
Electricity Rates in India : हर राज्य में क्यों अलग होते हैं बिजली के रेट, PC- Chatgpt
भारत में बिजली एक ही तरह की है, लेकिन उसका बिल हर राज्य में अलग हो सकता है। कहीं 100 यूनिट बिजली का प्रभावी खर्च 3-4 रुपये प्रति यूनिट के आसपास है, तो कहीं यही दर 9-10 रुपये या उससे भी ज्यादा पहुंच जाती है। इसकी वजह सिर्फ यह नहीं है कि किसी राज्य में बिजली महंगी बनती है। बिजली की खरीद लागत, वितरण नेटवर्क, सरकारी सब्सिडी, बिजली चोरी, उपभोक्ताओं की श्रेणी और स्थानीय टैक्स-सभी मिलकर बिल तय करते हैं।
आरईसी के 2025-26 के तुलनात्मक आंकड़ों में 3 किलोवाट कनेक्शन और 100 यूनिट मासिक खपत वाले घरेलू उपभोक्ता के लिए प्रभावी दर कई राज्यों में काफी अलग दिखाई देती है। उदाहरण के लिए आंध्र प्रदेश में सरकारी सब्सिडी के बाद प्रभावी दर करीब 3.40 रुपये प्रति यूनिट, गुजरात में 3.56 रुपये, ओडिशा में 3.62 रुपये और तेलंगाना में 3.46 रुपये है।
वहीं बिहार में यही प्रभावी दर 9.07 रुपये, उत्तर प्रदेश में 9.14 रुपये, महाराष्ट्र में 8.12 रुपये, झारखंड में 8.13 रुपये और नागालैंड में 14.50 रुपये प्रति यूनिट दर्ज की गई है। यानी एक ही 100 यूनिट की खपत पर राज्यों के बीच बिल में बड़ा अंतर हो सकता है।
यहां एक जरूरी बात समझनी होगी। प्रति यूनिट बिजली की दर और अंतिम बिल एक ही चीज नहीं हैं। बिल में ऊर्जा शुल्क के अलावा स्थायी शुल्क, बिजली शुल्क और दूसरे शुल्क भी शामिल हो सकते हैं। सरकार की सब्सिडी मिलने पर उपभोक्ता की प्रभावी दर और नीचे आ जाती है।
डिस्कॉम यानी बिजली वितरण कंपनियां खुद सारी बिजली पैदा नहीं करतीं। उन्हें अलग-अलग उत्पादकों से बिजली खरीदनी पड़ती है। बिजली की कीमत इस बात पर निर्भर करती है कि राज्य के पास अपने सस्ते जलविद्युत या कोयला आधारित संयंत्र कितने हैं, उसे बाहर से कितनी बिजली खरीदनी पड़ती है और बाजार में बिजली की कीमत क्या चल रही है।
इसके अलावा बिजली को उत्पादन केंद्र से घर तक पहुंचाने के लिए ट्रांसमिशन और वितरण नेटवर्क चाहिए। लंबी दूरी, पहाड़ी इलाकों में नेटवर्क और कम उपभोक्ता घनत्व वाले क्षेत्रों में प्रति उपभोक्ता वितरण लागत अधिक हो सकती है।
यही वजह है कि केवल यह देखकर कि किसी राज्य में बिजली संयंत्र ज्यादा हैं, यह तय नहीं किया जा सकता कि वहां घरेलू बिजली भी सस्ती होगी।
बिजली की कीमतों में सबसे बड़ा अंतर पैदा करने वाली चीजों में सरकारी सब्सिडी भी शामिल है। वित्त वर्ष 2024-25 में देश के राज्य क्षेत्र की डिस्कॉम/बिजली संस्थाओं के लिए टैरिफ सब्सिडी करीब 2.37 लाख करोड़ रुपये बिल की गई, जबकि प्राप्त राशि करीब 2.35 लाख करोड़ रुपये थी।
मतलब साफ है कई राज्यों में सरकारें कुछ उपभोक्ता वर्गों को सस्ती बिजली उपलब्ध कराने के लिए डिस्कॉम को पैसा देती हैं। इसका फायदा घरेलू उपभोक्ताओं, किसानों या कुछ अन्य श्रेणियों को मिल सकता है।
लेकिन यहां सवाल यह है कि अगर बिजली की वास्तविक लागत ज्यादा है और उपभोक्ता से कम पैसा लिया जा रहा है, तो बाकी पैसा कौन देगा?
जवाब है सरकार। इसलिए सस्ती बिजली का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि बिजली पैदा करने और घर तक पहुंचाने की लागत भी कम है।
इसके पीछे डिस्कॉम की आर्थिक स्थिति भी महत्वपूर्ण है। बिजली वितरण कंपनियों को बिजली खरीदने, कर्मचारियों, ट्रांसफॉर्मर, तार, मीटर, मरम्मत और नेटवर्क के रखरखाव पर खर्च करना पड़ता है। अगर उनकी लागत और उपभोक्ताओं से मिलने वाले राजस्व में अंतर बढ़ता है, तो आर्थिक दबाव बढ़ता है।
सरकार के मुताबिक देश की वितरण कंपनियों का ACS-ARR अंतर FY2021 के 0.69 रुपये प्रति यूनिट से घटकर FY2025 में 0.06 रुपये प्रति यूनिट रह गया है। इसी अवधि में देश का AT&C नुकसान 21.91% से घटकर 15.04% हुआ। यानी स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
यह सवाल सबसे अहम है। बिजली व्यवस्था में AT&C Loss यानी Aggregate Technical and Commercial Loss का मतलब केवल बिजली चोरी नहीं है। इसमें तकनीकी नुकसान के साथ बिलिंग और वसूली से जुड़े नुकसान भी शामिल होते हैं। इसलिए पूरे AT&C नुकसान को बिजली चोरी मानना सही नहीं होगा। फिर भी ज्यादा नुकसान का मतलब डिस्कॉम के लिए कम राजस्व और ज्यादा वित्तीय दबाव हो सकता है।
2024-25 में राष्ट्रीय स्तर पर AT&C नुकसान करीब 15.04% था। लेकिन राज्यों में बहुत बड़ा अंतर था। उदाहरण के लिए आंध्र प्रदेश में यह 7.87%, गुजरात में 8.25% और केरल में 6.61% था। दूसरी तरफ अरुणाचल प्रदेश में 46.20%, नागालैंड में 48.86%, झारखंड में 28.19%, मध्य प्रदेश में 22.76% और उत्तर प्रदेश में 19.54% दर्ज हुआ।
इसका सीधा असर डिस्कॉम की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है। अंततः इस कमी की भरपाई टैक्स, सरकारी सहायता या भविष्य के टैरिफ बदलावों के जरिए हो सकती है।
सरकार बिजली वितरण व्यवस्था में स्मार्ट मीटर को बड़ा सुधार मान रही है। इसका उद्देश्य केवल नया मीटर लगाना नहीं, बल्कि बिजली की खपत और वितरण को बेहतर तरीके से मापना भी है।
रिवैम्प्ड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम में स्मार्ट मीटरिंग के साथ वितरण नेटवर्क के आधुनिकीकरण और नुकसान कम करने पर जोर दिया गया है। सरकार का लक्ष्य AT&C नुकसान को 12-15% के स्तर तक लाना था।
स्मार्ट मीटर से डिस्कॉम को यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि किसी इलाके में कितनी बिजली भेजी गई और कितनी बिजली का बिल बना। इससे मीटर रीडिंग में मानवीय गलती कम करने और चोरी या असामान्य खपत की पहचान करने में मदद मिल सकती है।
लेकिन दूसरी तरफ कुछ उपभोक्ताओं को अचानक ज्यादा बिल, अनुमानित पुराने बिलों के समायोजन या स्मार्ट मीटर की रीडिंग को लेकर शिकायतें भी हो सकती हैं। बिजली मंत्रालय के शिकायत तंत्र में बढ़े हुए मीटर रीडिंग वाले बिलों से जुड़ी शिकायतों का भी उल्लेख है।
इसलिए स्मार्ट मीटर का असली फायदा तभी होगा जब उसके साथ पारदर्शी बिलिंग और मजबूत शिकायत निवारण व्यवस्था भी हो।
इसका सीधा जवाब है- हर राज्य में एक जैसा नहीं। बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। घरों में एसी, कूलर, इलेक्ट्रिक वाहन, उद्योग और डेटा सेंटर जैसी बिजली खपत बढ़ाने वाली गतिविधियां आने वाले समय में मांग को और बढ़ा सकती हैं।
दूसरी तरफ सौर और पवन ऊर्जा का विस्तार बिजली उत्पादन के मिश्रण को बदल रहा है। इससे कुछ समय में सस्ती बिजली उपलब्ध हो सकती है, लेकिन ग्रिड को स्थिर रखने, भंडारण और नई ट्रांसमिशन लाइन पर भी निवेश करना पड़ेगा।
भविष्य में बिजली बिल का सवाल इसलिए सिर्फ “एक यूनिट कितने रुपये की?” तक सीमित नहीं रहेगा। इसमें यह भी देखा जाएगा कि बिजली कब इस्तेमाल की जा रही है, किस स्रोत से आ रही है और वितरण नेटवर्क की लागत कितनी है।
राज्यों के बीच बिजली की कीमतों का अंतर सिर्फ राजनीति या मनमानी दरों का परिणाम नहीं है। इसके पीछे बिजली उत्पादन की लागत, वितरण नेटवर्क, उपभोक्ताओं की श्रेणी, सरकारी सब्सिडी और डिस्कॉम की आर्थिक स्थिति का पूरा ढांचा काम करता है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सस्ती बिजली और आर्थिक रूप से मजबूत बिजली व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
अगर सब्सिडी लक्षित और समय पर मिले, बिजली चोरी व तकनीकी नुकसान घटे, स्मार्ट मीटर सही तरीके से काम करें और डिस्कॉम की वित्तीय स्थिति सुधरे, तो उपभोक्ताओं को राहत मिल सकती है। लेकिन अगर बिजली की मांग तेजी से बढ़ती रही और वितरण नेटवर्क पर निवेश उसी गति से नहीं हुआ, तो भविष्य में बिजली की वास्तविक लागत और बिल दोनों पर दबाव बढ़ सकता है।
यानी आने वाले समय में सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि “मेरे राज्य में बिजली कितने रुपये यूनिट है?” बल्कि यह भी होगा कि उस कीमत का कितना हिस्सा सरकार दे रही है, कितना उपभोक्ता और कितना नुकसान आखिरकार पूरी बिजली व्यवस्था पर पड़ रहा है।
Updated on:
20 Aug 2026 10:30 am
Published on:
20 Aug 2026 10:09 am
