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यूपी में स्ट्रॉबेरी की खेती: लागत ज्यादा, लेकिन सही बाजार मिले तो लाखों की कमाई; जानें सब्सिडी और तरीका

पारंपरिक फसलों के बीच उत्तर प्रदेश में स्ट्रॉबेरी की खेती का रकबा बढ़ रहा है। फतेहपुर, संभल और इटावा जैसे जिलों में किसान मल्चिंग, ड्रिप और बेहतर पौध के जरिए इसकी खेती कर रहे हैं। जानिए लागत, सरकारी सहायता और खेती का सही तरीका।
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Avaneesh Kumar Mishra

Sep 14, 2026

उत्तर प्रदेश में किसान अब गेहूं, धान और आलू जैसी पारंपरिक फसलों के साथ अधिक मूल्य देने वाली फसलों की ओर भी बढ़ रहे हैं। इनमें स्ट्रॉबेरी प्रमुख है। हाल के वर्षों में फतेहपुर और संभल समेत कई जिलों में किसान इसकी खेती कर रहे हैं। हालांकि, स्ट्रॉबेरी की खेती में शुरुआती खर्च सामान्य फसलों की तुलना में काफी अधिक होता है, इसलिए बाजार, पौध और तकनीक की सही जानकारी जरूरी है।

एक हेक्टेयर में 12–13 लाख तक खर्च, मुनाफा बाजार पर निर्भर

फतेहपुर के जिला उद्यान विभाग के अनुसार, स्ट्रॉबेरी की खेती में एक हेक्टेयर पर करीब 12 से 13 लाख रुपये तक लागत आ सकती है। अनुकूल बाजार भाव मिलने पर प्रति हेक्टेयर करीब 7 से 8 लाख रुपये तक शुद्ध आय संभव बताई गई है। यह आंकड़ा क्षेत्र, पौध, मजदूरी, उत्पादन और बाजार भाव के अनुसार बदल सकता है।

संभल में भी जिला उद्यान विभाग ने एक हेक्टेयर पर करीब 12–13 लाख रुपये लागत और अच्छे भाव पर 7–8 लाख रुपये तक शुद्ध आमदनी की जानकारी दी है। यहां किसानों को दिल्ली की आजादपुर मंडी जैसे बड़े बाजारों की निकटता का फायदा भी मिलता है।

स्ट्रॉबेरी पर कितनी मिलती है सरकारी सहायता?

स्ट्रॉबेरी को मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (MIDH) के तहत लागत-प्रधान फल फसलों में शामिल किया गया है। 2025 की परिचालन गाइडलाइन के अनुसार सामान्य क्षेत्रों में निर्धारित लागत मानक पर 40 प्रतिशत तक सहायता का प्रावधान है और लाभ अधिकतम 2 हेक्टेयर क्षेत्र तक, आनुपातिक आधार पर दिया जा सकता है। वास्तविक लाभ स्वीकृत लागत, पात्रता और राज्य में योजना के क्रियान्वयन पर निर्भर करता है।

इसलिए किसानों को सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों में बताए जा रहे 80 या 90 प्रतिशत अनुदान को स्ट्रॉबेरी की पूरी खेती पर लागू मानकर निवेश नहीं करना चाहिए। किस घटक पर कितनी सहायता मिलेगी, इसकी जानकारी जिले के उद्यान विभाग से लेना जरूरी है।

यूपी में बढ़ रहा है स्ट्रॉबेरी का रकबा

संभल में 2026 में 35 किसानों ने करीब 100 हेक्टेयर में स्ट्रॉबेरी की खेती की। जिले में किसानों को सब्सिडी और तकनीकी प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। फतेहपुर में भी किसान मल्चिंग तकनीक के साथ स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं और लखनऊ व वाराणसी जैसे बाजारों में उपज भेज रहे हैं।

इटावा में भी प्रतिकूल वातावरण को अनुकूल बनाकर स्ट्रॉबेरी की खेती का प्रयोग किया गया है। सरकारी दस्तावेज के अनुसार, वहां स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं ने इस तकनीक को अपनाया और दूसरे किसानों ने भी इसमें रुचि दिखाई।

सितंबर–अक्टूबर में रोपाई, मल्चिंग से मिलेगी मदद

मैदानी क्षेत्रों में स्ट्रॉबेरी की रोपाई आमतौर पर सितंबर–अक्टूबर के आसपास की जाती है। पौध लगाने से पहले खेत की अच्छी तैयारी, मिट्टी में पर्याप्त जैविक पदार्थ और उचित जल निकासी पर ध्यान देना जरूरी है।

मल्चिंग स्ट्रॉबेरी की खेती की महत्वपूर्ण तकनीक है। इससे मिट्टी की नमी बनाए रखने, खरपतवार नियंत्रित करने और फलों को सीधे मिट्टी के संपर्क से बचाने में मदद मिलती है। ड्रिप सिंचाई के जरिए पौधों की जरूरत के अनुसार पानी पहुंचाया जा सकता है।

पौध की गुणवत्ता पर न करें समझौता

स्ट्रॉबेरी की सफल खेती में पौध की गुणवत्ता बेहद महत्वपूर्ण है। रोगमुक्त और अच्छी गुणवत्ता वाली पौध का चयन करें। अलग-अलग क्षेत्रों में पौध की कीमत और उपलब्धता अलग हो सकती है।

उत्तर प्रदेश में कई किसान बाहर के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों से पौध मंगाते हैं। इसलिए पौध खरीदते समय किस्म, स्वास्थ्य और स्रोत की जानकारी जरूर लें। बड़ी मात्रा में पौध खरीदने से पहले स्थानीय उद्यान विभाग या कृषि विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।

मिट्टी की जांच के बाद ही करें खेत तैयार

स्ट्रॉबेरी के लिए अच्छी जल निकासी वाली उपजाऊ मिट्टी बेहतर मानी जाती है। खेत में पानी रुकने से जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए रोपाई से पहले मिट्टी की जांच कराना उपयोगी है।

सड़ी हुई गोबर खाद या अन्य जैविक खाद का इस्तेमाल मिट्टी की संरचना सुधारने में मदद कर सकता है। नीम की खली और जैव-उर्वरकों का प्रयोग भी स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की अनुशंसा के अनुसार किया जा सकता है। केवल किसी एक खाद या जैविक उत्पाद से उत्पादन दोगुना होने का दावा सामान्य रूप से नहीं किया जा सकता।

बाजार पहले तय करें, फिर बड़े क्षेत्र में लगाएं

स्ट्रॉबेरी जल्दी खराब होने वाला फल है। इसलिए खेत से बाजार तक पहुंचने में ज्यादा समय लगने पर गुणवत्ता और कीमत दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

लखनऊ, वाराणसी, दिल्ली और दूसरे बड़े शहरों में मांग मिलने पर किसानों को बेहतर बाजार मिल सकता है। लेकिन स्थानीय भाव, परिवहन खर्च और खरीदार की मांग की जानकारी खेती शुरू करने से पहले जुटाना जरूरी है।

पैकिंग और तुड़ाई में सावधानी जरूरी

स्ट्रॉबेरी की तुड़ाई फल की परिपक्वता के अनुसार करनी चाहिए। फल को चोट लगने से बचाने के लिए सावधानी से तोड़ना और उपयुक्त पैकिंग करना जरूरी है।

प्रीमियम बाजार के लिए आकार, रंग और गुणवत्ता के अनुसार फल की छंटाई की जा सकती है। खेत के आसपास पैकिंग या संग्रह की सुविधा होने से परिवहन के दौरान होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।

किसान ऐसे ले सकते हैं योजना का लाभ

1. जिला उद्यान विभाग से संपर्क करें: अपने जिले में स्ट्रॉबेरी के लिए लागू योजना और अनुदान की वर्तमान जानकारी लें।

2. पात्रता और घटक समझें: पौध, ड्रिप, मल्चिंग या अन्य मदों पर मिलने वाली सहायता को अलग-अलग समझें। हर घटक पर एक जैसी सब्सिडी नहीं होती।

3. पंजीकरण कराएं: संबंधित विभाग की प्रक्रिया के अनुसार किसान पंजीकरण और जरूरी दस्तावेज पूरे करें।

4. मिट्टी की जांच कराएं: मिट्टी की स्थिति के आधार पर खाद और पोषक तत्वों का प्रबंधन करें।

5. पहले बाजार तय करें: फसल लगाने से पहले स्थानीय खरीदार, थोक बाजार, खुदरा विक्रेता या सीधे बिक्री के विकल्प तलाशें।

6. छोटे क्षेत्र से शुरुआत करें: पहली बार खेती करने वाले किसान बड़े निवेश के बजाय सीमित क्षेत्र में तकनीक और बाजार को समझकर रकबा बढ़ा सकते हैं।

सबसे बड़ा जोखिम: लागत और बाजार भाव

स्ट्रॉबेरी की खेती में पौध, मजदूरी, मल्चिंग, सिंचाई, पैकिंग और परिवहन पर खर्च आता है। बाजार भाव में गिरावट आने पर अनुमानित मुनाफा तेजी से घट सकता है। इसलिए केवल दूसरे किसानों की कमाई देखकर निवेश करना सही रणनीति नहीं है।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की एक तकनीकी सामग्री में भी स्ट्रॉबेरी की लागत और शुद्ध आय किस्म और वर्ष के अनुसार अलग पाई गई है। इससे स्पष्ट है कि किसी एक किसान की कमाई को सभी किसानों की सामान्य आय मानना उचित नहीं होगा।

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