
Traditional Degree Crisis Unemployment: पारंपरिक डिग्री नहीं दे रही करियर का साथ, जानिए BA, BCOM, BSC ग्रेजुएट स्टूडेंट्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या? (AI Creative)
Traditional Degree Crisis Unemployment: हाथ में डिग्री तो है, लेकिन नौकरी नहीं मिल रही, भारत के लाखों BA, BCom और BSc ग्रेजुएट्स के लिए यह हकीकत बनती जा रही है। सवाल अब यह नहीं कि डिग्री है या नहीं, बल्कि यह है कि आपके पास जो डिग्री है, वो बाजार में 'बिकती' भी है या नहीं। यानी जिस पारंपरिक डिग्री को लेकर आप नौकरी ढूंढ़ने और करियार बनाने निकल पड़े हैं, उसका मोल कितना रह गया है, क्यों कि दौर अब पारंपरिक डिग्री का ही नहीं उसके साथ जरूरी स्किल्स का भी हो गया है। डिजिटल की दुनिया में जानें आपके सामने सबसे बड़ी चुनौती कैसे आ खड़ी हुई है?
एक दशक पहले तक ग्रेजुएशन खुद में एक योग्यता मानी जाती थी। अब हालात बदल चुके हैं। India Skills Report 2026 के अनुसार कॉमर्स, साइंस और आर्ट्स ग्रेजुएट्स के लिए रोजगार-योग्यता में सुधार तो दर्ज हुआ है, लेकिन यह अब भी कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग जैसी टेक्निकल डिग्रियों से काफी पीछे है।
रिपोर्ट के मुताबिक कंप्यूटर साइंस और IT इंजीनियर 80% और 78% रोजगार-योग्यता के साथ सबसे आगे हैं, जबकि BE/BTech ग्रेजुएट्स 70.15% पर टिके हैं। इसके उलट ITI और पॉलिटेक्निक जैसे स्किल-आधारित कोर्स भी संघर्ष कर रहे हैं।
इनकी रोजगार-योग्यता क्रमशः सिर्फ 45.95% और 32.92% है, यानी सिर्फ 'बैचलर डिग्री' होना अब बाजार के लिए काफी सबूत नहीं रहा। कंपनियां अब डिग्री के नाम से ज्यादा उसमें सिखाए गए कौशल को तौलती हैं।
टेक्नोलॉजी और डेटा से जुड़े कोर्स इस दौड़ में सबसे आगे हैं। Mercer-Mettl के India Graduate Skill Index 2025 के अनुसार AI और मशीन लर्निंग जैसे तकनीकी क्षेत्रों में 46.1% ग्रेजुएट्स रोजगार योग्य पाए गए, जबकि HR (39.9%) और डिजिटल मार्केटिंग (41%) जैसे गैर-तकनीकी रोल सबसे पीछे रहे।
India Skills Report 2026 यह भी बताती है कि AI, डेटा एनालिटिक्स, क्लाउड कंप्यूटिंग और साइबर सिक्योरिटी सबसे ज्यादा मांग वाले कौशल बनकर उभरे हैं और टेक्नोलॉजी, BFSI, मैन्युफैक्चरिंग, रिन्यूएबल एनर्जी के साथ ही हेल्थकेयर सबसे ज्यादा हायरिंग करने वाले सेक्टर हैं।
साथ ही गिग और फ्रीलांस वर्कफोर्स के 2030 तक 2.35 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। पिछले एक साल में प्रोजेक्ट-आधारित हायरिंग में 38% की बढ़त दर्ज हुई है, यानी पारंपरिक 'फुल-टाइम नौकरी' का ढांचा भी बदल रहा है।
आधिकारिक और स्वतंत्र आंकड़ों में भी बड़ा फासला दिखता है। सरकार के Periodic Labour Force Survey के मुताबिक 2024 में ग्रेजुएट्स के बीच बेरोजगारी दर 13% रही, जबकि निरक्षर आबादी में यह लगभग शून्य के करीब है। यह भी सामने आया है कि भारत के करीब 14 करोड़ ग्रेजुएट्स में से दो-तिहाई यानी 9.5 करोड़ श्रमबल में शामिल हैं और बीसवें दशक की उम्र वाले एक-तिहाई से ज्यादा ग्रेजुएट्स बेरोजगार हैं।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि वैश्विक स्तर पर भारत की ग्रेजुएट बेरोजगारी दर, यूरोप और उत्तरी अमेरिका की विकसित अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले तीन से पांच गुना ज्यादा है। रोजगार-योग्यता के मामले में भी असमानता साफ है।
Mercer-Mettl के मुताबिक 2024 में कुल ग्रेजुएट रोजगार-योग्यता घटकर 42.6% रह गई, जो 2023 में 44.3% थी। हालांकि CII जैसी संस्थाएं इसे 54-55% के आसपास अधिक आशावादी ढंग से आंकती हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अब सिर्फ डिग्री का सर्टिफिकेट काफी नहीं। AI टूल्स और डिजिटल फ्लुएंसी की समझ लगभग हर सेक्टर में अनिवार्य होती जा रही है। देश की कुल रोजगार-योग्यता 2022 के 46.2% से बढ़कर 2026 में 56.3% तक पहुंची है, जिसकी बड़ी वजह AI अपनाना और डिजिटल कौशल का बढ़ना बताया गया है।
इसके अलावा डेटा एनालिटिक्स, बुनियादी कोडिंग, कम्युनिकेशन और प्रेजेंटेशन स्किल्स, इंटर्नशिप के माध्यम से व्यावहारिक अनुभव और अपने विषय से जुड़े इंडस्ट्री सर्टिफिकेशन ये सभी अब BA, BCom और BSc जैसे पारंपरिक कोर्स करने वालों के लिए लगभग जरूरी हो चुके हैं। सिर्फ किताबी ज्ञान अब भर्तीकर्ताओं को संतुष्ट नहीं करता, वे यह देखना चाहते हैं कि छात्र क्लासरूम के बाहर वास्तविक समस्याएं सुलझाना जानता है या नहीं।
कुल मिलाकर आंकड़े स्पष्ट इशारा करते हैं कि भारत में डिग्री की 'पहचान' और उसकी 'बाजार में कीमत' के बीच खाई बढ़ रही है। पारंपरिक BA, BCom, BSc डिग्रीधारकों के सामने असली चुनौती डिग्री हासिल करना नहीं, बल्कि उसके साथ ऐसी स्किल्स जोड़ना है जो, आज के तकनीक-चालित नौकरी बाजार से मेल खाती हों। जो छात्र यह संतुलन जल्दी समझ लेते हैं, वही आगे की दौड़ में टिक पाते हैं।
Updated on:
20 Aug 2026 09:52 am
Published on:
20 Aug 2026 09:52 am
