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आयोडीन युक्त नमक से AIIMS तक, कौन थे वुलिमिरी रामलिंगास्वामी, जिन्होंने रखी भारत की सेहत बदलने की नींव

Vulimiri Ramalingaswami Birth Anniversary : 8 अगस्त को भारत के महान वैज्ञानिक डॉ. वुलिमिरी रामलिंगास्वामी की जयंती है। जानिए कैसे उनके शोध ने आयोडीन की कमी और कुपोषण से लड़कर भारतीय चिकित्सा क्षेत्र में क्रांति ला दी।
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Vulimiri Ramalingaswami Birth Anniversary

Vulimiri Ramalingaswami Birth Anniversary

वुलिमिरी रामलिंगास्वामी की कहानी आज, 8 अगस्त की तारीख से जुड़ी है। इसी दिन, 1921 में, आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम में उनका जन्म हुआ था। आज उनकी जयंती पर हम एक ऐसे वैज्ञानिक को याद करते हैं, जिन्होंने भारतीय चिकित्सा और पोषण विज्ञान में स्थायी बदलाव लाया। उनके जीवन और योगदान की यह कहानी न केवल इतिहास में आज की तारीख से जुड़ती है, बल्कि हमें यह भी बताती है कि कैसे एक व्यक्ति की दूरदर्शिता ने लाखों लोगों की सेहत को बेहतर बनाया।

वुलिमिरी रामलिंगास्वामी का जन्म 8 अगस्त 1921 को श्रीकाकुलम, आंध्र प्रदेश में हुआ था। उनके पिता वि. गुम्पास्वामी एक सरकारी अधिकारी थे और परिवार में शिक्षा का माहौल था। उन्होंने एमबीबीएस (1944) और एमडी (1946) की पढ़ाई आंध्र मेडिकल कॉलेज, विशाखापत्तनम से पूरी की, और फिर ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से डी.फिल. (1951) और डी.एससी. (1967) की उपाधियां प्राप्त कीं।

नमक में आयोडीन मिलाने की रखी नींव

स्वदेश लौटने के बाद, उन्होंने पोषण संबंधी विकारों पर गहन शोध शुरू किया। हैदराबाद में नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन में उन्होंने प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण, आयोडीन की कमी, पोषण संबंधी एनीमिया और उष्णकटिबंधीय यकृत रोगों पर काम किया। उन्होंने हिमालयी क्षेत्र में गॉइटर की जांच की और पाया कि सामान्य नमक में आयोडीन मिलाने से यह समस्या काफी हद तक कम हो सकती है। इस काम ने राष्ट्रीय आयोडीन कमी विकार नियंत्रण कार्यक्रम की नींव रखी।

10 साल तक रहे AIIMS के प्रमुख

1969 से 1979 तक उन्होंने ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) के निदेशक और पैथोलॉजी विभाग के प्रमुख के रूप में कार्य किया। इस दौरान उन्होंने कई नए विभाग और केंद्र स्थापित किए, जैसे कार्डियो-थोरेसिक सेंटर, न्यूरोसाइंसेस सेंटर, कम्युनिटी मेडिसिन, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी, ह्यूमन न्यूट्रिशन, एंडोक्रिनोलॉजी, बायोटेक्नोलॉजी आदि। 1979 में उन्हें इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) का महानिदेशक नियुक्त किया गया, जहां उन्होंने शोध कार्यक्रमों में कड़ा सहकर्मी समीक्षा प्रणाली लागू की और क्षेत्रीय मेडिकल रिसर्च केंद्रों की स्थापना की।

अभूतपूर्व योगदान के लिए मिले कई पुरस्कार

उनके योगदान के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले: 1965 में शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार (चिकित्सा विज्ञान), 1969 में पद्मश्री, बाद में पद्मभूषण और पद्मविभूषण, 1976 में लियोन बर्नार्ड फाउंडेशन अवॉर्ड, और रॉयल सोसायटी ऑफ लंदन की सदस्यता। इसके अलावा उन्हें इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी का अध्यक्ष (1979–80), WHO और UNICEF में सलाहकार, और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का अवसर मिला।

UNICEF में बच्चों और माताओं के स्वास्थ्य पर दिया जोर

उन्होंने पोषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संबंध को स्पष्ट किया। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के लिए उन्होंने 1992 में रोम में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय पोषण सम्मेलन के सचिव-जनरल के रूप में काम किया। UNICEF में उन्होंने बालक और माताओं के स्वास्थ्य पर जोर दिया और विकासशील देशों में स्वास्थ्य नीतियों को आकार देने में मदद की।

रामलिंगास्वामी ने भारतीय चिकित्सा शिक्षा, शोध और सार्वजनिक स्वास्थ्य की नींव मजबूत की। उनके प्रयासों से आयोडीन और प्रोटीन कुपोषण जैसी समस्याओं पर राष्ट्रीय स्तर पर नियंत्रण संभव हुआ। AIIMS और ICMR में उनके नेतृत्व ने संस्थागत क्षमता को बढ़ाया और शोध की गुणवत्ता में सुधार किया। आज, उनकी जयंती पर यह याद रखना जरूरी है कि उनका काम सिर्फ एक वैज्ञानिक की उपलब्धि नहीं, बल्कि लाखों लोगों की जिंदगी में बदलाव लाने वाला योगदान था।

आज के दिन, जब हम उनके जन्मदिन पर उन्हें याद करते हैं, तो यह भी सोचना चाहिए कि उनकी दूरदर्शिता और मेहनत ने हमें क्या सिखाया। हमें यह समझना चाहिए कि स्वास्थ्य और पोषण पर निरंतर काम और नीति निर्माण का असर कितना गहरा हो सकता है। अगला कदम यह हो सकता है कि हम उनके मॉडल को अपनाकर आज की चुनौतियों जैसे माइक्रोन्यूट्रिएंट की कमी, मातृ-शिशु स्वास्थ्य, और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं पर काम करें। रामलिंगास्वामी की तरह, हमें भी विज्ञान और नीति को जोड़कर समाज में बदलाव लाने की दिशा में काम करना चाहिए।