
हल्दी केवल मसाला फसल नहीं, बल्कि प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन के कारण किसानों के लिए अच्छी आमदनी का जरिया भी बन सकती है। प्राकृतिक खेती के तरीकों से रासायनिक इनपुट पर निर्भरता घटाकर लागत कम करने की संभावना रहती है। वहीं सही किस्म, मिश्रित खेती और हल्दी को कच्चे प्रकंद के बजाय पाउडर जैसे उत्पाद में बेचने से किसान को अतिरिक्त कीमत मिल सकती है।
हालांकि प्राकृतिक और जैविक खेती को एक जैसा समझना सही नहीं है। दोनों में रासायनिक इनपुट घटाने या उनसे बचने पर जोर है, लेकिन उनकी उत्पादन पद्धतियां और प्रमाणन व्यवस्था अलग हो सकती हैं।
ओडिशा के कंधमाल जिले पर 2026 में प्रकाशित एक अध्ययन में जैविक हल्दी की औसत उपज 7,103.85 किलो प्रति हेक्टेयर और सकल आय करीब ₹4.30 लाख प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई। लाभ-लागत अनुपात 1.92 रहा। अध्ययन में मजदूरी को बड़ी लागत और बाजार तक सीधी पहुंच की कमी को प्रमुख चुनौती बताया गया।
खास बात यह रही कि सीधे प्रसंस्करणकर्ता को बेचने वाले किसानों को पारंपरिक बिचौलिया व्यवस्था की तुलना में बेहतर विपणन दक्षता मिली। यानी हल्दी में फायदा केवल उत्पादन बढ़ाने से नहीं, बिक्री का रास्ता सुधारने से भी जुड़ा है।
नीति आयोग की 2026 की प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण मार्गदर्शिका में महाराष्ट्र के अमरावती जिले के किसान तुलसीराम चतुर का उदाहरण दिया गया है। उन्होंने 0.4 हेक्टेयर में प्राकृतिक और पारंपरिक दोनों तरीकों से हल्दी उगाई।
दोनों पद्धतियों में उत्पादन 25 क्विंटल दर्ज किया गया, लेकिन प्राकृतिक खेती में लागत करीब ₹65,000 रही, जबकि पारंपरिक पद्धति में ₹1 लाख। प्राकृतिक खेती से शुद्ध लाभ ₹3.10 लाख और लाभ-लागत अनुपात 5.8 बताया गया, जबकि पारंपरिक खेती में शुद्ध लाभ ₹2.75 लाख और अनुपात 3.8 था। यह एक किसान-विशेष उदाहरण है, इसलिए इसे हर क्षेत्र की निश्चित कमाई नहीं माना जा सकता।
नीति आयोग की प्राकृतिक खेती मार्गदर्शिका में हल्दी लगाने से पहले अप्रैल में कम से कम नौ प्रकार की दलहन, तिलहन, मोटे अनाज, सब्जी और पत्तेदार फसलों की लाइन बुवाई की सलाह दी गई है।
इसका उद्देश्य खेत में जैव विविधता और जैविक पदार्थ बढ़ाना है। इन फसलों के कुछ हिस्से को घर के उपयोग में लिया जा सकता है और बाकी को चारा, मल्च या खेत में जैव पदार्थ के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
हल्दी छाया को कुछ हद तक सहन कर सकती है। इसलिए इसे फल-बागानों, नारियल और अन्य बहुफसली प्रणालियों में भी लगाया जा सकता है।
नीति आयोग की मार्गदर्शिका में हल्दी और मक्का का 1:2 अनुपात उपयोगी बताया गया है। हल्दी की कतारों के बीच मिर्च, प्याज और बैंगन जैसी फसलें भी ली जा सकती हैं। सूत्रकृमि की समस्या वाले खेतों में गेंदा लगाने का सुझाव है।
मिजोरम में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के क्षेत्रीय केंद्र की मदद से किसानों ने उच्च करक्यूमिन वाली मेघा टरमरिक-1 किस्म और वैज्ञानिक खेती तकनीक अपनाई। 2020 से 2023 के बीच इसकी उपज करीब 12.61 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई।
जल संग्रह, केंचुआ खाद, वैज्ञानिक प्रबंधन और हल्दी पाउडर के रूप में मूल्यवर्धन से किसानों की आमदनी में करीब 50% वृद्धि दर्ज की गई।
आईसीएआर के अनुसार ‘प्रतिभा’ किस्म वर्षा आधारित परिस्थितियों में करीब 225 दिन में तैयार होती है। इसकी औसत ताजी उपज 39.12 टन प्रति हेक्टेयर और सूखी वसूली 18.9% बताई गई है।
इसमें करक्यूमिन 6.25%, ओलियोरेसिन 16.2% और आवश्यक तेल 6.2% तक दर्ज किया गया है। इसलिए यह मसाला उपयोग के साथ प्रसंस्करण और औद्योगिक इस्तेमाल के लिए भी उपयोगी मानी जाती है।
हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में किए गए एक अध्ययन में जैविक पद्धति के तहत ‘पलम पितंबर’ की उपज 32.94 टन प्रति हेक्टेयर और ‘पलम लालिमा’ की 32.35 टन रही। स्थानीय ‘सुकेती हल्दी’ में यह 12.45 टन थी।
‘पलम पितंबर’ में शुद्ध लाभ करीब ₹4.17 लाख प्रति हेक्टेयर और लाभ-लागत अनुपात 5.38 दर्ज किया गया। शोध में नई किस्मों से उपज करीब तीन गुना और लाभ 3 से 4 गुना बढ़ने की बात सामने आई।
तमिलनाडु के एरोड जिले के एक अध्ययन में सामान्य हल्दी खेती की लागत करीब ₹2.50 लाख प्रति हेक्टेयर, सकल आय ₹3.56 लाख और शुद्ध आय करीब ₹1.06 लाख रही। लाभ-लागत अनुपात 1.42 था। यह आंकड़ा प्राकृतिक खेती का नहीं, क्षेत्र की सामान्य आर्थिक स्थिति का उदाहरण है।
एक अलग अध्ययन में जैविक हल्दी का लाभ-लागत अनुपात 1.77 और अजैविक खेती का 1.58 पाया गया।
Updated on:
13 Sept 2026 01:53 pm
Published on:
13 Sept 2026 01:53 pm
