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राजगढ़ के 450 बुनकर बुन रहे सपने, दिहाड़ी कम फिर भी विरासत बचाने की जद्दोजहद

Rajgarh 450 Weavers : हाथों के हुनर को प्रदेश ही नहीं, देशभर में मिल रही पहचान। लेकिन बढ़ती लागत और बाजार की चुनौतियों से जूझ रही परंपरा। नई पीढ़ी को रुचि नहीं, कुछ परिवारों तक सिमट रही हाथों की कलाकारी।
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Rajgarh 450 Weavers

Rajgarh 450 Weavers (राजगढ़ के 450 बुनकर बुन रहे सपने Photo Source- Input)

Rajgarh News : मशीनों के बढ़ते दौर में भी मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के ब्यावरा के अंतर्गत आने वाले सारंगपुर - पड़ाना के बुनकर अपने हाथों के हुनर से परंपरा की डोर थामे हुए हैं। पीढ़ियों से चली आ रही हथकरघा कला आज भी कई परिवारों की आजीविका का आधार बनी हुई है। यहां तैयार होने वाले वस्त्र अपनी महीन बुनाई, गुणवत्ता और पारंपरिक डिजाइन के चलते प्रदेश के सा ही देश के विभिन्न बाजारों तक पहुंच रहे हैं। यहां आज भी करघा की आवाज पहचान बनी हुई है।

हालांकि, इस पहचान को बनाए रखने के लिए अब कुछ ही परिवार जद्दोजहद कर रहे हैं। जिले में दस साल पहले जहां दो हजार बुनकर हुआ करते थे, वहीं अब ये सिर्फ 450 पर ही सिमट गए हैं। साथ ही, कच्चे माल की बढ़ती कीमत, मशीन से बने सस्ते कपड़ों की प्रतिस्पर्धा, नाममात्र दिहाड़ी के साथ सीमित मुनाफा और नई पीढ़ी का अन्य रोजगारों की ओर रुझान बुनकरों के सामने बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है। कई परिवारों का कहना है कि, मेहनत के अनुरूप आय नहीं मिलने से युवा इस पुश्तैनी व्यवसाय को अपनाने से कतरा रहे हैं। लेकिन, सारंगपुर - पड़ाना के बुनकर हैंडलूम नहीं बुन रहे, बल्कि हाथों की कला का भविष्य बचा रहे हैं।

पड़ाना की बेडशीट और सारंगपुर की साड़ी की डिमांड

जिले में हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योग सिर्फ सारंगपुर - पड़ाना इलाके में ही सिमटकर रह गया है। हालांकि, पड़ाना की बैडशीट और सारंगपुर की साड़ी की डिमांड अच्छी है। खासकर पड़ाना की हैंडमेड बैडशीट जिले समेत प्रदेश के अलग अलग शहरों से लेकर दिल्ली तक पहुंच रही है। कई जगह प्रदर्शनी में भी इसकी सराहना होती है। इसके अलावा पिलो कवर, गॉज, बैंडेज, मेडिकल चादर, राजस्थानी पगड़ी, रुमाल, सलवार - सूट आदि का भी निर्माण करते हैं।

हर साल जिले में 2 करोड़ का टर्नओवर

4 हथकरघा समितियां, दस स्व - सहायता ईकाइयां और दो से तीन निजी उद्योगों के जरिए हाथों की कलाकारी को जिले में जीवित रखे हुए हैं। हर साल करीब 12 लाख मीटर का उत्पादन हो रहा है, जिसका सालाना टर्नओवर करीब 2 करोड़ रुपए रहता है।

नाममात्र दिहाड़ी बड़ी चुनौती

सनशाइन समिति के अध्यक्ष मोहम्मद नवाब अंसारी और पड़ाना बुनकर सहकारी समिति के मो. कुरेश अंसारी बताते हैं कि, दिहाड़ी अब भी पांच साल पुरानी मिल रही है। रोजाना एक व्यक्ति 400 - 450 रुपए का ही काम कर पाता है। एक गॉज के लिए 130 और बैंडेज के लिए 181 रुपए मिलते हैं, दिनभर में दो से तीन ही बुन पाते हैं। ऐसे में दिहाड़ी बढ़े तो रुचि भी बढ़े।

सिर्फ पारंपरिक काम करने वाले बचे

हालांकि इसके बाद भी 9 इंच की पगड़ी बुनने वाले बुनकर बाजार की डिमांड के अनुसार अब 100 इंच की बैडशीट बुन रहे हैं। पिछले दो साल से कमर्शियल का आर्डर नहीं मिलने से भी अब काफी परेशानी आ रही है। यही कारण है कि, रुचि घर रही है और लोग अन्य काम देख रहे हैं। इसमें अब सिर्फ पारंपारिक काम करने वाले ही रह गए हैं।

'…तो और अच्छा काम कर सकते हैं'

बुनकर शफीक अंसारी का कहना है कि, पारिवारिक व्यवसाय है तो कर रहे हैं। लेकिन, दिहाड़ी बहुत कम मिल रही है। सुबह से शाम तक बुनाई, मांडी, ताना बनाना कई काम रहते हैं। पत्नी समेत दिनभर में तीन से चार गॉज - बैंडेज बना पाते हैं। काफी बारीकी का काम है। लेकिन, करते आ रहे तो कर रहे हैं। अगर दिहाड़ी बढ़े, बेहतर प्लेटफार्म और बढ़ावा मिले तो और अच्छा काम कर सकते हैं।

'दिहाड़ी कम है, इसलिए कम हो रही रुची'

हथकरघा उद्योग के सहायक-संचालक बालकृष्ण कोकड़िया का कहना है कि, जिले में करीब 450 बुनकर परिवार कार्यरत हैं। जिन्हें निगम के माध्यम से धागे उपलब्ध कराते हैं। सालाना 2 करोड़ टर्नओवर रहता है। शासकीय वस्त्रालय में फिलहाल गॉज - बैडेज का ही उत्पादन हो रहा है। ये बात सही है कि, दिहाड़ी बहुत कम है, इसलिए भी अच्छे अच्छे कारीगरों की रुचि कम होती जा रहा है, लेकिन स्थानी बुनकर परिवार अच्छे उत्पाद बना रहे है।