
उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में लंबे समय तक कुछ बड़े सामाजिक समीकरणों की चर्चा होती रही-मुस्लिम-यादव, गैर-यादव OBC, जाटव और गैर-जाटव दलित। लेकिन 2027 विधानसभा चुनाव की तरफ बढ़ते प्रदेश में इन पुराने खांचों के भीतर ही नया मुकाबला शुरू हो गया है।
अब राजनीतिक दल किसी समुदाय को एकमुश्त ‘वोट बैंक’ मानकर नहीं चल रहे। कुर्मी, मौर्य, कुशवाहा, शाक्य, सैनी, निषाद जैसे OBC समूहों से लेकर पासी, वाल्मीकि और दूसरे दलित समूहों तक अलग-अलग पहुंच बनाई जा रही है। दूसरी तरफ मुस्लिम राजनीति के भीतर पसमांदा समुदाय भी BJP की रणनीति में अलग जगह बना रहा है।
इस नए मुकाबले के केंद्र में BJP और समाजवादी पार्टी हैं। BJP अपने पुराने गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित गठजोड़ को फिर मजबूत करना चाहती है, जबकि SP 2024 में सफल रहे PDA यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक प्रयोग को और बड़ा करना चाहती है।
2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीतीं और कांग्रेस के साथ INDIA गठबंधन ने कुल 43 सीटें हासिल कीं। BJP 33 सीटों पर सिमट गई। इस नतीजे ने सबसे बड़ा सवाल BJP के उस सामाजिक गठबंधन पर खड़ा किया जिसने 2014 के बाद लगातार गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित मतदाताओं के बीच पार्टी को मजबूत किया था।
SP ने 2024 में उम्मीदवार चयन में भी बड़ा बदलाव किया। पार्टी ने केवल पांच यादव उम्मीदवार उतारे, जबकि 27 टिकट गैर-यादव OBC उम्मीदवारों को दिए। SC आरक्षित सीटों पर 15 दलित उम्मीदवार उतारे गए। यह रणनीति SP को केवल ‘मुस्लिम-यादव’ पार्टी की पहचान से बाहर निकालने की कोशिश थी। अब 2027 में यही प्रयोग विधानसभा स्तर तक ले जाने की तैयारी दिखाई दे रही है।
उत्तर प्रदेश में OBC आबादी कई जातियों और क्षेत्रीय समूहों में बंटी हुई है। यही वजह है कि किसी एक दल के लिए पूरे OBC वोट को एक साथ नियंत्रित करना आसान नहीं है।
BJP की पिछले एक दशक की रणनीति यादवों से अलग OBC समूहों को नेतृत्व, टिकट और सहयोगी दलों के जरिए अपने साथ जोड़ने की रही है। 2027 से पहले पार्टी ने इस मोर्चे पर फिर गतिविधियां तेज की हैं। अगस्त 2026 में BJP के OBC मोर्चे ने सार्वजनिक रूप से गैर-यादव OBC समर्थन को मजबूत करने पर जोर दिया। संगठन में कुर्मी नेताओं की महत्वपूर्ण नियुक्तियों को भी इसी सामाजिक संतुलन से जोड़कर देखा जा रहा है। लेकिन अब SP इसी जमीन पर BJP को चुनौती दे रही है।
सपा ने सैनी, कुशवाहा, शाक्य, गुर्जर जैसे समुदायों के बीच PDA चौपालों और क्षेत्रीय संपर्क की रणनीति बनाई है। निषाद मतदाताओं को लेकर भी मुकाबला तेज हुआ है। सितंबर 2026 की राजनीतिक घटनाओं में BJP सहयोगी निषाद पार्टी से लेकर SP तक, दोनों ओर के नेताओं ने निषाद समुदाय तक पहुंच बढ़ाई।
यानी 2027 में सिर्फ ‘OBC बनाम अगड़ा’ जैसा सीधा समीकरण नहीं, बल्कि OBC के भीतर कौन कितने समूह जोड़ता है, यह अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।
2024 में उत्तर प्रदेश की 17 SC आरक्षित लोकसभा सीटों में BJP ने आठ, SP ने सात और कांग्रेस ने एक सीट जीती। 2019 में BJP ने इनमें 15 सीटें जीती थीं। इसलिए दलित मतों में हुई हलचल ने BJP और SP दोनों को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर किया।
BJP ने संत रविदास से जुड़े बड़े संपर्क अभियान की शुरुआत की है। जुलाई 2026 से फरवरी 2027 तक चलने वाले ‘श्री गुरु रविदास महाराज समरसता संकल्प अभियान’ के जरिए गांवों तक पहुंच बनाने की योजना है। इसके साथ ही राज्य में आंबेडकर और दूसरे सामाजिक न्याय के प्रतीकों से जुड़े स्थलों के विकास पर भी फोकस किया गया है।
SP भी दलित प्रतिनिधित्व को PDA का केंद्रीय हिस्सा बना रही है। पार्टी की योजना SC आरक्षित सीटों के अलावा करीब 14 सामान्य सीटों पर भी दलित उम्मीदवार उतारने की बताई गई है। सितंबर में समाजवादी छात्र सभा के लिए नीले रंग की ड्रेस अपनाना भी आंबेडकरवादी और दलित राजनीतिक प्रतीकों तक पहुंच के संकेत के रूप में देखा गया।
इस मुकाबले में BSP और आजाद समाज पार्टी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए दलित मतों की लड़ाई केवल BJP बनाम SP नहीं, बल्कि कई ध्रुवों वाली रह सकती है।
BJP की मुस्लिम मतदाताओं तक पहुंच की रणनीति में पसमांदा मुस्लिमों को अलग सामाजिक समूह के रूप में संबोधित करना महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
2026 में BJP अल्पसंख्यक मोर्चा ने पूर्वांचल के पावरलूम और कारीगर बहुल क्षेत्रों में सदस्यता तथा सीधे संपर्क अभियान तेज किए। पार्टी कल्याणकारी योजनाओं, ODOP, रोजगार और छोटे कारोबार से जुड़े मुद्दों के जरिए पसमांदा समूहों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है।
अगस्त 2026 में BJP अल्पसंख्यक मोर्चा नेतृत्व ने करीब 100 ऐसी विधानसभा सीटों पर विशेष ध्यान देने की बात कही जहां मुस्लिम मतदाताओं के साथ राजपूत, गुर्जर, जाट और त्यागी जैसे समूह भी चुनावी रूप से महत्वपूर्ण हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि मुस्लिम मतों में कोई बड़ा बदलाव पहले से तय है। BJP के लिए यहां रणनीति पूरे समुदाय का समर्थन हासिल करने से ज्यादा कुछ हिस्सों में अपना वोट प्रतिशत बढ़ाकर करीबी मुकाबलों का गणित बदलने की भी हो सकती है।
SP के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि 2024 का PDA गठबंधन विधानसभा चुनाव में भी कायम रहे। अखिलेश यादव लगातार PDA को पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक से आगे व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। हाल के महीनों में उन्होंने ब्राह्मणों तक पहुंच के लिए भी PDA की राजनीतिक व्याख्या को विस्तार दिया है।
यानी रणनीति साफ है-मुस्लिम और यादव आधार को बनाए रखते हुए गैर-यादव OBC, दलित और असंतुष्ट अगड़े समूहों को जोड़ना।
| सामाजिक समूह | BJP की रणनीति | SP की रणनीति | 2027 में क्यों अहम |
|---|---|---|---|
| कुर्मी-मौर्य-कुशवाहा-शाक्य-सैनी | संगठन और नेतृत्व में प्रतिनिधित्व, OBC मोर्चा | PDA चौपाल, उम्मीदवार और स्थानीय नेता | गैर-यादव OBC में सीधा मुकाबला |
| निषाद-मल्लाह समूह | निषाद पार्टी गठबंधन और सरकारी प्रतिनिधित्व | निषाद नेताओं से संपर्क, PDA में हिस्सेदारी | पूर्वांचल की कई सीटों पर प्रभाव |
| जाटव दलित | आंबेडकर-रविदास प्रतीक और योजनाएं | BSP से खिसकते वोट पर नजर | BSP की ताकत तय करेगी मुकाबला |
| पासी/गैर-जाटव दलित | सामाजिक संपर्क और लाभार्थी नेटवर्क | टिकट व PDA प्रतिनिधित्व | अवध और मध्य यूपी में अहम |
| पसमांदा मुस्लिम | अल्पसंख्यक मोर्चा, कारीगर और लाभार्थी संपर्क | व्यापक PDA-अल्पसंख्यक गठजोड़ | करीबी सीटों पर छोटा बदलाव भी निर्णायक |
उत्तर प्रदेश का अगला चुनाव केवल मुस्लिम वोट, यादव वोट या दलित वोट के आधार पर समझना मुश्किल होगा। असली मुकाबला बड़ी जातियों से ज्यादा उनके बीच मौजूद छोटे और मध्यम सामाजिक समूहों को जोड़ने का बनता जा रहा है।
BJP के सामने चुनौती अपने गैर-यादव OBC + गैर-जाटव दलित + अगड़ा गठजोड़ में आई दरारों को भरने की है। SP की चुनौती अपने PDA प्रयोग को लोकसभा चुनाव से विधानसभा चुनाव तक टिकाऊ गठबंधन में बदलने की है।
इसीलिए 2027 में उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा सवाल शायद यह होगा-कौन-सा दल सबसे बड़ा वोट बैंक बनाता है, यह नहीं; बल्कि कौन सबसे ज्यादा छोटे वोट समूहों को एक बड़े राजनीतिक गठबंधन में जोड़ पाता है?
Updated on:
14 Sept 2026 08:40 am
Published on:
14 Sept 2026 08:40 am
