012 में इसका परीक्षण किया जा चुका है। अब आधुनिक सुरक्षा तकनीक और बेहतर करेंसी मैनेजमेंट की जरूरत के बीच पॉलीमर नोट फिर चर्चा में हैं। फिलहाल इसे लेकर कोई अंतिम सरकारी घोषणा नहीं हुई है, लेकिन आने वाले वर्षों में भारतीय करेंसी में तकनीकी बदलाव की संभावना बनी हुई है।
Updated on:
11 Aug 2026 06:21 pm
Published on:
11 Aug 2026 06:21 pm
