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क्या UP में 2027 से पहले बदल रहा है सत्ता का समीकरण? BJP के लिए सबसे बड़ी चुनौती कौन?

क्या आप जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में 2027 के चुनावों में भाजपा को अपनी सबसे बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है? बूथ स्तर पर मतदाताओं का रुख बदल रहा है, और ये बदलाव सत्ता के समीकरण को पूरी तरह से बदल सकते हैं!
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Avaneesh Kumar Mishra

Sep 14, 2026

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक समीकरण तेजी से दोबारा गढ़े जा रहे हैं। एक तरफ BJP करीब दस साल की सत्ता, मजबूत संगठन, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे और बड़े लाभार्थी नेटवर्क के साथ चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही है। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी 2024 के लोकसभा चुनाव में सफल रहे PDA-पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक-फॉर्मूले को विधानसभा स्तर पर और विस्तार देने में जुटी है।

सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि मुकाबला अब केवल मुस्लिम-यादव बनाम BJP के पारंपरिक हिंदू सामाजिक गठबंधन तक सीमित नहीं है। गैर-यादव OBC, गैर-जाटव दलित, महिलाएं, युवा और छोटे क्षेत्रीय दल 2027 के सत्ता समीकरण में ज्यादा महत्वपूर्ण होते दिखाई दे रहे हैं।

2024 ने BJP को क्यों किया सतर्क?

2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से BJP ने 62 सीटें जीती थीं। 2024 में यह संख्या घटकर 33 रह गई। SP 37 सीटों के साथ राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनी, जबकि कांग्रेस ने छह सीटें जीतीं।

इसी नतीजे के बाद BJP उन विधानसभा क्षेत्रों पर ज्यादा जोर दे रही है जहां 2024 में विपक्ष को बढ़त मिली थी। सितंबर 2026 तक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 44 जिलों के 115 विधानसभा क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं और जनसंपर्क कार्यक्रमों के जरिए पहुंच चुके थे। इनमें से 67 क्षेत्रों में 2024 के लोकसभा चुनाव में SP-कांग्रेस गठबंधन आगे रहा था। यानी पार्टी का लक्ष्य केवल नई सीटें जीतना नहीं बल्कि 2024 में कमजोर पड़े इलाकों को दोबारा मजबूत करना भी है।

BJP के सामने सबसे बड़ा सामाजिक टेस्ट?

2014 के बाद BJP की उत्तर प्रदेश में सफलता का महत्वपूर्ण आधार यादवों से अलग OBC समुदायों को अपने साथ जोड़ना रहा है। कुर्मी, मौर्य, कुशवाहा, शाक्य, सैनी, निषाद, राजभर और दूसरी पिछड़ी जातियों में पार्टी और उसके सहयोगियों ने अलग-अलग प्रभाव बनाया। लेकिन SP अब इसी हिस्से में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है।

SP ने अपने PDA अभियान में गैर-यादव पिछड़ों को ज्यादा राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने पर जोर दिया है। दूसरी ओर BJP ने भी OBC मोर्चे की गतिविधियां बढ़ाई हैं और गैर-यादव OBC समर्थन को मजबूत करने को 2027 की प्राथमिकताओं में रखा है।

हाल की निषाद राजनीति बताती है कि यह मुकाबला कितना संवेदनशील है। NDA सहयोगी निषाद पार्टी और SP दोनों इस समुदाय तक अपनी पहुंच बढ़ा रहे हैं। सितंबर 2026 की राजनीतिक घटनाओं ने निषाद प्रतिनिधित्व को फिर चुनावी बहस के केंद्र में ला दिया।

दलित वोट: BSP कमजोर हुई तो वोट जाएगा कहां?

दलित वोट 2027 का दूसरा बड़ा खुला मैदान है। BSP का संगठन और मायावती का आधार अभी भी महत्वपूर्ण है, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी उत्तर प्रदेश में कोई सीट नहीं जीत सकी। दूसरी ओर आजाद समाज पार्टी ने नगीना सीट जीती।

SP अब जाटव और गैर-जाटव दोनों दलित समूहों तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है। पार्टी के छात्र संगठन में नीले रंग को प्रमुखता देने और दलित क्षेत्रों में ‘संविधान बचाओ PDA जन पंचायत’ जैसे अभियान इसी रणनीति का हिस्सा हैं।

BJP के लिए चुनौती यह होगी कि उसका गैर-जाटव दलित आधार कितना स्थिर रहता है और SP, BSP तथा आजाद समाज पार्टी के बीच दलित मत किस तरह बंटते हैं।

महिला वोट अब अलग चुनावी ताकत

2027 में जातीय गणित के साथ महिला मतदाता भी स्वतंत्र चुनावी समूह के रूप में उभर रही हैं। उत्तर प्रदेश में करीब 6.09 करोड़ महिला मतदाता हैं, जो कुल मतदाताओं का लगभग 45.46 प्रतिशत हैं।

BJP महिला सुरक्षा, राशन, आवास, उज्ज्वला, महिला स्वयं सहायता समूहों और परिवहन जैसी योजनाओं के जरिए इस आधार को बनाए रखना चाहती है। हाल में सरकार ने वृद्ध महिलाओं के लिए बस यात्रा और महिला-केंद्रित दूसरे कार्यक्रम भी आगे बढ़ाए हैं।

SP ने इसके जवाब में सत्ता में आने पर जरूरतमंद महिलाओं को सालाना 40 हजार रुपए देने वाली ‘स्त्री सम्मान समृद्धि योजना’ का प्रस्ताव सामने रखा है।

यानी 2027 में सवाल केवल यह नहीं होगा कि महिलाएं किस जाति से आती हैं, बल्कि यह भी कि महंगाई, रोजगार, सुरक्षा और सीधे आर्थिक लाभ पर वे किस दल को प्राथमिकता देती हैं।

छोटे दल BJP की ताकत भी, चुनौती भी

BJP के साथ उत्तर प्रदेश में अपना दल (सोनेलाल), RLD, SBSP और निषाद पार्टी जैसे सहयोगी हैं। इन दलों का महत्व उनके कुल वोट प्रतिशत से ज्यादा कुछ खास सामाजिक समूहों और क्षेत्रों में प्रभाव के कारण है।

2027 से पहले सहयोगी दल ज्यादा सीटों और अपने पारंपरिक क्षेत्र से बाहर हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं। जुलाई 2026 में BJP नेतृत्व के साथ बैठक में सहयोगियों ने सीटों के साथ जमीनी समन्वय का मुद्दा भी उठाया था।

यहीं BJP की दोहरी चुनौती है-सहयोगियों को पर्याप्त राजनीतिक हिस्सेदारी देना और अपनी सीटों की संख्या पर ज्यादा समझौता भी न करना।

चुनावी फैक्टरBJP के लिए स्थितिSP की रणनीति2027 में खतरा/अवसर
गैर-यादव OBCपुराना मजबूत आधार, सहयोगी दलों का सहाराPDA में ज्यादा प्रतिनिधित्ववोट में छोटी सेंध भी कई सीटें बदल सकती है
दलित वोटगैर-जाटव समूहों पर पकड़ बनाए रखने की कोशिशजाटव व गैर-जाटव दोनों पर फोकसBSP और ASP की भूमिका निर्णायक
महिला वोटयोजनाएं, सुरक्षा और लाभार्थी मॉडल₹40,000 सालाना सहायता का प्रस्तावजाति से अलग नया चुनावी मुकाबला
छोटे दलNDA की सामाजिक पहुंच बढ़ाते हैंउनके आधार में सेंध की कोशिशसीट बंटवारा और स्थानीय नाराजगी महत्वपूर्ण
एंटी-इंकम्बेंसीकरीब दस वर्ष की सरकार का बोझस्थानीय मुद्दों को सरकार के खिलाफ मोड़नाउम्मीदवार चयन सबसे बड़ा बचाव बन सकता है

क्या एंटी-इंकम्बेंसी BJP का सबसे बड़ा खतरा?

सितंबर 2026 में प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक BJP के आंतरिक आकलन में बड़ी संख्या में मौजूदा विधायकों के खिलाफ स्थानीय असंतोष की बात सामने आई है और पार्टी बड़े स्तर पर टिकट बदलने पर विचार कर सकती है। इसे आधिकारिक उम्मीदवार सूची नहीं माना जा सकता, लेकिन इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि पार्टी स्थानीय एंटी-इंकम्बेंसी को गंभीरता से ले रही है।

यहां फर्क समझना जरूरी है। मतदाता मुख्यमंत्री या केंद्र सरकार से संतुष्ट हो सकता है, लेकिन अपने विधायक से नाराज भी हो सकता है। ऐसे में उम्मीदवार बदलकर BJP स्थानीय नाराजगी को सरकार विरोधी वोट में बदलने से रोकने की कोशिश कर सकती है।

PDA की असली परीक्षा विधानसभा चुनाव में

2024 में SP की रणनीति सफल रही, लेकिन विधानसभा चुनाव ज्यादा स्थानीय होता है। यहां उम्मीदवार, जातीय उप-समूह, ग्राम और बूथ नेटवर्क तथा क्षेत्रीय नेता ज्यादा प्रभाव डालते हैं।

SP के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या मुस्लिम-यादव आधार के साथ जो गैर-यादव OBC और दलित मतदाता 2024 में उसके करीब आए, वे 2027 में भी साथ रहेंगे। पार्टी की हाल की दलित और गैर-यादव OBC पहुंच दिखाती है कि अखिलेश यादव इस कमजोरी को पहचानते हैं।

2027 के पांच बड़े संकेत

  • BJP की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ SP नहीं, अपने सामाजिक गठबंधन को बचाना है।
  • गैर-यादव OBC का छोटा-सा झुकाव दर्जनों करीबी सीटों का गणित बदल सकता है।
  • दलित मतों में BSP और आजाद समाज पार्टी तीसरा कोण बनाए रखेंगे।
  • महिला मतदाता पहली बार इतनी स्पष्ट रूप से अलग चुनावी प्रतिस्पर्धा के केंद्र में हैं।
  • SP के PDA की असली परीक्षा लोकसभा की सफलता को 403 विधानसभा सीटों के स्थानीय गणित में बदलने की होगी।

2027 की तस्वीर इसलिए अभी एकतरफा नहीं कही जा सकती। BJP के पास संगठन, सत्ता, लाभार्थी नेटवर्क और सहयोगी दलों का मजबूत ढांचा है। SP के पास 2024 के नतीजों से मिला राजनीतिक आत्मविश्वास और PDA का नया सामाजिक प्रयोग है।

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