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अतीक-मुख्तार के बाद यूपी में बदल गया माफिया मॉडल? बंदूक से कारोबार तक पहुंचा अपराध का नेटवर्क

क्या आप जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में माफिया-राज खत्म होने के बाद अपराध का चेहरा कितना बदल चुका है? अब अपराधी सीधे कारोबार में उतर आए हैं, लेकिन उनकी चालें और भी चालाक हो गई हैं। जानिए, ये नए अपराधी मॉडल आपके आस-पास कैसे सक्रिय हैं!
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Avaneesh Kumar Mishra

Sep 14, 2026

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक दौर ऐसा था जब ‘बाहुबली’ की पहचान बहुत साफ होती थी-काफिले में गाड़ियां, हथियारबंद समर्थक, चुनावी मैदान में सीधी मौजूदगी और ठेके से लेकर जमीन तक दबदबा। अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी इसी पुराने मॉडल के सबसे चर्चित चेहरों में रहे। लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव की तरफ बढ़ते उत्तर प्रदेश में सवाल अब यह है कि क्या पुराने माफिया नेटवर्क खत्म हो चुके हैं या अपराध ने अपना चेहरा बदल लिया है?

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 की शुरुआत में होने हैं और भाजपा पहले से उन सीटों पर खास फोकस बढ़ा रही है जहां 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे नुकसान हुआ था। ऐसे में कानून-व्यवस्था एक बार फिर बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनने की संभावना रखती है।

अब ‘बाहुबली’ का मतलब सिर्फ बंदूक नहीं

हाल के मामलों को देखें तो संगठित अपराध का नया मॉडल पहले के मुकाबले अधिक आर्थिक और नेटवर्क आधारित दिखाई देता है। जमीन की खरीद-बिक्री, अवैध प्लॉटिंग, खनन और खनिज परिवहन, सरकारी या निजी ठेके, कंपनियां, बेनामी संपत्ति और साइबर नेटवर्क इसके नए माध्यम बन सकते हैं।

यानी किसी नेटवर्क को प्रभाव बनाने के लिए जरूरी नहीं कि उसका मुखिया खुद विधायक बने या खुले तौर पर हथियारबंद गिरोह चलाता दिखाई दे। कारोबारी संस्थाएं, रिश्तेदार, सहयोगी, स्थानीय एजेंट और डिजिटल माध्यम मिलकर एक ऐसा ढांचा बना सकते हैं जिसमें मुख्य व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई होने के बाद भी आर्थिक गतिविधियां चलती रहें।

इसका एक संकेत प्रयागराज में मिलता है। जुलाई 2026 में पुलिस ने अतीक अहमद से कथित रूप से जुड़ी करीब 110 करोड़ रुपए की बेनामी संपत्तियां कुर्क कीं। इससे पहले मई में प्रशासन ने अतीक से जब्त लगभग 100 बीघा जमीन का दोबारा सर्वे कराने का फैसला किया था क्योंकि वहां कथित अवैध प्लॉटिंग और बिक्री की शिकायतें सामने आई थीं।

चेहरा खत्म, लेकिन नेटवर्क क्यों बच सकता है?

संगठित अपराध की सबसे बड़ी ताकत उसके मुखिया से ज्यादा उसका आर्थिक ढांचा होता है। जमीन किसी सहयोगी के नाम हो सकती है, कारोबार किसी रिश्तेदार के पास, वाहन किसी कंपनी के नाम और पैसा अलग-अलग खातों या संस्थाओं से घूम सकता है।

सितंबर 2026 में बाराबंकी की गैंगस्टर कोर्ट ने मुख्तार अंसारी गैंग से जुड़े बताए गए एक व्यक्ति की करीब 43 करोड़ रुपए की सोनभद्र स्थित संपत्तियों की कुर्की बरकरार रखी। पुलिस का आरोप था कि संपत्तियों का एक हिस्सा परिवार के सदस्यों के नाम दर्ज था।

सहारनपुर में भी प्रशासन ने फरवरी 2026 में पूर्व बसपा एमएलसी हाजी इकबाल से कथित रूप से जुड़ी 56 संपत्तियों पर कार्रवाई शुरू की थी। पुलिस के अनुसार संपत्तियां परिवार के सदस्यों, सहयोगियों और कई कंपनियों के नाम पर थीं। ये आरोप और कार्रवाई अभी संबंधित कानूनी प्रक्रियाओं के अधीन हैं।

यही नए अपराध मॉडल की चुनौती है-एक व्यक्ति को पकड़ना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन जमीन, कंपनियों, बैंक लेन-देन और सहयोगियों का पूरा नेटवर्क साबित करना अधिक कठिन।

किन इलाकों पर रहेगी नजर?

क्षेत्रउभरता/बचा हुआ नेटवर्क पैटर्नक्यों महत्वपूर्ण
प्रयागराजबेनामी जमीन, अवैध प्लॉटिंग, पुराने गिरोहों की संपत्तिअतीक नेटवर्क से जुड़ी संपत्तियों पर 2026 में भी कार्रवाई जारी
गाजीपुर-मऊ-भदोही-पूरब का बेल्टपुराने राजनीतिक-अपराध नेटवर्क से जुड़ी आर्थिक संपत्तियांभदोही के पूर्व विधायक विजय मिश्रा से कथित रूप से जुड़ी महाराष्ट्र की करीब ₹100 करोड़ की संपत्ति तक यूपी पुलिस की कार्रवाई पहुंची
सोनभद्रजमीन, खनिज परिवहन और संपत्ति नेटवर्क2026 में फर्जी मिनरल ट्रांसपोर्ट परमिट के एक बड़े रैकेट का पुलिस ने खुलासा किया
सहारनपुर-पश्चिमी यूपीजमीन और कंपनियों के जरिए संपत्ति संरचनापरिवार, सहयोगियों और कथित शेल कंपनियों के नाम संपत्तियों की जांच/कुर्की कार्रवाई सामने आई
नोएडा-गाजियाबादसाइबर फ्रॉड, कॉल सेंटर और डिजिटल आर्थिक नेटवर्क2026 में हजारों सिम, बैंक खातों और कॉल-सेंटर आधारित साइबर गिरोहों के मामले सामने आए

डिजिटल नेटवर्क नया ‘इलाका’ कैसे बन रहा है?

पुराने बाहुबली की ताकत किसी थाना क्षेत्र, तहसील या विधानसभा क्षेत्र में मापी जाती थी। साइबर अपराध में यह सीमा लगभग खत्म हो जाती है।

मई 2026 में कानपुर पुलिस और साइबर सेल ने एक ऐसे कथित फ्रॉड नेटवर्क का खुलासा किया जिसमें 12 हजार से ज्यादा सिम कार्ड, बैंक कार्ड, बायोमेट्रिक उपकरण और व्हाट्सऐप बॉट बरामद होने की बात पुलिस ने कही। जुलाई में गाजियाबाद में एटीएम और कैश डिपॉजिट मशीनों को ऐप-कंट्रोल्ड उपकरण से निशाना बनाने वाले अंतरराज्यीय गिरोह के सदस्यों की गिरफ्तारी हुई।

इसलिए भविष्य का संगठित अपराध सिर्फ जमीन पर कब्जा करने वाला नेटवर्क नहीं, बल्कि डेटा, सिम, बैंक खाते और डिजिटल पहचान नियंत्रित करने वाला नेटवर्क भी हो सकता है।

पुलिस की कार्रवाई के बावजूद नेटवर्क क्यों नहीं टूटते?

इसके चार प्रमुख कारण समझे जा सकते हैं:

  • बेनामी संपत्ति: असली लाभार्थी और कानूनी मालिक अलग हो सकते हैं।
  • कई स्तर के सहयोगी: मुख्य आरोपी के बाद कारोबार रिश्तेदार, मैनेजर या स्थानीय एजेंट संभाल सकते हैं।
  • वैध-अवैध कारोबार का मिश्रण: जमीन, ट्रांसपोर्ट या कंपनियों में वैध कारोबार के भीतर कथित अवैध कमाई साबित करना मुश्किल होता है।
  • कमजोर जांच का जोखिम: गैंगस्टर एक्ट लगाने भर से अदालत में अपराध सिद्ध नहीं होता।

इस आखिरी बिंदु पर अदालतों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। दिसंबर 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था कि छोटे अपराधियों पर कानून लगाने के बजाय वास्तविक संगठित अपराध-नारकोटिक्स, वित्तीय धोखाधड़ी और लैंड माफिया—से निपटने के लिए व्यवस्थित नीति जरूरी है। अगस्त 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने भी एक मामले में यूपी गैंगस्टर्स एक्ट की संरचना और उसके संभावित दुरुपयोग पर गंभीर टिप्पणी की।

2027 चुनाव में असली सवाल क्या होगा?

सत्तारूढ़ भाजपा ‘माफिया के खिलाफ कार्रवाई’ को अपनी कानून-व्यवस्था की उपलब्धियों में प्रमुखता से रखती रही है। लेकिन चुनाव से पहले बहस केवल यह नहीं होगी कि कितने बड़े चेहरे जेल गए या कितनी संपत्ति जब्त हुई। असल कसौटी यह होगी कि क्या अपराध की आर्थिक जड़ें भी कमजोर हुईं?

अतीक और मुख्तार जैसे बेहद दिखाई देने वाले राजनीतिक-बाहुबली मॉडल की जगह अगर छोटे-छोटे जमीन, ठेका, खनन, कारोबार और डिजिटल नेटवर्क ले रहे हैं, तो यूपी में ‘बाहुबली युग’ खत्म नहीं बल्कि विकेंद्रीकृत हो सकता है।

यानी नया बाहुबली जरूरी नहीं कि विधानसभा में बैठे। उसका प्रभाव किसी कंपनी, जमीन के सौदे, ट्रांसपोर्ट नेटवर्क, ठेके या मोबाइल स्क्रीन के पीछे भी छिपा हो सकता है।

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